लौंग का तेल है फायदेमंद —

 

लौंग भले ही छोटी है, मगर उसके प्रभाव बड़े गुणकारी हैं। साथ ही लौंग का तेल भी काफी लाभकारी होता है। इसमें कैल्शियम, आयरन, फास्फोरस, सोडियम, पोटेशियम, विटामिन ए और सी पाया जाता है। लौंग भूख बढ़ाने का भी काम करती है, लेकिन इसे ज्यादा मात्रा में नहीं खाना चाहिए। इसका इस्तेमाल कई रोगों के उपचार में किया जाता है:

दांत दर्द में उपयोगी
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लौंग का तेल दांत, मसूड़ों में दर्द और मुंह में अल्सर के लिए खासतौर पर उपयोगी होता है। यह सांसों की बदबू को दूर करने का काम करता है। दांत में दर्द होने पर लौंग के तेल की कुछ बूंदें फाहे पर डालकर दर्द वाले हिस्से पर रखें आराम मिलेगा।

संक्रमण
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एंटीसेप्टिक गुणों के कारण यह चोट, घाव, खुजली और संक्रमण में भी काफी उपयोगी होता है। इसका उपयोग कीटों के काटने या डंक मारने पर भी किया जाता है लेकिन संवेदनशाल त्वचा पर इसे नहीं लगाना चाहिए।

त्वचा की देखभाल
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लौंग के तेल का इस्तेमाल मुंहासे के उपचार में भी किया जाता है।

तनाव
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अपने विशिष्ट गुण के कारण यह मानसिक दबाव और थकान को कम करने का काम करता है। यह अनिद्रा के मरीजों और मानसिक बीमारियों जैसे कम होती याददाश्त, अवसाद और तनाव में उपयोगी होता है।

सिरदर्द
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लौंग के तेल में नमक मिलाकर सिर पर लगाने से ठंडक का एहसास होता है। नारियल के तेल में लौंग के तेल की 8-10 बूंदें डालकर सिर पर मालिश करने से सिरदर्द जाता रहता है।

सांस की बीमारी
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लौंग के तेल का इस्तेमाल खांसी, जुकाम, अस्थमा, तपेदिक, फेफड़े में सूजन आदि बीमारियों के उपचार में उपयोगी होता है। गले में खराश के दौरान लौंग को चूसना फायदेमंद होता है।

कान में दर्द
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लौंग के तेल को तिल के तेल (सेसमी आयल) के साथ मिलाकर डालना से दर्द में राहत मिलती है।

मतली
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लौंग का तेल उल्टी या मतली के दौरान काफी उपयोगी होता है। यह गर्भ ठहरने के दौरान होने वाली मतली में उपयोगी होता है।

डायबिटीज
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खून की सफाई के साथ-साथ लौंग का तेल ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में मददगार होता है।

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Sri Sri on INDIAN COW

“There are two types of milk protein – A1 Beta Casein and A2 Beta Casein. The milk from 

Jersey cows (not native to India) contains A1 Beta Casein while the milk from the cows 

native to India contains A2 Beta Casein. The type A1 causes Autism, Schizophrenia, 

Stomach Ulcer, Ulceritic Colitis, Crohn’s disease, etc. They have done about a hundred kinds 

of research on this. It is mentioned that people are falling sick after drinking milk that 

contains the A1 type milk protein. It is suggested to use milk that contains the A2 type of 

milk protein. This type can be found in goat’s milk, sheep milk, human milk and native 

cow’s milk. It is mentioned that infants have to be given mother’s milk only. We need to use 

milk from cows native to India, even if they give a lesser quantity of milk. However, the 

imported cows, though they give more milk, it is not beneficial to our health.” – SRI SRI

इलाज – अर्जुन की छाल के फ़ायदे ——–

अर्जुन की छाल के फ़ायदे ——–

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शरीर शास्त्री वैज्ञानिकों और चिकित्सकों ने अनुसंधान व प्रयोगों में ‘अर्जुन’ वृक्ष को हृदय रोग की 

चिकित्सा में बहुत गुणकारी पाया है।

आयुर्वेद ने तो सदियों पहले इसे हृदय रोग की महान औषधि घोषित कर दिया था। आयुर्वेद के प्राचीन 

विद्वानों में वाग्भट, चक्रदत्त और भावमिश्र ने इसे हृदय रोग की महौषधि स्वीकार किया है।

विभिन्न भाषाओं में नाम : संस्कृत- ककुभ। हिन्दी- अर्जुन, कोह। मराठी- अर्जुन सादड़ा। गुजराती- सादड़ो 

। तेलुगू- तेल्लमद्दि। कन्नड़- मद्दि। तमिल मरुतै, बेल्म। इंग्लिश- अर्जुना। लैटिन- टरमिनेलिया अर्जुन।

