Yog Pranayam Awakens Kundalini Power






वायु का संबंध आयु से अनिरुद्ध जोशी ‘शतायु’ कछुए की साँस लेने और छोड़ने की गति इनसानों से
कहीं अधिक दीर्घ है। व्हेल मछली की उम्र का राज
भी यही है। बड़ और पीपल के वृक्ष की आयु का राज
भी यही है।

वायु को योग में प्राण कहते हैं। प्राचीन ऋषि वायु के इस रहस्य को समझते थे तभी तो वे
कुंभक लगाकर हिमालय की गुफा में वर्षों तक बैठे रहते थे।
श्वास को लेने और छोड़ने के दरमियान घंटों का समय
प्राणायाम के अभ्यास से ही संभव हो पाता है। शरीर में दूषित वायु के होने की स्थिति में भी उम्र
क्षीण होती है और रोगों की उत्पत्ति होती है। पेट में
पड़ा भोजन दूषित हो जाता है, जल भी दूषित हो जाता है
तो फिर वायु क्यों नहीं। यदि आप लगातार दूषित वायु
ही ग्रहण कर रहे हैं तो समझो कि समय से पहले ही रोग
और मौत के निकट जा रहे हैं।

हठप्रदीपिका में इसी प्राणरूप वायु के संबंध में कहा गया है
कि जब तक यह वायु चंचल या अस्थिर रहती है, जब तक
मन और शरीर भी चंचल रहता है। इस प्राण के स्थिर होने
से ही स्थितप्रज्ञ अर्थात मोक्ष की प्राप्ति संभव
हो पाती है। जब तक वायु इस शरीर में है, तभी तक जीवन
भी है, अतएव इसको निकलने न देकर कुंभक का अभ्यास बढ़ाना चाहिए, जिससे जीवन बना रहे और जीवन में
स्थिरता बनी रहे।

असंयमित श्वास के कारण :
बाल्यावस्था से ही व्यक्ति असावधानीपूर्ण और अराजक
श्वास लेने और छोड़ने की आदत के कारण ही अनेक
मनोभावों से ग्रसित हो जाता है। जब श्वास चंचल और
अराजक होगी तो चित्त के भी अराजक होने से आयु
का भी क्षय शीघ्रता से होता रहता है। फिर व्यक्ति जैसे-जैसे बड़ा होता है काम, क्रोध, मद,
लोभ, व्यसन, चिंता, व्यग्रता, नकारात्मता और
भावुकता के रोग से ग्रस्त होता जाता है। उक्त रोग
व्यक्ति की श्वास को पूरी तरह तोड़कर शरीर स्थित
वायु को दूषित करते जाते हैं जिसके कारण शरीर
का शीघ्रता से क्षय होने लगता है।

कुंभक का अभ्यास करें :
हठयोगियों ने विचार किया कि यदि सावधानी से
धीरे-धीरे श्वास लेने व छोड़ने और बाद में रोकने
का भी अभ्यास बनाया जाए तो परिणामस्वरूप चित्त में
स्थिरता आएगी। श्वसन-क्रिया जितनी मंद और सूक्ष्म
होगी उतना ही मंद जीवन क्रिया के क्षय होने का क्रम
होगा। यही कारण है कि श्वास-प्रश्वास का नियंत्रण
करने तथा पर्याप्त समय तक उसको रोक रखने (कुंभक) से
आयु के भी बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है। इसी कारण योग
में कुंभक या प्राणायाम का सर्वाधिक महत्व माना गया है।

सावधानी :
आंतरिक कुंभक अर्थात श्वास को अंदर खींचकर पेट
या अन्य स्थान में रोककर रखने से पूर्व शरीरस्थ
नाड़ियों में स्थित दूषित वायु को निकालने के लिए
बाहरी कुंभक का अभ्यास करना आवश्यक है।
अतः सभी नाड़ियों सहित शरीर की शुद्धि के बाद ही कुंभक का अभ्यास करना चाहिए। वैसे तो प्राणायाम अनुलोम-विलोम के
भी नाड़ियों की शुद्धि होकर शरीर शुद्ध होता है और
साथ-साथ अनेक प्रकार के रोग भी दूर होते हैं, किन्तु
किसी प्रकार की गलती इस अभ्यास में हुई तो अनेक
प्रकार के रोगों के उत्पन्न होने की संभावना भी रहती है।
अतः उचित रीति से ही प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए।

प्राणायाम का रहस्य :
इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना ये तीन नाड़ियाँ प्रमुख हैं।
प्राणायम के लगातार अभ्यास से ये नाड़ियाँ ‍शुद्ध होकर
जब सक्रिय होती हैं तो व्यक्ति के शरीर में
किसी भी प्रकार का रोग नहीं होता और आयु प्रबल
हो जाती है। मन में किसी भी प्रकार की चंचलता नहीं रहने से स्थिर मन शक्तिशाली होकर
धारणा सिद्ध हो जाती है अर्थात ऐसे व्यक्ति की सोच
फलित हो जाती है। यदि लगातार इसका अभ्यास
बढ़ता रहा तो व्यक्ति सिद्ध हो जाता है।

