संस्कृति -MEN With a Noble Mission

A new age Bala Gangadhara Tilak at Hyderabad. He spends his own pension money filling potholes across the streets, that too doing it personally. Hats off to him, and shame on the local administration.


{Paper Cutout Source: Tarun Reddy}



This Frenchman fixes potholed Mysore roads

Kevin Mendonsa, TNN Dec 14, 2012, 06.17AM IST


MYSORE: It’s not the government’s job alone to fix bad roads, even individuals have a responsibility, says Francis Bobo. The 61-year-old Frenchman would rightly know for he has been quietly repairing any pothole or bad road he comes across in Mysore in whatever way he can.
Francis even keeps a repair kit, including a spade and a few gunny bags permanently in his four-wheeler. Whenever he finds debris in his farmland or anywhere else, he fills it up on roads which are in bad shape. It’s a temporary fix to the problem but at least covers a gaping hole.

Source – http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2012-12-14/mysore/35818981_1_mysore-roads-fixes-gunny-bags

Mr.Kalayanasundaram worked as a Librarian for 30 years. 
Every month in his 30 year experience(service), he donated his entire salary to help the needy. He worked as a server in a hotel to meet his needs. He donated even his pension amount of about TEN(10) Lakh rupees to the needy.

He is the first person in the world to spend the entire earnings for a social cause. In recognition to his service, (UNO)United Nations Organisation adjudged him as one of the Outstanding People of the 20th Century.. An American organisation honored him with the ‘Man of the Millennium’ award. He received a sum of Rs 30 cores as part of this award which he distributed entirely for the needy as usual.


Moved by his passion to help others, Super Star Rajinikanth adopted him as his father. He still stays as a bachelor and dedicated his entire life for serving the society.

We all Indians should be PROUD. UNO has honored him but we Indians don’t even know that such a personality exist amongst us.

At least have the courtesy to pass this on and on till the whole world comes to know about this Great Good Samaritan.

Man of the Millennium…..

Hat’s off Kalayanasundaram.. We Indians are extremely proud of you and proudly say “EVEN THIS , HAPPENS ONLY IN INDIA”

संस्कृति – कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के पिताश्री: महर्षि पाणिनि —–

कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के पिताश्री: महर्षि पाणिनि —–
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मेरे सनातनी भारतीय भाइयों महर्षि पाणिनि के बारे में बताने पूर्व में आज की कंप्यूटर प्रोग्रामिंग किस प्रकार कार्य करती है इसके बारे में कुछ जरा सा बताना चाहूँगा चूँकि में भी एक कंप्यूटर इंजिनियर हूँ । आज की कंप्यूटर प्रोग्रामिंग भाषाएँ जैसे c, c++, java आदि में प्रोग्रामिंग हाई लेवल लैंग्वेज (high level language) में लिखे जाते है जो अंग्रेजी के सामान ही होती है | इसे कंप्यूटर की गणना सम्बन्धी व्याख्या (theory of computation) जिसमे प्रोग्रामिंग के syntex आदि का वर्णन होता है, के द्वारा लो लेवल लैंग्वेज (low level language) जो विशेष प्रकार का कोड होता है जिसे mnemonic कहा जाता है जैसे जोड़ के लिए ADD, गुना के लिए MUL आदि में परिवर्तित किये जाते है | तथा इस प्रकार प्राप्त कोड को प्रोसेसर द्वारा द्विआधारी भाषा (binary language: 0101) में परिवर्तित कर क्रियान्वित किया जाता है |
इस प्रकार पूरा कंप्यूटर जगत theory of computation पर निर्भर करता है |
इसी computation पर महर्षि पाणिनि (लगभग 500 ई पू) ने संस्कृत व्याकरण द्वारा एक पूरा ग्रन्थ रच डाला |