गुण : यह शीतल, हृदय को हितकारी, कसैला और क्षत, क्षय, विष, रुधिर विकार, मेद, प्रमेह, व्रण, कफ 

तथा पित्त को नष्ट करता है।

परिचय : इसका वृक्ष 60 से 80 फीट तक ऊंचा होता है। इसके पत्ते अमरूद के पत्तों जैसे होते हैं। यह 

विशेषकर हिमालय की तराई, बंगाल, बिहार और मध्यप्रदेश के जंगलों में और नदी-नालों के किनारे 

पंक्तिबद्ध लगा हुआ पाया जाता है। ग्रीष्म ऋतु में फल पकते हैं।

उपयोग : इसका मुख्य उपयोग हृदय रोग के उपचार में किया जाता है। यह हृदय रोग की महाऔषधि माना 

जाता है। इसके अलावा इसका उपयोग रक्तपित्त, प्रमेह, मूत्राघात, शुक्रमेह, रक्तातिसार तथा क्षय और खांसी 

में भी लाभप्रद रहता है।

हृदय रोग : हृदय रोग के रोगी के लिए अर्जुनारिष्ट का सेवन बहुत लाभप्रद सिद्ध हुआ है। दोनों वक्त भोजन 

के बाद 2-2 चम्मच (बड़ा चम्मच) यानी 20-20 मि.ली. मात्रा में अर्जुनारिष्ट आधा कप पानी में डालकर 2-3 

माह तक निरंतर पीना चाहिए। इसके साथ ही इसकी छाल का महीन चूर्ण कपड़े से छानकर 3-3 ग्राम 

(आधा छोटा चम्मच) मात्रा में ताजे पानी के साथ सुबह-शाम सेवन करना चाहिए।

रक्तपित्त : चरक के अनुसार, इसकी छाल रातभर पानी में भिगोकर रखें, सुबह इसे मसल-छानकर या काढ़ा 

बनाकर पीने से रक्तपित्त नामक व्याधि दूर हो जाती है।

मूत्राघात : पेशाब की रुकावट होने पर इसकी अंतरछाल को कूट-पीसकर 2 कप पानी में डालकर उबालें। 

जब आधा कप पानी शेष बचे, तब उतारकर छान लें और रोगी को पिला दें। इससे पेशाब की रुकावट दूर हो 

जाती है। लाभ होने तक दिन में एक बार पिलाएं।

खांसी : अर्जुन की छाल को सुखा लें और कूट-पीसकर महीन चूर्ण कर लें। ताजे हरे अडूसे के पत्तों का रस 

निकालकर इस चूर्ण में डाल दें और चूर्ण सुखा लें, फिर से इसमें अडूसे के पत्तों का रस डालकर सुखा लें। 

ऐसा सात बार करके चूर्ण को खूब सुखाकर पैक बंद शीशी में भर लें। इस चूर्ण को 3 ग्राम (छोटा आधा 

चम्मच) मात्रा में शहद में मिलाकर चटाने से रोगी को खांसी में आराम हो जाता है।

अर्जुन वृक्ष भारत में होने वाला एक औषधीय और सदाबहार वृक्ष है भारतीय पहाड़ी क्षेत्रों में नदी-नाले के 

किनारे, सड़क के किनारे ओर जंगलों में यह महा औषधिये वर्क्ष बहुतायत में पाया जाता है। इसका उपयोग 

रक्तपित्त (खून की उल्टी), प्रमेह, मूत्राघात, शुक्रमेह, खूनी प्रदर, श्वेतप्रदर, पेट दर्द, कान का दर्द, मुंह की 

झांइयां,कोढ बुखार, क्षय और खांसी में भी लाभप्रद रहता है। हृदय रोग के लिए तो इसे रामबाण औषधि 

माना जाता है। यह नाडी की क्षीणता को सक्रिय करता है, पुराणी खांसी, श्वास दमा, मधुमेह, सूजन,जलने 

पर, मुंह के छाले पर और हिस्टीरिया आदि रोगों में लाभदायक है। हृदय की रक्तवाही नलिकाओं में थक्का 

बनने से रोकता है। यह शक्तिवर्धक, चोट से निकलते खून को रोकने वाला (रक्त स्तम्भक) एवं प्रमेह नाशक 

भी है। इसे मोटापे को रोकने, हड्डियों को जोड़ने में, खूनी पेचिश में, बवासीर में, खून की कलाटिंग रोकने 

में मदद करता है और केलोस्ट्राल को भी घटाता है। यह ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करता है, पत्थरी को 

निकलता है, लीवर को मजबूत करता है, बवासीर को ठीक करता है। ताकत को बढ़ाने के लिए और यह 