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Sri Sri Ravi Shankar Views on RAM NAVMI

Q. How can I balance peace while fighting for justice?
Sri Sri Ravi Shankar: That is the whole essence of The Bhagavat Gita. Be calm from the inside and act whenever required. You should stand up and fight if necessary; but don’t keep the fight inside yourself. Usually we fight inside and keep quiet on the outside. We should do the opposite. With meditation, it becomes easy to bring about this change. The power of satva and the power of meditation make it easy.
Today is Shri Ramanavami (Lord Rama’s Birthday). Ra means radiance, Ma means myself. Rama means ‘the light inside me’. Rama was born to Dasharath and Kousalya. Dasharath means ‘Ten Chariots’. The ten chariots symbolize  the five organs of perception (the five senses) and five organs of knowledge and action (For instance: reproduction, legs, hands and so on). Kousalya means ‘skill’. Ayodhya means ‘a society in which there is no violence’. If you skillfully observe what goes on inside the body, light dawns inside you. That is meditation. You need some skill to relax the tension. Then you  start expanding.
You know you are here now, yet you are not. With this realization, there is a certain lightness that comes spontaneously. Rama is when the inner light shines through. Sita the mind/intellect was robbed by the ego, Ravana. Ravana had ten heads. Ravana (ego) was one who wouldn’t listen to others. He was too much in the head. Hanuman means breath. With the help of Hanuman (the breath), Sita (the mind) was able to go back to Rama (the source).
Ramayana happened around 7,500 years ago. It had an impact on Germany and many other countries in Europe and  Far East. Thousands of cities are named after Rama. Cities like Rambaugh in Germany, Rome in Italy have their roots in the word Ram. Indonesia, Bali and Japan were all influenced by Ramayana. Though Ramayana is history, it is also an eternal phenomenon happening all the time.

Q. What are the qualities that  the Master wants to see in an ideal devotee?
Sri Sri Ravi Shankar: None. If I name a quality, you will all try to emulate that quality. Just be your natural self. Be honest. Even if you miss a meditation one day, don’t feel guilty about it. Time is carrying you. All the good qualities you aspire for, you have them anyway. You are here and you are doing the right thing.
You can purify your body by following a proper diet. It’s good to fast for two-three days in a year. Fast on only juices. But if your system disagrees with it, don’t do it. You should listen to your body.
Mind is purified through pranayama and Sudarshan Kriya.
Intellect is purified through knowledge.
Emotions are purified through bhajans.
Actions are purified through seva.
Money is purified through charity.
You should donate at least two to three percent of your income.

Q.  What is your vision for The Art of Living in the coming years?
Sri Sri Ravi Shankar: I have started it. My job is done. It’s up to you now. You have a vision, so take it where you want to take it. , We are celebrating 30 years of The Art of Living in Germany. We’ll be in the same Olympic stadium that Hitler built 75 years ago. He started the war from there. From the same place where war started, we’ll spread the message of peace.
Q. Why has religion been the reason for so many wars?
Sri Sri Ravi Shankar: Even I wonder about it. There are 10 major religions in the world: four from the Middle East and six from the Far East. The six religions from the Far East never had any conflicts. There was no war between these six religions. Hinduism, Buddhism, Sikhism, Jainism, Shintoism and Taoism – they all coexisted.
When President Nixon went to Japan, he had a Shinto priest on one side and a Buddhist priest on the other side. He asked the Shinto priest: What is the percentage of Shintos in Japan? The priest said: 80 percent. Then he turned to the Buddhist priest and asked him: What is the percentage of Buddhists in Japan? He said: 80 percent. Nixon was perplexed as to how this was possible. Shintos go to Buddhist temples and Buddhists go to Shinto temples. Similarly, Hindus go to Sikh gurudwaras and Sikhs go to Hindu temples. The same may be said of Hindus and Buddhists in India. Similarly in China, there is no war between Taoists and Buddhists.
The four religions in the Middle East were always at war. I think they should learn how to co-exist from the other six. Judaism and Christianity are friendly. Judaism and Islam have an issue.





संस्कृति – हनुमान जी के विवाह का रहस्य…(Secret of Hanuman ji’s Marriage)


हनुमान जी के विवाह का रहस्य…

संकट मोचन हनुमान जी के ब्रह्मचारी रूप से तो सभी परिचित हैं..
उन्हें बाल ब्रम्हचारी भी कहा जाता है…

लेकिन क्या अपने कभी सुना है की हनुमान जी का विवाह भी हुआ था ??

और उनका उनकी पत्नी के साथ एक मंदिर भी है ??
जिसके दर्शन के लिए दूर दूर से लोग आते हैं..

कहा जाता है कि हनुमान जी के उनकी पत्नी के साथ दर्शन करने के बाद घर मे चल रहे पति पत्नी के बीच के सारे तनाव खत्म हो जाते हैं.

आन्ध्र प्रदेश के खम्मम जिले में बना हनुमान जी का यह मंदिर काफी मायनों में ख़ास है..