महर्षि पाणिनि संस्कृत भाषा के सबसे बड़े व्याकरण विज्ञानी थे | इनका जन्म उत्तर पश्चिम भारत के गांधार में हुआ था। इनके व्याकरण का नाम अष्टाध्यायी है जिसमें आठ अध्याय और लगभग चार सहस्र सूत्र हैं। संस्कृत भाषा को व्याकरण सम्मत रूप देने में पाणिनि का योगदान अतुलनीय माना जाता है। अष्टाध्यायी मात्र व्याकरण ग्रंथ नहीं है। इसमें प्रकारांतर से तत्कालीन भारतीय समाज का पूरा चित्र मिलता है।
इनके द्वारा भाषा के सन्दर्भ में किये गये महत्त्व पूर्ण कार्य 19वी सदी में प्रकाश में आने लगे |
19वी सदी में यूरोप के एक भाषा विज्ञानी Franz Bopp (14 सितम्बर 1791 – 23 अक्टूबर 1867) ने श्री पाणिनि के कार्यो पर गौर फ़रमाया । उन्हें पाणिनि के लिखे हुए ग्रंथों में तथा संस्कृत व्याकरण में आधुनिक भाषा प्रणाली को और परिपक्व करने के नए मार्ग मिले |
इसके बाद कई संस्कृत के विदेशी चहेतों ने उनके कार्यो में रूचि दिखाई और गहन अध्ययन किया जैसे: Ferdinand de Saussure (1857-1913), Leonard Bloomfield (1887 – 1949) तथा एक हाल ही के भाषा विज्ञानी Frits Staal (1930 – 2012).

तथा इसी क्रम में आगे बढ़ते हुए 19वि सदी के एक जर्मन विज्ञानी Friedrich Ludwig Gottlob Frege (8 नवम्बर 1848 – 26 जुलाई 1925 ) ने इस क्षेत्र में कई कार्य किये और इन्हें आधुनिक जगत का प्रथम लॉजिक विज्ञानी कहा जाने लगा |

जबकि इनके जन्म से लगभग 2400 वर्ष पूर्व ही श्री पाणिनि इन सब पर एक पूरा ग्रन्थ सीना ठोक के लिख चुके थे |
अपनी ग्रामर की रचना के दोरान पाणिनि ने auxiliary symbols (सहायक प्रतीक) प्रयोग में लिए जिसकी सहायता से कई प्रत्ययों का निर्माण किया और फलस्वरूप ये ग्रामर को और सुद्रढ़ बनाने में सहायक हुए |
इसी तकनीक का प्रयोग आधुनिक विज्ञानी Emil Post (फरवरी 11, 1897 – अप्रैल 21, 1954) ने किया और आज की समस्त computer programming languages की नीव रखी |
Iowa State University, अमेरिका ने पाणिनि के नाम पर एक प्रोग्रामिंग भाषा का निर्माण भी किया है जिसका नाम ही पाणिनि प्रोग्रामिंग लैंग्वेज रखा है: यहाँ देखे |

एक शताब्दी से भी पहले प्रिसद्ध जर्मन भारतिवद मैक्स मूलर (१८२३-१९००) ने अपने साइंस आफ थाट में कहा –

“मैं निर्भीकतापूर्वक कह सकता हूँ कि अंग्रेज़ी या लैटिन या ग्रीक में ऐसी संकल्पनाएँ नगण्य हैं जिन्हें संस्कृत धातुओं से व्युत्पन्न शब्दों से अभिव्यक्त न किया जा सके । इसके विपरीत मेरा विश्वास है कि 2,50,000 शब्द सम्मिलित माने जाने वाले अंग्रेज़ी शब्दकोश की सम्पूर्ण सम्पदा के स्पष्टीकरण हेतु वांछित धातुओं की संख्या, उचित सीमाओं में न्यूनीकृत पाणिनीय धातुओं से भी कम है ।
अंग्रेज़ी में ऐसा कोई वाक्य नहीं जिसके प्रत्येक शब्द का 800 धातुओं से एवं प्रत्येक विचार का पाणिनि द्वारा प्रदत्त सामग्री के सावधानीपूर्वक वेश्लेषण के बाद अविशष्ट 121 मौलिक संकल्पनाओं से सम्बन्ध निकाला न जा सके ।”