एंटीसेप्टिक का भी काम करता है।

अर्जुन की छाल शारीरिक कमजोरी में हृदयाघात में, हृदय शूल में खूनी बवासीर में पेशाब की जलन, श्वेत 

प्रदर, सूजन व दर्द में तथा चर्म रोगों में एक चम्मच अर्जुन की छाल चूर्ण रूप में घी या गुड़ के साथ देते हैं। 

हृदय गति ढीली पड़ने पर अर्जुन की छाल व गुड़ को दूध में उबाल कर पिलाते हैं।


एक चम्मच अर्जुन की छाल का चूर्ण एक कप (मलाई रहित) दूध के साथ सुबह-शाम नियमित सेवन करने 

से हृदय के सभी रोगों में लाभ मिलता है, दिल की धड़कन सामान्य होती है।

अर्जुन की छाल के चूर्ण को चाय के साथ एक चम्मच इस चूर्ण को उबालकर ले सकते हैं। उच्च रक्तचाप भी 

सामान्य हो जाता है। चायपत्ती की बजाये अर्जुन की छाल का चूर्ण डालकर ही चाय बनायें, यह और भी 

प्रभावी होगी। अर्जुन की छाल और गुड़ को दूध में उबाल कर रोगी को पिलाने से दिल मजबूत होता है और 

सूजन मिटता है।


एक गिलास टमाटर के रस में एक चम्मच अर्जुन की छाल का चूर्ण मिलाकर नियमित सेवन करने से दिल 

की धड़कन सामान्य हो जाती है।


अर्जुन की छाल और मिश्री मिला कर हलुवा बना ले, इसका नित्य सेवन करने से हृदय की पीड़ा, दिल की 

घबराहट, अनियमित धड़कन आदि से निजात मिलती हैं।


अर्जुन की छाल का दूध के साथ काढ़ा बना ले यह काढ़ा हार्ट अटैक हो चुकने पर सुबह शाम सेवन करें। इस 

से हृदय की तेज धड़कन, हृदय शूल, घबराहट में निश्चित तोर से कमी आती हैं।


अर्जुन की छाल को कपड़े से छान ले इस चूर्ण को जीभ पर रखकर चूसते ही हृदय की अधिक अनियमित 

धड़कनें नियमित होने लगती है। यह दोष रहित है और इस का प्रभाव तुरंत स्थायी तोर पर होने लगता है।


आधा किलो दूध में दो चम्मच (टेबल स्पून) अर्जुन की छाल का चूर्ण मिला कर उबालकर खोया बना लें और 

खोये के बराबर का मिश्री पाउडर मिलाकर, हर रोज इस मिठाई को खाकर दूध पीने से हृदय की अनियमित 

धड़कन सामान्य होती है।


अर्जुन की छाल को छाया में सुखाकर, कूट-पीसकर और छान कर चूर्ण बनाकर प्रतिदिन एक चम्मच चूर्ण 

गाय के घी और मिश्री के साथ मिलाकर सेवन करने से दिल की कमजोरी दूर होती है। अर्जुन की छाल को 

गुड़ और मुलेठी तीनों को दूध में उबालकर भी सेवन कर सकते है।


अर्जुन शक्तिदायक टानिक है जो अपने लवण-खनिजों से दिल की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है। घी, 

दूध ,मिश्री या गुड़ के साथ अर्जुन की छाल का महीन चूर्ण नियमित सेवन करने से हृदय रोग, जीर्णज्वर, 

रक्त पित्त रोग दूर होते है तथा सेवन करने वाले की उम्र भी बढाती है।

अर्जुन की छाल के चूर्ण की गुड़ के साथ फंकी लेने से जीर्ण ज्वर ठीक होता है। तथा रात को दूध और चावल 

की खीरबना कर इस में सुबह 4 बजे अर्जुन की छाल के 2 चम्मच चूर्ण को मिलाकर सेवन करने से श्वांस 

रोग नष्ट हो जाते है।

अर्जुन की छाल में जरा-सी भुनी हेई हींग और सेंधा नमक मिलाकर सुबह-शाम गुनगुने पानी के साथ फंकी 

लेने से गुर्दे का दर्द, पेट के दर्द और पेट की जलन में लाभ होता है।

अर्जुन हृदय के विराम काल को बढ़ाता है और ह्रदय को मजबूत करता है तथा यह शरीर में जमा नहीं होता। 

यह मल-मूत्र द्वारा स्वयं ही बाहर निकल जाता है।

अर्जुन की 2 चम्मच छाल को रातभर पानी में भिगोकर सुबह उसको उबालकर उसका काढ़ा पीने से रक्तपित्त 