ख़ास इसलिए की यहाँ हनुमान जी अपने ब्रम्हचारी रूप में नहीं बल्कि गृहस्थ रूप में अपनी पत्नी सुवर्चला के साथ विराजमान है.

हनुमान जी के सभी भक्त यही मानते आये हैं की वे बाल ब्रह्मचारी थे.
और बाल्मीकि, कम्भ, सहित किसी भी रामायण और रामचरित मानस में बालाजी के इसी रूप का वर्णन मिलता है..

लेकिन पराशर संहिता में हनुमान जी के विवाह का उल्लेख है.

इसका सबूत है आंध्र प्रदेश के खम्मम ज़िले में बना एक खास मंदिर जो प्रमाण है हनुमान जी की शादी का।

ये मंदिर याद दिलाता है रामदूत के उस चरित्र का जब उन्हें विवाह के बंधन में बंधना पड़ा था।
लेकिन इसका ये अर्थ नहीं कि भगवान हनुमान जी बाल ब्रह्मचारी नहीं थे।

पवनपुत्र का विवाह भी हुआ था और वो बाल ब्रह्मचारी भी थे।

कुछ विशेष परिस्थियों के कारण ही बजरंगबली को सुवर्चला के साथ विवाह बंधन मे बंधना पड़ा।

हनुमान जी ने भगवान सूर्य को अपना गुरु बनाया था।
हनुमान, सूर्य से अपनी शिक्षा ग्रहण कर रहे थे…

सूर्य कहीं रुक नहीं सकते थे इसलिए हनुमान जी को सारा दिन भगवान सूर्य के रथ के साथ साथ उड़ना पड़ता और भगवान सूर्य उन्हें तरह-तरह की विद्याओं का ज्ञान देते।

लेकिन हनुमान जी को ज्ञान देते समय सूर्य के सामने एक दिन धर्मसंकट खड़ा हो गया।

कुल ९ तरह की विद्या में से हनुमान जी को उनके गुरु ने पांच तरह की विद्या तो सिखा दी लेकिन बची चार तरह की विद्या और ज्ञान ऐसे थे जो केवल किसी विवाहित को ही सिखाए जा सकते थे.

हनुमान जी पूरी शिक्षा लेने का प्रण कर चुके थे और इससे कम पर वो मानने को राजी नहीं थे।

इधर भगवान सूर्य के सामने संकट था कि वो धर्म के अनुशासन के कारण किसी अविवाहित को कुछ विशेष विद्याएं नहीं सिखला सकते थे।

ऐसी स्थिति में सूर्य देव ने हनुमान जी को विवाह की सलाह दी..

और अपने प्रण को पूरा करने के लिए हनुमान जी भी विवाह सूत्र में बंधकर शिक्षा ग्रहण करने को तैयार हो गए।

लेकिन हनुमान जी के लिए दुल्हन कौन हो और कहा से वह मिलेगी इसे लेकर सभी चिंतित थे..

ऐसे में सूर्यदेव ने अपने शिष्य हनुमान जी को राह दिखलाई।
सूर्य देव ने अपनी परम तपस्वी और तेजस्वी पुत्री सुवर्चला को हनुमान जी के साथ शादी के लिए तैयार कर लिया।

इसके बाद हनुमान जी ने अपनी शिक्षा पूर्ण की और सुवर्चला सदा के लिए अपनी तपस्या में रत हो गई।

इस तरह हनुमान जी भले ही शादी के बंधन में बांध गए हो लेकिन शाररिक रूप से वे आज भी एक ब्रह्मचारी ही हैं.

पराशर संहिता में तो लिखा गया है की खुद सूर्यदेव ने इस शादी पर यह कहा की – यह शादी ब्रह्मांड के कल्याण के लिए ही हुई है और इससे हनुमान जी का ब्रह्मचर्य भी प्रभावित नहीं हुआ .. , , ,

|| जय श्री राम ||

http://en.wikipedia.org/wiki/Hanuman

संस्कृति-Why 108 time Mantra Chanting Compulsory? 108 बार मंत्र जाप क्यूँ ?

     The Wholeness in Number”9″ and Power in Number “7”

 Why is the use of 108 time of Mantra? 

  • There are 12 zodiac signs and 9 planets. As the 9 planets move through the 12 signs, their positions affect us either negatively or positively. Chanting the Om Namah Shivaya 108 times (12 x 9 = 108 duh!), nullifies any negative effects and enhances positive effects of the planets on us! 

  • Here are 54 letters in Sanskrit alphabets and Each has masculine and feminine, i.e. shiva and shakti 54 * 2 = 108
  • Time: Some say there are 108 feelings, with 36 related to the past, 36 related to the present, and 36 related to the future.
  • Astrology: There are 12 constellations, and 9 arc segments called namshas or chandrakalas. 9 times 12 equals 108. Chandra is moon, and kalas are the divisions within a whole
  • The diameter of the sun is 108 times the diameter of the Earth.
  • 108 represents (1+0+8) = 9, where 9 represents 9 tattvas
  • Nine Tattvas (Principles):
————————–
1. Jiva – soul or living being (Consciousness)
2. Ajiva – non-living substances
3. Asrava – cause of the influx of karma
4. Bandh – bondage of karma
5. Punya – virtue
6. Paap – sin
7. Samvara – arrest of the influx of karma
8. Nirjara – exhaustion of the accumulated karma
9. Moksha – total liberation from karma
Again 9 tattvas and 12 months ,multiplication leads to (12 * 9 ) = 108.