The M L B D News letter ( A monthly of indological bibliography) in April 1993, में महर्षि पाणिनि को first softwear man without hardwear घोषित किया है। जिसका मुख्य शीर्षक था ” Sanskrit software for future hardware “
जिसमे बताया गया ” प्राकृतिक भाषाओं (प्राकृतिक भाषा केवल संस्कृत ही है बाकि सब की सब मानव रचित है ) को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए अनुकूल बनाने के तीन दशक की कोशिश करने के बाद, वैज्ञानिकों को एहसास हुआ कि कंप्यूटर प्रोग्रामिंग में भी हम 2600 साल पहले ही पराजित हो चुके है। हालाँकि उस समय इस तथ्य किस प्रकार और कहाँ उपयोग करते थे यह तो नहीं कह सकते, पर आज भी दुनिया भर में कंप्यूटर वैज्ञानिक मानते है कि आधुनिक समय में संस्कृत व्याकरण सभी कंप्यूटर की समस्याओं को हल करने में सक्षम है।

व्याकरण के इस महनीय ग्रन्थ मे पाणिनि ने विभक्ति-प्रधान संस्कृत भाषा के 4000 सूत्र बहुत ही वैज्ञानिक और तर्कसिद्ध ढंग से संगृहीत हैं।

NASA के वैज्ञानिक Mr.Rick Briggs.ने अमेरिका में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (artificial intelligence) और पाणिनी व्याकरण के बीच की शृंखला खोज की। प्राकृतिक भाषाओं को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए अनुकूल बनाना बहुत मुस्किल कार्य था जब तक कि Mr.Rick Briggs. द्वारा संस्कृत के उपयोग की खोज न गयी।
उसके बाद एक प्रोजेक्ट पर कई देशों के साथ करोड़ों डॉलर खर्च किये गये।

महर्षि पाणिनि शिव जी बड़े भक्त थे और उनकी कृपा से उन्हें महेश्वर सूत्र से ज्ञात हुआ जब शिव जी संध्या तांडव के समय उनके डमरू से निकली हुई ध्वनि से उन्होंने संस्कृत में वर्तिका नियम की रचना की थी।
तथा इन्होने महादेव की कई स्तुतियों की भी रचना की |

पाणिनीय व्याकरण की महत्ता पर विद्वानों के विचार:

“पाणिनीय व्याकरण मानवीय मष्तिष्क की सबसे बड़ी रचनाओं में से एक है” (लेनिन ग्राड के प्रोफेसर टी. शेरवात्सकी)।
“पाणिनीय व्याकरण की शैली अतिशय-प्रतिभापूर्ण है और इसके नियम अत्यन्त सतर्कता से बनाये गये हैं” (कोल ब्रुक)।
“संसार के व्याकरणों में पाणिनीय व्याकरण सर्वशिरोमणि है… यह मानवीय मष्तिष्क का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अविष्कार है” (सर डब्ल्यू. डब्ल्यू. हण्डर)।
“पाणिनीय व्याकरण उस मानव-मष्तिष्क की प्रतिभा का आश्चर्यतम नमूना है जिसे किसी दूसरे देश ने आज तक सामने नहीं रखा”। (प्रो. मोनियर विलियम्स)

संस्कृत का डंका :
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कई कल्पों पूर्व तक पूरी पृथ्वी पर जहाँ जहाँ उचित सभ्यता थी वह केवल संस्कृत ही एक मात्र भाषा थी अब वही समय पुनः आ रहा है |
जब से नासा को अपने परीक्षणों द्वारा ज्ञात हुआ की अनंत अन्तरिक्ष में कम्पायमान ध्वनी ॐ है
और यह भी सिद्ध हो चूका है की ॐ प्रणव (ध्वनी ) से ही सृस्ठी की उत्पत्ति हुई है । इस पर भी एक लेख हम जल्दी ही प्रकाशित करेंगे ।
तब से नासा की खपड़ी घूम गई है |
अब नासा कंप्यूटर की भाषा संस्कृत को बनाने की सोच रही है और अन्तरिक्ष में ॐ ध्वनी का संचार करने का विचार कर रही है |
यहाँ देखे :

http://www.ibtl.in/news/international/1815/nasa-to-echo-sanskrit-in-space-website-confirms-its-mission-sanskrit/
http://post.jagran.com/NASA-to-use-Sanskrit-as-computer-language-1332758613