(खून की उल्टी) में लाभ होता है। खून की उल्टी में अर्जुन की छाल के 2 चम्मच बारीक चूर्ण को दूध में 

पकाकर खाने से आराम आता है। इससे रक्त का बहना रुकता है।


रक्तदोष त्वचा रोग एवं कुष्ठ रोग में अर्जुन की छाल का 1 चम्मच चूर्ण पानी के साथ सेवन करने से व इसकी 

छाल को पानी में घिसकर त्वचा पर लेप करने एवं अर्जुन की छाल को पानी में उबालकर या गुनगुने पानी 

में मिलाकर नहाने से कुष्ठ और त्वचा रोगों में बहुत लाभ होता है।


अर्जुन की छाल को रातभर पानी में भिगोकर रखें, सुबह इसे मसलकर-छानकर या काढ़ा बनाकर पीने से 

रक्तपित्त रोग ठीक होता है।


पेशाब की रुकावट को खोलने के लिए अर्जुन की छाल को एक गिलास पानी में डालकर 1/4 भाग शेष रह 

जाने तक उबालें। और छान कर रोगी को हर रोज सुबह लाभ होने तक पिलाये, पेशाब के खुलने के साथ-

साथ धातु का आना भी बंद हो जाता है।

सूखी अर्जुन की छाल को कूट-पीसकर महीन चूर्ण कर लें और अडूसे के ताजे पत्तों का रस निकालकर इस 

चूर्ण में डाल कर चूर्ण को सुखा लें, फिर अडूसे के पत्ते का रस डाले और फिर सुखा ले ऐसा सात बार करे चूर्ण 

को सुखाकर शीशी में भर लें। इसके आधा चम्मच चूर्ण को शहद में मिलाकर रोगी को चटाने से रोगी की 

खांसी में राहत मिलती है।

अर्जुन की छाल को शीशे या मिटटी के बर्तन में एक दिन के लिए भिगो दे दूसरे दिन इस छाल को पीसकर 

सुखा ले सूखने पर दोबारा पीस कर व छान कर किसी साफ़ बर्तन में भर कर रख लें। इस एक चम्मच चूर्ण 

को पानी में उबाल कर शहद मिला कर दिन में तिन बार सेवन से हर प्रकार की खांसी (क्षय रोग की खून 

मिश्रित खांसी) और पुरानी से पुराणी खांसी में भी आराम आता है ।

अर्जुन की छाल को बकरी के दूध में पीसकर दूध और शहद मिलकर पिलाने से खूनी दस्तो में शीघ्र आराम 

आ जाता है।

हड्डी टूट जाने और चोट लगने पर भी अर्जुन की छाल शीघ्र लाभ करती है। अर्जुन की छाल के चूर्ण की 

फंकी दूध के साथ लेने से टूटी हुई हड्डी जुड़ जाती है। और अर्जुन की छाल को पानी के साथ पीसकर लेप 

करने से दर्द में भी आराम मिलता है। टूटी हड्डी के स्थान पर अर्जुन की छाल को घी में पीसकर लेप करेंके 

पट्टी बांध ले हड्डी शीघ्र जुड़ जाती है।

आग से जलने पर होने वाला घाव पर अर्जुन की छाल के चूर्ण को लगाने से घाव शीघ्र ही भर जाता है। 

अर्जुन छाल को कूट कर काढ़ा बनाकर घावों और जख्मों को धोने से लाभ होता है।

बवासीर में अर्जुन की छाल, बकायन के फल और हारसिंगार के फूल तीनो को पीसकर बारीक चूर्ण बनाले 

इसे दिन में दो-तिन बार नियमित सेवन करने से खूनी बवासीर ठीक हो जाता है तथा बवासीर के मस्से 

ठीक हो जाते है।

अर्जुन और जामुन के सूखे पत्तों का चूर्ण शारीर पर उबटन की तरह लगाकर कुछ देर बाद नहाने से अधिक 

पसीने से पैदा दुर्गंध दूर होती है ।

नारियल के तेल में अर्जुन की छाल के चूर्ण को मिलाकर मुंह के छालों पर लगायें। मुंह के छाले ठीक हो 

जायेंगे।

विशेष : सीने में दर्द की शिकायत की अनदेखा न करें और न ही खुद से दवा या उपचार लें, बल्कि हृदय का 

उपचार किसी विशेषज्ञ की देखरेख में ही होना चाहिए।

आयुर्वेद ने तो सदियों पहले इसे हृदय रोग की महान औषधि घोषित कर दिया था। आयुर्वेद के प्राचीन 

विद्वानों में वाग्भट, चक्रदत्त और भावमिश्र ने इसे हृदय रोग की महौषधि स्वीकार किया है।