  • Followers use 108 beads in their malas. They implement the following formula:

6 x 3 x 2 x3 = 108
6 senses [sight, sound, smell, taste, touch, thought]
3 aspects of time [past, present, future]
2 condition of heart [pure or impure]
3 possibilties of sentiment [like, dislike, indifference]


  • Mathematically speaking number 9 stands between 0-8 (i.e. 0 to 8 , total numbers are 9). Eight represents completeness or totality because it includes the 4 cardinal directions and the 4 ordinal directions
Zero, by contrast, represents nothingness or emptiness. It is geometrically represented by a plain sheet with no marks on it. Thus 8 is everything and 0 is nothing. 9 is the threshold number between 8 and 0. The number 1 which follows 0 represents the beginning , the root of all geometrical patterns, while 8 is the number represents fulfillment or end.

So number 108 represents beginning- nothingness- fulfillment. i.e. nothingness between the beginning and the end. Or we can say 1 stands for beginning and 8 stands for infinity and eternity.

  • Mahabharat have 18पर्व (PARV)Chapters. It Mean = 1+8 = 9 Completeness.
  • Mehmood Gaznavi attached 17 Times and next he Taken “Shayamantaka”. It mean 17+1=18(1+8=9)
  • Shakuni Rolled the dice the 17th Time and said ” Lo i have won”. it means on Next rolled Pandavas are on the Road. The completeness.     


                        The power of Number ” 7 “

  • RAMAYAN have “7” कांड. 
  • Krishna’s Dwarika consist of 7 Islands(द्वीप )-
1. Shankhodhara         4.Dwarka                         7.Harshad & Prabhas
2.Aramda                   5.Purvadvra 
3.Rupen                     6.Okhamadhi

  • One could Split Light into 7 “Colors” and One Could combine the Seven Colors in One Light.
1.Red               4.Green         7.Violet
2.Orange          5.Blue
3.Yellow          6.Indigo

  • According to “YOG”Vidya – 7 “Chakras” in our Body.
1.Crown        4.Heart         7.Root
2.Brow          5.Solar
3.Throat        6.Spleen

  • India Classic Music – 7 “swar” स्वर 
1. Sa                              4.  Ma                           7. Ni
2. Re                              5.  Pa
3. Ga                              6.  Dha

  • In English 7 “SWAR” – 1.DO 
  •                                   2.RE 
  •                                   3.MI 
  •                                   4.FA 
  •                                   5.SOL 
  •                                   6.LA 
  •                                   7.TI 

  • If you play all Swar at same moment your will get OUTPUT of Sound ” OM”.
  • Broad form of Energy- 
1. Mechanical                      4.Radiant                          7.Nuclear
2.Heat                                 5.Electrical
3. Chemical                         6.Sound

  •  Seven Rivers called “सप्तसिंधु “.
  • Seven Sages   called ” सप्त ऋषि 
  • Vedic Calenders have ” 7″ Days Phase.
  • विवाह में 7  फेरे 

.The Sixteen Purifications (1+6=7)  १ ६ संस्कार  ( १+६ =७ )
These are as listed below: 
Garbhaadhaana: The first coming together of the husband & wife for bringing about conception. 
Pumsvana: Ceremony performed when the first signs of conception are seen, and is to be performed when someone desires a male child.
 Seemantonayana: A ceremony of parting of the hairs of the expectant mother to keep her spirits high & positive. Special music is arranged for her.
 Jaatakarma: After the birth of the child, the child is given a secret name, he is given taste of honey & ghee, mother starts the first breast-feeding after chanting of a mantra.
 Naama-karana: In this ceremony the child is given a formal name. Performed on the 11th day.
 Nishkramana: In this the formal darshan of sun & moon is done for the child. 
Annapraashana: This ceremony is performed, when the child is given solid food (anna) for the first time. Chudaakarana: Cuda means the ‘lock or tuft of hair’ kept after the remaining part is shaved off.
 Karna-vedha: Done in 7th or 8th month. Piercing of the ears. 
Upanayan: The thread ceremony. The child is thereafter authorized to perform all rituals. 
Vedaarambha: Studies of Vedas begins with the guru [teacher]. 
Samaavartan: Convocation and returning home. 
Vivaaha: Marriage ceremony. 
Vaanprastha: As old age approaches, the person retires for a life of tapas (austerity) & studies.
 Sanyaasa: Before leaving the body, a Hinddu sheds all sense of responsibility & relationships to awake & revel in the timeless truth.
 Antyeshti: The last rites done after the death.
Of these, the first three are pre-natal samskaaras;
 the next six pertain to childhood; 
the subsequent three are for boyhood; marriage,
 the thirteenth pertains to youth and manhood;
 the next two are for later age and the sixteenth is the last of samkaaras for a man. 
Antyesti is the last samskaara and other rituals like annual shraaddha etc are not requisites of Sanatana Dharma, but are later incorporations into Hinduism…..