 इस सृष्टी  की उत्पत्ति ॐ प्रणव (शिव नाद) से हुई है और इसी से पञ्च महाभूतों (जल,पृथ्वी, अग्नि, वायु और आकाश ) की भी उत्पति हुई है |
ये तो हमारे ग्रंथो, वेदों में आदि काल से लिखा हुआ है हमसे ही पुछ लेते इतने पैसे व्यर्थ में ही प्रयोगों में खर्च किये | 

संस्कृति – BHAGAT SINGH


शहीदे आज़म भगत सिंह

सिर्फ आज़ादी हमारा मकसद नहीं है आज़ादी का मतलब क्या है है कि हुकूमत अंग्रेज़ों के हाथ से निकलकर मुटठी भर रईस और ताकतवर हिन्दुस्तानियों के हाथ लग जाये क्या यही आज़ादी है इससे आम आदमी की ज़िन्दगी पर कोई फर्क आयेगा क्या मजदूर और किसान वर्ग के हालात बदलेंगे उन्हें उनका सही हक मिलेगा नहीं आज़ादी सिर्फ पहला कदम है कारमेडस् मकसद है एक वतन बनाना एक एसा वतन जहाँ हर तबके के लोगों को बराबरी से जीने का हक मिले जहां मज़हब के नाम पर समाज में बँटवारा ना हो एक ऐसा वतन जो इन्सान का इन्सान पर जुल्म बर्दाश्त न करे यह मुश्किल है पर असंभव नहीं हिन्दुस्तान जहाँ इतनी सारी जातियाँ भाषाऐं कल्चर हैं उसे एक साथ जोडे रखना आसान नहीं मगर हम इस बात को हम आज नहीं समझेंगे और इस मसले को लेकर आज संघर्ष नहीं करेंगे तो हिन्दुस्तान एक आज़ाद मुल्क तो होगा पर एक भ्रष्ट शोषक और साम्प्रदायिक समाज़ बन कर रह जायेगा कारमेडस् हम सब को मिलकर बनाना है एक समाजवादी वतन और ये हमारी पाट्री के नाम में साफ झलकना चाहिये इसीलिये हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसियेशन को अब हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन के नाम से बनाना है।

क्या आप लोग मेरे साथ हैं

शहीदे आज़म भगत सिंह

मेरी शिक्षा मातृभाषा में हुई, इसलिए ऊँचा वैज्ञानिक बन सका – अब्दुल कलाम

MERI SHIKSHA MATRABHASHA MAIN HUE, ISLIYE UNCHA VAGYANIK BAN SAKA-ABDUL KALAM

उच्च तकनीकी क्षेत्र जैसे उपग्रह निर्माण जिसे उच्च तकनीक कहा जाता जो बहुत कठिन एवं क्लिष्ट तकनीक होती है, उसमें आज तक कोई विदेशी कंपनी इस देश में नहीं आई