विभिन्न भाषाओं में नाम : संस्कृत- ककुभ। हिन्दी- अर्जुन, कोह। मराठी- अर्जुन सादड़ा। गुजराती- सादड़ो 

। तेलुगू- तेल्लमद्दि। कन्नड़- मद्दि। तमिल मरुतै, बेल्म। इंग्लिश- अर्जुना। लैटिन- टरमिनेलिया अर्जुन।

गुण : यह शीतल, हृदय को हितकारी, कसैला और क्षत, क्षय, विष, रुधिर विकार, मेद, प्रमेह, व्रण, कफ 

तथा पित्त को नष्ट करता है।

परिचय : इसका वृक्ष 60 से 80 फीट तक ऊंचा होता है। इसके पत्ते अमरूद के पत्तों जैसे होते हैं। यह 

विशेषकर हिमालय की तराई, बंगाल, बिहार और मध्यप्रदेश के जंगलों में और नदी-नालों के किनारे 

पंक्तिबद्ध लगा हुआ पाया जाता है। ग्रीष्म ऋतु में फल पकते हैं।


उपयोग : इसका मुख्य उपयोग हृदय रोग के उपचार में किया जाता है। यह हृदय रोग की महाऔषधि माना 

जाता है। इसके अलावा इसका उपयोग रक्तपित्त, प्रमेह, मूत्राघात, शुक्रमेह, रक्तातिसार तथा क्षय और खांसी 

में भी लाभप्रद रहता है।


हृदय रोग : हृदय रोग के रोगी के लिए अर्जुनारिष्ट का सेवन बहुत लाभप्रद सिद्ध हुआ है। दोनों वक्त भोजन 

के बाद 2-2 चम्मच (बड़ा चम्मच) यानी 20-20 मि.ली. मात्रा में अर्जुनारिष्ट आधा कप पानी में डालकर 2-3 

माह तक निरंतर पीना चाहिए। इसके साथ ही इसकी छाल का महीन चूर्ण कपड़े से छानकर 3-3 ग्राम 

(आधा छोटा चम्मच) मात्रा में ताजे पानी के साथ सुबह-शाम सेवन करना चाहिए।

रक्तपित्त : चरक के अनुसार, इसकी छाल रातभर पानी में भिगोकर रखें, सुबह इसे मसल-छानकर या काढ़ा 

बनाकर पीने से रक्तपित्त नामक व्याधि दूर हो जाती है।

मूत्राघात : पेशाब की रुकावट होने पर इसकी अंतरछाल को कूट-पीसकर 2 कप पानी में डालकर उबालें। 

जब आधा कप पानी शेष बचे, तब उतारकर छान लें और रोगी को पिला दें। इससे पेशाब की रुकावट दूर हो 

जाती है। लाभ होने तक दिन में एक बार पिलाएं।

खांसी : अर्जुन की छाल को सुखा लें और कूट-पीसकर महीन चूर्ण कर लें। ताजे हरे अडूसे के पत्तों का रस 

निकालकर इस चूर्ण में डाल दें और चूर्ण सुखा लें, फिर से इसमें अडूसे के पत्तों का रस डालकर सुखा लें। 

ऐसा सात बार करके चूर्ण को खूब सुखाकर पैक बंद शीशी में भर लें। इस चूर्ण को 3 ग्राम (छोटा आधा 

चम्मच) मात्रा में शहद में मिलाकर चटाने से रोगी को खांसी में आराम हो जाता है।

अर्जुन वृक्ष भारत में होने वाला एक औषधीय और सदाबहार वृक्ष है भारतीय पहाड़ी क्षेत्रों में नदी-नाले के 

किनारे, सड़क के किनारे ओर जंगलों में यह महा औषधिये वर्क्ष बहुतायत में पाया जाता है। इसका उपयोग 

रक्तपित्त (खून की उल्टी), प्रमेह, मूत्राघात, शुक्रमेह, खूनी प्रदर, श्वेतप्रदर, पेट दर्द, कान का दर्द, मुंह की 

झांइयां,कोढ बुखार, क्षय और खांसी में भी लाभप्रद रहता है। हृदय रोग के लिए तो इसे रामबाण औषधि 

माना जाता है। यह नाडी की क्षीणता को सक्रिय करता है, पुराणी खांसी, श्वास दमा, मधुमेह, सूजन,जलने 

पर, मुंह के छाले पर और हिस्टीरिया आदि रोगों में लाभदायक है। हृदय की रक्तवाही नलिकाओं में थक्का 

बनने से रोकता है। यह शक्तिवर्धक, चोट से निकलते खून को रोकने वाला (रक्त स्तम्भक) एवं प्रमेह नाशक 