 16 श्रंगार और उनके महत्तव ( १+६ =७ )

1) बिन्दी – सुहागिन स्त्रियां कुमकुम या सिन्दुर से अपने ललाट पर लाल बिन्दी जरूर लगाती है और इसे परिवार की समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

2) -सिन्दुर – सिन्दुर को स्त्रियों का सुहाग चिन्ह माना जाता है। विवाह के अवसर पर पति अपनी पत्नि की मांग में सिंन्दुर भर कर जीवन भर उसका साथ निभाने का वचन देता है।

-नथ – विवाह के अवसर पर पवित्र अग्नि के चारों ओर सात फेरे लेने के बाद में देवी पार्वती के सम्मान में नववधू को नथ पहनाई जाती है।

9) -कर्ण फूल – कान में जाने वाला यह आभूषण कई तरह की सुन्दर आकृतियों में होता है, जिसे चेन के सहारे जुड़े में बांधा जाता है।

10) -हार – गले में पहना जाने वाला सोने या मोतियों का हार पति के प्रति सुहागन स्त्री के वचनबध्दता का प्रतीक माना जाता है। वधू के गले में वर व्दारा मंगलसूत्र से उसके विवाहित होने का संकेत मिलता है।

11) -बाजूबन्द – कड़े के समान आकृति वाला यह आभूषण सोने या चान्दी का होता है। यह बांहो में पूरी तरह कसा रहता है, इसी कारण इसे बाजूबन्द कहा जाता है।

12) -कंगण और चूडिय़ाँ – हिन्दू परिवारों में सदियों से यह परम्परा चली आ रही है कि सास अपनी
बडी़ बहू को मुंह दिखाई रस्म में सुखी और सौभाग्यवती बने रहने के आशीर्वाद के साथ वही कंगण देती है, जो पहली बार ससुराल आने पर उसकी सास ने दिए थे। पारम्परिक रूप से ऐसा माना जाता है कि सुहागिन स्त्रियों की कलाइयां चूडिय़ों से भरी रहनी चाहिए।

-13) अंगूठी – शादी के पहले सगाई की रस्म में वर-वधू द्वारा एक-दूसरे को अंगूठी पहनाने की परम्परा बहुत पूरानी है। अंगूठी को सदियों से पति-पत्नी के आपसी प्यार और विश्वास का प्रतीक माना जाता रहा है।

14) -कमरबन्द – कमरबन्द कमर में पहना जाने वाला आभूषण है, जिसे स्त्रियां विवाह के बाद पहनती है। इससे उनकी छरहरी काया और भी आकर्षक दिखाई देती है। कमरबन्द इस बात का प्रतीक कि नववधू अब अपने नए घर की स्वामिनी है। कमरबन्द में प्राय: औरतें चाबियों का गुच्छा लटका कर रखती है।

15) -बिछुआ – पैरें के अंगूठे में रिंग की तरह पहने जाने वाले इस आभूषण को अरसी या अंगूठा कहा जाता है। पारम्परिक रूप से पहने जाने वाले इस आभूषण के अलावा स्त्रियां कनिष्का को छोडकर तीनों अंगूलियों में बिछुआ पहनती है।

16) -पायल- पैरों में पहने जाने वाले इस आभूषण के घुंघरूओं की सुमधुर ध्वनि से घर के हर सदस्य को नववधू की आहट का संकेत मिलता है।

Question ? 

Why do we use the Word “OM”ओउम  ?
Because in English too…

OMNISCIENCE –  Infinite Knowledge
OMNIPOTENT – Person have Infinite Power
OMNIVOROUS – Ability to absorb everything
OMEN              – Implying a predictive Sign of Future Event
OMBUDSMAN – Trusted intermediary between parties, with authority to awards a verdict.
AMEN              – In christianity
AMIN               – In Islamic 


वन्देमातरम



संस्कृति – तिलक-टीका

तिलक-टीका: आज्ञा चक्र के भेद
योग ने उस चक्र को जगाने के बहुत-बहुत प्रयोग किये है। उसमें तिलक भी एक प्रयोग है। स्मतरण पूर्वक अगर चौबीस घण्टेु उस चक्र पर बार-बार ध्यालन को ले जाता है तो बड़े परिणाम आते है। अगर तिलक लगा हुआ है तो बार-बार ध्यासन जाएगा। तिलक के लगते ही वह स्था।न पृथक हो जाता है। वह बहुत सेंसिटिव स्थाघन है। अगर तिलक ठीक जगह लगा है तो आप हैरान होंगे, आपको उसकी याद करनी ही पड़ेगी, बहुत संवेदनशील जगह है। सम्भावत: शरीर में वि सर्वाधिक संवेदनशील जगह हे। उसकी संवेदनशीलता का स्पार्श करना, और वह भी खास चीजों से स्पेर्श करने की विधि है—जैसे चंदन का तिलक लगाना।