भारत जिसने १९९५ एक आर्यभट्ट नमक उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़ा एवं उसके उपरांत हमारे अनेकों उपग्रह अंतरिक्ष में गए है
अब तो हम दूसरे देशों के उपग्रह भी अंतरिक्ष में छोड़ने लगे है इतनी तकनीकी का विकास इस देश में हुआ है यह संपूर्ण स्वदेशी पद्दति से हुआ है, स्वदेशी के सिद्धांत पर हुआ है एवं स्वदेशी आंदोलन की भावना के आधार पर हुआ है
इसमें जिन वैज्ञानिकों ने कार्य किया है वह स्वदेशी, जिस तकनीकी का उपयोग किया गया है वह स्वदेशी, जो कच्चा माल उपयोग किया गया है वह स्वदेशी, इसमें जो तकनीक एवं कर्मकार लोगों का सहयोग प्राप्त हुआ वह सब स्वदेशी, इनको अंतरिक्ष में प्रक्षेपित करने हेतु जो कार्य हुआ है वह भी हमारी प्रयोगशालाएं स्वदेशी इनके नियंत्रण का कार्य होता है वह प्रयोगशालाएं भी स्वदेशी तो यह उपग्रह निर्माण एवं प्रक्षेपण का क्षेत्र स्वदेशी के सिद्धांत पर आधारित है
एक और उदाहरण है ” प्रक्षेपास्त्रों के निर्माण ” (मिसाइलों को बनाने) का क्षेत्र आज से तीस वर्ष पूर्व तक हम प्रक्षेपास्त्रों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर थे या तो रूस के प्रक्षेपास्त्र हमे मिले अथवा अमेरिका हमको दे किंतु पिछले तीस वर्षों में भारत के वैज्ञानिकों ने विशेष कर ” रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन ” (डी.आर.डी.ओ.) के वैज्ञानिकों के अथक परिश्रम कर प्रक्षेपास्त्र बनाने की स्वदेशी तकनीकी विकसित की १०० ,२०० ,५०० … से आगे बढ़ते हुए आज हमने ५००० किमी तक मार करने की क्षमता वाले प्रक्षेपास्त्रों को विकसित किया है
जिन वैज्ञानिकों ने यह पराक्रम किया है परिश्रम किया है वह सारे वैज्ञानिक बधाई एवं सम्मान के पात्र है, विदेशों से बिना एक पैसे की तकनीकी लिए हुए संपूर्ण स्वदेशी एवं भारतीय तकनीकी पद्दति से उन्होंने प्रक्षेपास्त्र बना कर विश्व के सामने एक आदर्श प्रस्तुत किया
जिन वैज्ञानिकों ने यह सारा पराक्रम किया सारा परिश्रम किया महत्व की बात उनके बारे में यह है की वह सब यहीं जन्मे, यहीं पले-पढ़े, यहीं अनुसंधान (रिसर्च) किया एवं विश्व में भारत को शीर्ष पर स्थापित कर दिया

श्री ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, भारत में प्रक्षेपास्त्रों की जो परियोजना चली उसके पितामहः माने जाते है
श्री ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जी से जब एक दिवस पूछा गया की आप इतने महान वैज्ञानिक बन गए, इतनी उन्नति आपने कर ली, आप इसमें सबसे बड़ा योगदान किसका मानते है तो उन्होंने उत्तर दिया था की ” मेरी पढ़ाई मातृभाषा में हुई है अतैव मैं इतना ऊँचा वैज्ञानिक बन सका हूँ “, आपको ज्ञात होगा कलाम जी की १२ वीं तक की पढ़ाई तमिल में हुई है
उसके उपरांत उन्होंने थोड़ी बहुत अंग्रेजी सीख स्वयं को उसमें भी दक्ष बना लिया किंतु मूल भाषा उनकी पढ़ाई की तमिल रही
कलाम जी के अतिरिक्त इस परियोजना में जितने और भी वैज्ञानिक है उन सभी की मूल भाषा मलयालम, तमिल, तेलगु, कन्नड़, बांग्ला, हिंदी, मराठी, गुजराती आदि है अर्थात हमारी मातृभाषा में जो वैज्ञानिक पढ़ कर निकले उन्होंने स्वदेशी तकनीकी का विकास किया एवं देश को सम्मान दिलाया है
परमाणु अस्त्र निर्माण एवं परिक्षण भी श्री होमी भाभा द्वारा स्वदेशी तकनीकी विकास के स्वप्न, उसको पूर्ण करने हेतु परिश्रम की ही देन है
अब तो हमने परमाणु अस्त्र निर्माण एवं परिक्षण के अतिरिक्त उसे प्रक्षेपास्त्रों पर लगा कर अंतरिक्ष तक भेजने में एवं आवश्यकता पढ़ने पर उनके अंतरिक्ष में उपयोग की सिद्धि भी हमारे स्वदेशी वैज्ञानिकों ने अब प्राप्त कर ली है
यह भी संपूर्ण स्वदेशी के आग्रह पर हुआ है
अब तो हमने पानी के नीचे भी परमाणु के उपयोग की सिद्धि प्राप्त कर ली है संपूर्ण स्वदेशी तकनीकी से निर्मित अरिहंत नामक परमाणु पनडुब्बी इसका ज्वलंत प्रमाण है
जल में, थल में, अंतरिक्ष में हमने विकास किया
यह सारी विधा का प्रयोग स्वदेशी वैज्ञानिकों ने किया, स्वदेशी तकनीकी से किया, स्वदेशी आग्रह के आधार पर किया एवं स्वदेशी का गौरव को संपुर्ण विश्व में प्रतिष्ठापित किया