भी है। इसे मोटापे को रोकने, हड्डियों को जोड़ने में, खूनी पेचिश में, बवासीर में, खून की कलाटिंग रोकने 

में मदद करता है और केलोस्ट्राल को भी घटाता है। यह ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करता है, पत्थरी को 

निकलता है, लीवर को मजबूत करता है, बवासीर को ठीक करता है। ताकत को बढ़ाने के लिए और यह 

एंटीसेप्टिक का भी काम करता है।

अर्जुन की छाल शारीरिक कमजोरी में हृदयाघात में, हृदय शूल में खूनी बवासीर में पेशाब की जलन, श्वेत 

प्रदर, सूजन व दर्द में तथा चर्म रोगों में एक चम्मच अर्जुन की छाल चूर्ण रूप में घी या गुड़ के साथ देते हैं। 

हृदय गति ढीली पड़ने पर अर्जुन की छाल व गुड़ को दूध में उबाल कर पिलाते हैं।

एक चम्मच अर्जुन की छाल का चूर्ण एक कप (मलाई रहित) दूध के साथ सुबह-शाम नियमित सेवन करने 

से हृदय के सभी रोगों में लाभ मिलता है, दिल की धड़कन सामान्य होती है।

अर्जुन की छाल के चूर्ण को चाय के साथ एक चम्मच इस चूर्ण को उबालकर ले सकते हैं। उच्च रक्तचाप भी 

सामान्य हो जाता है। चायपत्ती की बजाये अर्जुन की छाल का चूर्ण डालकर ही चाय बनायें, यह और भी 

प्रभावी होगी। अर्जुन की छाल और गुड़ को दूध में उबाल कर रोगी को पिलाने से दिल मजबूत होता है और 

सूजन मिटता है।

एक गिलास टमाटर के रस में एक चम्मच अर्जुन की छाल का चूर्ण मिलाकर नियमित सेवन करने से दिल 

की धड़कन सामान्य हो जाती है।

अर्जुन की छाल और मिश्री मिला कर हलुवा बना ले, इसका नित्य सेवन करने से हृदय की पीड़ा, दिल की 

घबराहट, अनियमित धड़कन आदि से निजात मिलती हैं।

अर्जुन की छाल का दूध के साथ काढ़ा बना ले यह काढ़ा हार्ट अटैक हो चुकने पर सुबह शाम सेवन करें। इस 

से हृदय की तेज धड़कन, हृदय शूल, घबराहट में निश्चित तोर से कमी आती हैं।

अर्जुन की छाल को कपड़े से छान ले इस चूर्ण को जीभ पर रखकर चूसते ही हृदय की अधिक अनियमित 

धड़कनें नियमित होने लगती है। यह दोष रहित है और इस का प्रभाव तुरंत स्थायी तोर पर होने लगता है।

आधा किलो दूध में दो चम्मच (टेबल स्पून) अर्जुन की छाल का चूर्ण मिला कर उबालकर खोया बना लें और 

खोये के बराबर का मिश्री पाउडर मिलाकर, हर रोज इस मिठाई को खाकर दूध पीने से हृदय की अनियमित 

धड़कन सामान्य होती है।

अर्जुन की छाल को छाया में सुखाकर, कूट-पीसकर और छान कर चूर्ण बनाकर प्रतिदिन एक चम्मच चूर्ण 

गाय के घी और मिश्री के साथ मिलाकर सेवन करने से दिल की कमजोरी दूर होती है। अर्जुन की छाल को 

गुड़ और मुलेठी तीनों को दूध में उबालकर भी सेवन कर सकते है।

अर्जुन शक्तिदायक टानिक है जो अपने लवण-खनिजों से दिल की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है। घी, 

दूध ,मिश्री या गुड़ के साथ अर्जुन की छाल का महीन चूर्ण नियमित सेवन करने से हृदय रोग, जीर्णज्वर, 

रक्त पित्त रोग दूर होते है तथा सेवन करने वाले की उम्र भी बढाती है।

अर्जुन की छाल के चूर्ण की गुड़ के साथ फंकी लेने से जीर्ण ज्वर ठीक होता है। तथा रात को दूध और चावल 

की खीरबना कर इस में सुबह 4 बजे अर्जुन की छाल के 2 चम्मच चूर्ण को मिलाकर सेवन करने से श्वांस 

रोग नष्ट हो जाते है।

अर्जुन की छाल में जरा-सी भुनी हेई हींग और सेंधा नमक मिलाकर सुबह-शाम गुनगुने पानी के साथ फंकी 

लेने से गुर्दे का दर्द, पेट के दर्द और पेट की जलन में लाभ होता है।

अर्जुन हृदय के विराम काल को बढ़ाता है और ह्रदय को मजबूत करता है तथा यह शरीर में जमा नहीं होता। 