सैकड़ों और हजारों प्रयोगों के बाद तय किया था कि चन्दखन का क्योंग प्रयोग करना है। एक तरह की रैजोनेंस हे चंदन में। और उस स्थागन की संवेदनशीलता में। चंदन का तिलक उस बिन्दु की संवेदनशीलता को और गहन करता है। और घना कर जाता है। हर कोई तिलक नहीं करेगा। कुछ चीजों के तिलक तो उसकी संवेदनशीलता को मार देंगे, बुरी तरह मार देंगे आज स्त्रि यां टीका लगा रही है। बहुत से बाजारू टीके है वे उनकी कोई वैज्ञानिकता नहीं है। उनका योग से कोई लेना देना नहीं है। वे बाजारू टीके नुकसान कर रहे है। वह नुकसान करेंगे।

सवाल यह है कि संवेदनशीलता को बढ़ाते है या घटाते है। अगर घटाते है संवेदनशीलता को तो नुकसान करेंगे, और बढ़ाते है तो फायदा करेंगे। और प्रत्ये क चीज के अलग-अलग परिणाम है, इस जगत में छोटे से फर्क पड़ता है। इसको ध्याफन में रखते हुए कुछ विशेष चीजें खोजी गयी थी। जिनका ही उपयोग किया जाए। यदि आज्ञा का चक्र संवेदनशील हो सके, सक्रिय हो सके तो आपके व्योक्तिजत्व में एक गरिमा और इन्टीकग्रिटी आनी शुरू होगी। एक समग्रता पैदा होगी। आप एक जुट होने लगते है। कोई चीज आपके भीतर इकट्ठी हो जाती है। खण्डी-खण्डत नहीं अखण्डज हो जाती है।

इस संबंध में टीके के लिए भी पूछा है तो वह भी ख्याशल में ले लेन चाहिए। तिलक से थोड़ा हटकर टीके को प्रयोग शुरू हुआ। विशेषकर स्त्रि्यों के लिए शुरू हुआ। उसका कारण वही था, योग का अनुभव काम कर रहा था। असल में स्त्रि यों का आज्ञा चक्र बहुत कमजोर चक्र है—होगा ही। क्यों कि स्त्री का सारा व्यक्तित्व निर्मित किया गया है समर्पण के लिए। उसके सारे व्य क्तिचत्व की खूबी समर्पण की है। आज्ञा चक्र अगर उसका बहुत मजबूत हो तो समर्पण करना मुश्किकल हो जाएगा। स्त्री के पास आज्ञा का चक्र बहुत कमजोर हे। असाधारण रूप से कमजोर है। इसलिए स्त्री सदा ही किसी का सहारा माँगती रहेगी। चाहे वह किसी रूप में हो। अपने पर खड़े होने का पूरा साहस नहीं जुटा पायेगी। कोई सहारा किसी के कन्धेव पर हाथ, कोई आगे हो जाए कोई आज्ञा दे और वह मान ले इसमें उसे सुख मालूम पड़ेगा।

स्त्रीप के आज्ञा चक्र को सक्रिय बनाने के लिए अकेली कोशिश इस मुल्कऔ में हुई है, और कहीं भी नहीं हुई। और वह कोशिश इसलिए थी कि अगर स्त्रीो का आज्ञा चक्र सक्रिय नहीं होता तो परलोक में उसकी कोई गति नहीं होती। साधना में उसकी कोई गति नहीं होती। उसके आज्ञा चक्र को तो स्थि र रूप से मजबूत करने की जरूरत है। लेकिन अगर यह आज्ञा चक्र साधारण रूप से मजबूत किया जाए तो उसके स्त्रैरण होने में कमी पड़ेगी। और उसमें पुरुषत्व के गुण आने शुरू हो जायेंगे। इसलिए इस टीके को अनिवार्य रूप से उसके पति से जोड़ने की चेष्टाी की गई। उसके जोड़ने का करण है।

इस टीके को सीधा नही रखा दिया गया उसके माथे पर, नहीं तो उसके स्त्री त्वर कम होगा। वह जितनी स्वटनिर्भर होने लगेगी उतनी ही उसकी कमनीयता, उसका कौमार्य नष्ट् हो जाएगा। वह दूसरे का सहारा खोजती है इसमें एक तरह की कोमलता हे। पर जब वह अपने सहारे खड़ी होगी तो एक तरह की कठोरता अनिवार्य हो जाएगी। तब बड़ी बारीकी से ख्याहल किया गया कि उसको सीधा टीका लगा दिया जाए,नुकसान पहुँचेगा उसके व्यरक्ति त्वि में,उसमे मां होने में बाधा पड़ेगी, उसके समर्पण में बाधा पड़ेगी। इसलिए उसकी आज्ञा को उसके पति से ही जोड़ने का समग्र प्रयास किया गया। इस तरह दोहरे फायदे होंगे। उसके स्त्रैजण होने में अन्त र नहीं पड़ेगा। बल्किा अपने पति के प्रति ज्याेदा अनुगत हो पायेगी। और फिर भी उसकी आज्ञा का चक्र सक्रिय हो सकेगा।