यह कार्य उच्च तकनीकी के होते है प्रक्षेपास्त्र, उपग्रह, परमाणु विस्फोटक पनडुब्बी, जलयान, जलपोत महा संगणक (सुपर कंप्यूटर) निर्माण आदि एवं इन सब क्षेत्रों में हम बहुत आगे बढ़ चुके है स्वदेशी के पथ पर
स्वदेशी के स्वाभिमान से ओत प्रोत भारत के महा संगणक यंत्र ” परम १०००० ” के निर्माण के जनक विजय भटकर (मूल पढ़ाई मराठी ) की कथा सभी भारतियों को ज्ञात है, उनके लिए प्रेरक है
इतने सारे उदाहरण देने के पीछे एक ही कारण है वह यह की भारत में तकनीकी का जितन विकास हो रहा है वह सब स्वदेशी के बल से हो रहा है, स्वदेशी आग्रह से हो रहा, स्वदेशी गौरव एवं स्वदेशी अभिमान के साथ हो रहा है
नवीन तकनीकी हमको कोई ला कर नहीं देने वाला, विदेशी देश हमे यदि देती है तो अपनी २० वर्ष पुरानी तकनीकी जो उनके देश में अनुपयोगी, फैकने योग्य हो चुकी है
इसके उदाहरण है जैसे कीटनाशक, रसायनिक खाद निर्माण की तकनीकी स्वयं अमेरिका में बीस वर्ष पूर्व से जिन कीटनाशकों का उत्पादन एवं विक्रय बंद हो चुका है एवं उनके कारखाने उनके यहाँ अनुपयोगी हो गए है
अमेरिका १४२ विदेशी कंपनियों के इतने गहरे गहरे षड्यंत्र चल रहे है इन्हें समझना हम प्रारंभ करे अपनी आंखे खोले, कान खोले दिमाग खोले एवं इनसे लड़ने की तैयारी अपने जीवन में करे भारत स्वाभिमान इसी के लिए बनाया गया एक मंच है जो इन विदेशी कंपनियों की पूरे देश में पोल खोलता है एवं पूरे देश को इनसे लड़ने का सामर्थ्य उत्पन्न करता है
हमे इस बात का स्मरण रखना है की इतिहास में एक भूल हो गई थी जहांगीर नाम का एक राजा था उसने एक विदेशी कंपनी को अधिकार दे दिया था इस देश में व्यापार करने का परिणाम यह हुआ की जिस कंपनी को जहांगीर ने बुलाया था उसी कंपनी ने जहांगीर को गद्दी से उतरवा दिया एवं वह कंपनी इस देश पर अधिकार कर लिया ०६ लाख ३२ सहस्त्र ०७ सौ इक्यासी (६,३२,७००) क्रांतिकारियों ने अपने बलिदान से उन्हें भगाया था

आवश्यकता अविष्कार की जननी है हमे जिसकी आवश्यकता थी हमने उसका अविष्कार किया विश्व के देशों में जो दवाईयां २०-२० वर्षों से बंद हो गई है जिन्हें ‘क’, ‘ख’, ‘ग’ वर्गीय विष (ए,बी,सी, क्लास ) जो बहुत ही भयंकर विष है ऐसी दवाईयां ला कर विदेशी कंपनियां भारत में विक्रय करती है ऐसी ५ सहस्त्र दवाइयों की हमने सूची बनाई है जिनमें से कुछ औक्सिफन बुटाजोंन, फिनाइल बुटाजों, एक्टइमाल, एल्जिरिअल, बूटा कार्दिडान, बूटा प्रोक्सिवान ये सात दवाएँ है जो ब्रिटेन में पश्चिमी जर्मनी, फ्रांस, ईटली, फिनलैंड, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, मलेशिया, इज़राइल, जॉर्डन एवं हमारे पड़ोसी बंगलादेश तक में पिछले २० वर्षों से प्रतिबंधित है
जब यह सहस्त्रों करोड़ो रूपये लूटती है उसका बहुत दुःख होता है १९४७ तक मात्र १० करोड़ रु. की दवाएँ विक्रय करते थे आज ७० सहस्त्र करोड़ रु से भी अधिक की दवाएँ विक्रय करते है जिनमें से अधिकांश की तो हमे आवश्यकता ही नहीं है जस्टिस हाथी कमीशन ने स्पष्ट रूप से कहा था की भारत में जितने भी रोग है उनके निवारण हेतु एलोपेथी की मात्र ११७ प्रकार की दवाइयों की आवश्यकता है परंतु आज देश में ८४,००० (84,000) प्रकार की दवाइयों का विक्रय हो रहा है