यह मल-मूत्र द्वारा स्वयं ही बाहर निकल जाता है।

अर्जुन की 2 चम्मच छाल को रातभर पानी में भिगोकर सुबह उसको उबालकर उसका काढ़ा पीने से रक्तपित्त 

(खून की उल्टी) में लाभ होता है। खून की उल्टी में अर्जुन की छाल के 2 चम्मच बारीक चूर्ण को दूध में 

पकाकर खाने से आराम आता है। इससे रक्त का बहना रुकता है।

रक्तदोष त्वचा रोग एवं कुष्ठ रोग में अर्जुन की छाल का 1 चम्मच चूर्ण पानी के साथ सेवन करने से व इसकी 

छाल को पानी में घिसकर त्वचा पर लेप करने एवं अर्जुन की छाल को पानी में उबालकर या गुनगुने पानी 

में मिलाकर नहाने से कुष्ठ और त्वचा रोगों में बहुत लाभ होता है।

अर्जुन की छाल को रातभर पानी में भिगोकर रखें, सुबह इसे मसलकर-छानकर या काढ़ा बनाकर पीने से 

रक्तपित्त रोग ठीक होता है।

पेशाब की रुकावट को खोलने के लिए अर्जुन की छाल को एक गिलास पानी में डालकर 1/4 भाग शेष रह 

जाने तक उबालें। और छान कर रोगी को हर रोज सुबह लाभ होने तक पिलाये, पेशाब के खुलने के साथ-

साथ धातु का आना भी बंद हो जाता है।

सूखी अर्जुन की छाल को कूट-पीसकर महीन चूर्ण कर लें और अडूसे के ताजे पत्तों का रस निकालकर इस 

चूर्ण में डाल कर चूर्ण को सुखा लें, फिर अडूसे के पत्ते का रस डाले और फिर सुखा ले ऐसा सात बार करे चूर्ण 

को सुखाकर शीशी में भर लें। इसके आधा चम्मच चूर्ण को शहद में मिलाकर रोगी को चटाने से रोगी की 

खांसी में राहत मिलती है।

अर्जुन की छाल को शीशे या मिटटी के बर्तन में एक दिन के लिए भिगो दे दूसरे दिन इस छाल को पीसकर 

सुखा ले सूखने पर दोबारा पीस कर व छान कर किसी साफ़ बर्तन में भर कर रख लें। इस एक चम्मच चूर्ण 

को पानी में उबाल कर शहद मिला कर दिन में तिन बार सेवन से हर प्रकार की खांसी (क्षय रोग की खून 

मिश्रित खांसी) और पुरानी से पुराणी खांसी में भी आराम आता है ।

अर्जुन की छाल को बकरी के दूध में पीसकर दूध और शहद मिलकर पिलाने से खूनी दस्तो में शीघ्र आराम 

आ जाता है।

हड्डी टूट जाने और चोट लगने पर भी अर्जुन की छाल शीघ्र लाभ करती है। अर्जुन की छाल के चूर्ण की 

फंकी दूध के साथ लेने से टूटी हुई हड्डी जुड़ जाती है। और अर्जुन की छाल को पानी के साथ पीसकर लेप 

करने से दर्द में भी आराम मिलता है। टूटी हड्डी के स्थान पर अर्जुन की छाल को घी में पीसकर लेप करेंके 

पट्टी बांध ले हड्डी शीघ्र जुड़ जाती है।

आग से जलने पर होने वाला घाव पर अर्जुन की छाल के चूर्ण को लगाने से घाव शीघ्र ही भर जाता है। 

अर्जुन छाल को कूट कर काढ़ा बनाकर घावों और जख्मों को धोने से लाभ होता है।

बवासीर में अर्जुन की छाल, बकायन के फल और हारसिंगार के फूल तीनो को पीसकर बारीक चूर्ण बनाले 

इसे दिन में दो-तिन बार नियमित सेवन करने से खूनी बवासीर ठीक हो जाता है तथा बवासीर के मस्से 

ठीक हो जाते है।

अर्जुन और जामुन के सूखे पत्तों का चूर्ण शारीर पर उबटन की तरह लगाकर कुछ देर बाद नहाने से अधिक 

पसीने से पैदा दुर्गंध दूर होती है ।

नारियल के तेल में अर्जुन की छाल के चूर्ण को मिलाकर मुंह के छालों पर लगायें। मुंह के छाले ठीक हो 

जायेंगे।


विशेष : सीने में दर्द की शिकायत की अनदेखा न करें और न ही खुद से दवा या उपचार लें, बल्कि हृदय का 