इसे ऐसा समझिए, आज्ञा का चक्र जिससे भी संबंधित कर दिया जाए, उसके विपरीत कभी नहीं जाता। चाहे गुरु से संबंधित कर दिया जाए तो गुरु के विपरीत कभी नही जाता। चाहे पति के संबंधित कर दिया जाए तो पति से विपरीत कभी नहीं जाता। आज्ञा चक्र जिससे भी संबंधित कर दिया जाए उसके विपरीत व्यक्तित्व नहीं जाता। अगर उस स्त्री के माथे पर ठीक जगह पर टीका है तो वह सिर्फ पति तो अनुगत हो सकेगी। शेष सारे जगत के प्रति वह सबल हो जाएगी। यह करीब-करीब स्थिैति वैसी है अगर आप सम्मोसहन के संबंध में कुछ समझते है तो इसे जल्दी समझ जायेंगे।

एक तरफ वह समर्पित होती है अपने पति के लिए। और दूसरी और शेष जगत के लिए मुक्ते हो जाती है। अब उसके स्त्रीब तत्वि के लिए कोई बाधा नहीं पड़ेगी। इसीलिए जैसे ही पति मर जाए टीका हटा दिया जाता है। वह इसलिए हटा दिया गया है। कि अब उसका किसी के प्रति भी अनुगत होने का कोई सवाल नहीं रहा।

लोगों को इस बात का कतई ख्यागल नहीं है, उनको तो ख्या ल है कि टीका पोंछ दिया,क्योंअकि विधवा हो गयी। पोंछने को प्रयोजन है। अब उसके अनुगत होने को कोई सवाल नहीं रहा। सच तो यह है कि अब उसको पुरूष की भांति ही जीना पड़ेगा। अब उसमें जितनी स्वरतंत्रता आ जाए, उतनी उसके जीवन के लिए हितकर होगी। जरा सा भी छिद्र बल्नीरेबिलिटी का जरा सा भी छेद जहां से वह अनुगत हो सके वह हट जाए।

टीके का प्रयोग एक बहुत ही गहरा प्रयोग है। लेकिन ठीक जगह पर हो, ठीक वस्तुा का हो। ठीक नियोजित ढंग से लगाया गया हो तो ही कार गार है अन्यीथा बेमानी है। सजावट हो शृंगार हो उसका कोई मूल्‍य नहीं है। उसका कोई अर्थ नहीं है। तब वह सिर्फ औपचारिक घटना है। इसलिए पहली बार जब टीका लगया जाए तो उसका पूरा अनुष्ठाअन हे। और पहली दफा गुरु तिलक दे तब उसके पूरा अनुष्ठा न से ही लगाया जाए। तो ही परिणामकारी होगा। अन्यदथा परिणामकारी नहीं होगा।

आज सारी चींजे हमें व्यर्थ मालूम पड़ने लगी है। उनका कारण है। आज तो व्यणर्थ है। क्योंठकि उनके पीछे को कोई भी वैज्ञानिक रूप नहीं रहा है। सिर्फ उसकी खोल रह गयी है। जिसको हम घसीट रहे है। जिसको हम खींच रहे है, बेमन जिसके पीछे मन का कोई लगाव नहीं रह गया है। आत्मास को कोई भाव नहीं रह गया है, और उसके पीछे की पूरी वैज्ञानिकता का कोई सूत्र भी मौजूद नहीं है। वह आज्ञा चक्र है, इस संबंध में दो तीन बातें और समझ लेनी चाहिए क्योंवकि यह काम आ सकती है। इसका उपयोग किया जा सकता है।

आज्ञा चक्र की जो रेखा है उस रेखा से ही जुड़ा हुआ हमारे मस्तिोष्क का भाग है। इससे ही हमारा मस्ति ष्का शुरू होता है। लेकिन अभी भी हमारे मस्ति्ष्को का आधा हिस्सास बेकार पडा हुआ है। साधारण:। हमारा जो प्रतिभाशाली से प्रतिभाशाली व्यिक्तिो होता है। जिसको हम जीनियस कहें, उसके भी केवल आधा ही मस्तिाष्का काम करता है। आध काम नहीं करता। वैज्ञानिक बहुत परेशान है, फिजियोलाजिस्ट बहुत परेशान है कि यह आधी खोपड़ी का जो हिस्साक है, यह किसी भी काम में नहीं आता। अगर आपके इस आधे हिस्सेे को काटकर निकाल दिया जाए तो आपको पता भी नहीं चलेगा। कि कहीं कोई चीज कम हो गई है। क्यों कि उसका ता कभी उपयोग ही नहीं हुआ है, वहन होने के बारबार है।