अत: हम सबको यह लूट समझनी होगी एवं इस मकडजाल से बहार निकलना होगा, समझना होगा – हम प्रातः आँख खुलते ही हम उनके चंगुल में फंस चुके होते हैं बस सवेरा हुआ हम इन कंपनियों द्वारा निर्मित ब्रुश, टूथपेस्ट हमारे हाथों में आ जाते हैं फिर साबुन हैं क्रीम हैं ब्लेड हैं तरह तरह के सौंदर्य प्रसाधन हैं लगभग हम शरीर की सफाई ही प्रारंभ करते हैं इन कम्नियों के द्वारा बनाये गए सामानों से आज भारत की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से उन कंपनियों की गुलाम बन चुकी है …

15 GREAT THOUGHTS BY CHANAKYA…

चाणक्य के 15 सूक्ति वाक्य —-
                                             

1) “दूसरो की …गलतियों से सीखो अपने ही ऊपर प्रयोग करके सीखने को तुम्हारी आयु कम पड़ेगी.”

2)”किसी भी व्यक्ति को बहुत ईमानदार (सीधा साधा ) नहीं होना चाहिए —सीधे वृक्ष और व्यक्ति पहले काटे जाते हैं.”

3)”अगर कोई सर्प जहरीला नहीं है तब भी उसे जहरीला दिखना चाहिए वैसे डंस भले ही न दो पर डंस दे सकने की क्षमता का दूसरों को अहसास करवाते रहना चाहिए. “

4)”हर मित्रता के पीछे कोई स्वार्थ जरूर होता है –यह कडुआ सच है.”

5)”कोई भी काम शुरू करने के पहले तीन सवाल अपने आपसे पूछो —मैं ऐसा क्यों करने जा रहा हूँ ? इसका क्या परिणाम होगा ? क्या मैं सफल रहूँगा ?”

6)”भय को नजदीक न आने दो अगर यह नजदीक आये इस पर हमला करदो यानी भय से भागो मत इसका सामना करो .”

7)”दुनिया की सबसे बड़ी ताकत पुरुष का विवेक और महिला की सुन्दरता है.”

8)”काम का निष्पादन करो , परिणाम से मत डरो.”

9)”सुगंध का प्रसार हवा के रुख का मोहताज़ होता है पर अच्छाई सभी दिशाओं में फैलती है.”

10)”ईश्वर चित्र में नहीं चरित्र में बसता है अपनी आत्मा को मंदिर बनाओ.”

11) “व्यक्ति अपने आचरण से महान होता है जन्म से नहीं.”

12) “ऐसे व्यक्ति जो आपके स्तर से ऊपर या नीचे के हैं उन्हें दोस्त न बनाओ,वह तुम्हारे कष्ट का कारण बनेगे. सामान स्तर के मित्र ही सुखदाई होते हैं .”

13) “अपने बच्चों को पहले पांच साल तक खूब प्यार करो. छः साल से पंद्रह साल तक कठोर अनुशासन और संस्कार दो .सोलह साल से उनके साथ मित्रवत व्यवहार करो.आपकी संतति ही आपकी सबसे अच्छी मित्र है.”

14) “अज्ञानी के लिए किताबें और अंधे के लिए दर्पण एक सामान उपयोगी है .”
15) “शिक्षा सबसे अच्छी मित्र है. शिक्षित व्यक्ति सदैव सम्मान पाता है. शिक्षा की शक्ति के आगे युवा शक्ति और सौंदर्य दोनों ही कमजोर हैं .”