लेकिन वैज्ञानिक जानते है प्रकृति कोई भी चीज व्यकर्थ निर्मित नहीं करती। भूल होती है, एकाध आदमी के साथ हो सकती है। यह ता हर आदमी के साथ आधा मस्तिउष्कम खाली पडा हुआ है। बिलकुल निष्क्रि य पडा हुआ है। उसके कहीं कोई चहल पहल भी नहीं है। योग का कहना है कि वह जो आधा मस्ति ष्क है वह आज्ञा चक्र के चलने के बाद शुरू होता है। आधा मस्ति ष्कम आज्ञा चक्र ने नीचे के चक्रों से जुड़ा है और आधा मस्ति ष्के आज्ञा चक्र के ऊपर के चक्रों से जुड़ा हुआ है। नीचे के चक्र शुरू होत है तो आधा मस्तिाष्क काम करता है और जब आज्ञा के ऊपर काम शुरू होता है तब आधा मस्तिैष्कै काम शुरू करता है।

इस संबंध में हमें ख्यामल भी नहीं आता कि जब कोई चीज सक्रिय न हो जाए हम सोच भी नहीं सकते। सोचने का भी कोई उपाय नहीं है। जब कोई चीज सक्रिय होती तब हमें पता चला है।

ओशो
हिंदी लेखन स्वामी आनंद प्रसाद

संस्कृति – आजकल हम जन्मदिन किस प्रकार मनाते हैं ?(RITUALS and BIRTHDAY)

RITUALS and BIRTHDAY

आजकल हम जन्मदिन किस प्रकार मनाते हैं ?

पश्चिमी सभ्यता का अन्धानुकरण करने के युग में हम अपनी संस्कृति, सभ्यता एवं मनोबल को इतना अधिक गिरा चुके हैं की उन्हें उठने में और हमारा विश्वास जीतने में न जाने कितने युग बीत जायें कहा नहीं जा सकता … हमारी वर्तमान संस्कृति में अधकचरापन आ गया है “ न पूरी ताकत से विदेशी हो पाए , न पूरी ताकत से भारतीय हो पाए, हम बीच के हो गए, खिचड़ी हो गए !! “ इसी कड़ी में जन्मदिवस को मनाये जाने पर हम एक चर्चा करने निकलें हैं आइये कुछ बातों पर ध्यान दें

१. आज हम जन्मदिन दिनांक अनुसार मनाते हैं तिथि के अनुसार नहीं, तिथि नुसार जन्मदिन मनाने से उस दिन हमारे सभी सूक्ष्म देह के द्वार आशीर्वाद हेतु खुल जाते हैं

२. आज हम अन्धानुकरण करते हुए अर्धरात्रि को शुभकामनायें देते हैं जो वास्तविक रूप में अशुभ की घड़ी होती है, किसी भी शुभकार्य को अर्धरात्रि में न कर उसे टालना चाहिए
वैदिक संस्कृति के अनुसार दिवस का आरम्भ सूर्योदय से होता है अतः शुभकामनायें सूर्योदय उपरांत ही देनी चाहिए

३. आज हम जन्मदिवस पर मोमबत्ती जलाते हैं, मोमबत्ती ‘तम’ प्रधान है� वहीँ ‘दीप’ राज-सत्त्व प्रधान होता है अतः जन्मदिन जैसे शुभ दिवस पर हम मोमबत्ती जलाकर तमो गुण का प्रभाव अपने अन्दर बढ़ाते हैं जबकि जन्मदिन पर हमें आरती उतारनी चाहिए

४. आज हम मोमबत्ती को जलाकर बुझाते हैं, ज्योत को मुख से फूंकना या उसे बुझाना दोनों ही अशुभ है इससे हमारे जीवन के अनिष्ट शक्ति के कष्ट बढ़ते हैं और तेज तत्त्व जो हमें तेजस्वी बनाता है उसके स्थान पर हम तमोगुणी बनाने का प्रयास करते है

५. किसी चीज को काटना एक विध्वंशक कृति है परन्तु हम केक काटते हैं और अन्नपूर्ण मां की अवकृपा उस शुभ दिवस में प्राप्त करते हैं जबकि हमें इस दिन दरिद्र, अनाथ या संत जन को अन्नदान करना चाहिए जिससे हम पर अन्नपूर्ण माँ की कृपा बनी रहे और घर पर खीर, हलवा जैसा भोग कुलदेवी को चढ़ाकर ग्रहण करना चाहिए और बांटना चाहिए

६. हम एक दूसरे को प्रेम का दिखावा करते हुए एक दूसरे को झूठन खिलाते हैं वस्तुतः झूठन कभी नहीं ग्रहण करना चाहिए इससे जिस व्यक्ति को अनिष्ट शक्ति का कष्ट होता है वह हमसे सहज ही संक्रमित हो जाता है (आज समाज में ३०% साधारण व्यक्ति को और ५०% अच्छे साधक को अनिष्ट शक्ति का कष्ट है )

७. उस दिन हम सहर्ष उपहार स्वीकार करते हैं इससे आध्यात्मिक दृष्टि से हमारा लेन-देन बढ़ता है और हम जन्म मृत्यु के चक्र में और जकड जाते हैं

८. हम होटल में जाकर तमोगुणी भोजन ग्रहण करते हैं