उपचार किसी विशेषज्ञ की देखरेख में ही होना चाहिए।

इलाज़ – हाई ब्‍लड प्रेशर के लिए घरेलू नुस्‍खे


हाई ब्‍लड प्रेशर के लिए घरेलू नुस्‍खे ——-
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हाई ब्‍लड प्रेशर आजकल सामान्‍य हो चला है। इसकी बड़ी वजह अनियमित दिनचर्या और आधुनिक जीवन शैली है। ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरी लोग अधिक तेजी से इसके शिकार हो रहे हैं।

हाई ब्लड प्रेशर में चक्कर आने लगते हैं, सिर घूमने लगता है। रोगी का किसी काम में मन नहीं लगता। उसमें शारीरिक काम करने की क्षमता नहीं रहती और रोगी अनिद्रा का शिकार रहता है। इस रोग का घरेलू उपचार भी संभव है, जिनके सावधानीपूर्वक इस्तेमाल करने से बिना दवाई लिए इस भयंकर बीमारी पर पूर्णत: नियंत्रण पाया जा सकता है। जरूरत है संयमपूर्वक नियम पालन की। आइए जानें हाई ब्लड प्रेशर के लिए घरेलू उपाय।

हाई ब्लड प्रेशर के लिए घरेलू उपाय –

1) नमक ब्लड प्रेशर बढाने वाला प्रमुख कारक है। इसलिए यह बात सबसे महत्‍वपूर्ण है कि हाई बी पी वालों को नमक का प्रयोग कम कर देना चाहिए।
2) उच्च रक्तचाप का एक प्रमुख कारण होता है रक्त का गाढा होना। रक्त गाढा होने से उसका प्रवाह धीमा हो जाता है। इससे धमनियों और शिराओं में दवाब बढ जाता है। लहसुन ब्लड प्रेशर ठीक करने में बहुत मददगार घरेलू उपाय है। यह रक्त का थक्का नहीं जमने देती है। धमनी की कठोरता में लाभदायक है। रक्त में ज्यादा कोलेस्ट्ररोल होने की स्थिति का समाधान करती है।
3) एक बडा चम्मच आंवले का रस और इतना ही शहद मिलाकर सुबह-शाम लेने से हाई ब्लड प्रेशर में लाभ होता है।

4) जब ब्लड प्रेशर बढा हुआ हो तो आधा गिलास मामूली गर्म पानी में काली मिर्च पाउडर एक चम्मच घोलकर 2-2 घंटे के फ़ासले से पीते रहें। ब्लड प्रेशर सही करने का बढिया उपचार है।
5) तरबूज के बीज की गिरि तथा खसखस अलग-अलग पीसकर बराबर मात्रा में मिलाकर रख लें। एक चम्मच मात्रा में प्रतिदिन खाली पेट पानी के साथ लें।
6) बढे हुए ब्लड प्रेशर को जल्दी कंट्रोल करने के लिये आधा गिलास पानी में आधा नींबू निचोड़कर 2-2 घंटे के अंतर से पीते रहें। हितकारी उपचार है।
7) पांच तुलसी के पत्ते तथा दो नीम की पत्तियों को पीसकर 20 ग्राम पानी में घोलकर खाली पेट सुबह पिएं। 15 दिन में लाभ नजर आने लगेगा।
8) हाई ब्लडप्रेशर के मरीजों के लिए पपीता भी बहुत लाभ करता है, इसे प्रतिदिन खाली पेट चबा-चबाकर खाएं।
9) नंगे पैर हरी घास पर 10-15 मिनट चलें। रोजाना चलने से ब्लड प्रेशर नार्मल हो जाता है।
10) सौंफ़, जीरा, शक्‍कर तीनों बराबर मात्रा में लेकर पाउडर बना लें। एक गिलास पानी में एक चम्मच मिश्रण घोलकर सुबह-शाम पीते रहें।

11) पालक और गाजर का रस मिलाकर एक गिलास रस सुबह-शाम पीयें, लाभ होगा।
12) करेला और सहजन की फ़ली उच्च रक्त चाप-रोगी के लिये परम हितकारी हैं।
13) गेहूं व चने के आटे को बराबर मात्रा में लेकर बनाई गई रोटी खूब चबा-चबाकर खाएं, आटे से चोकर न निकालें।
14) ब्राउन चावल उपयोग में लाए। इसमें नमक, कोलेस्टरोल और चर्बी नाम मात्र की होती है। यह उच्च रक्त चाप रोगी के लिये बहुत ही लाभदायक भोजन है।
15) प्याज और लहसुन की तरह अदरक भी काफी फायदेमंद होता है। बुरा कोलेस्ट्रोल धमनियों की दीवारों पर प्लेक यानी कि कैल्‍शियम युक्त मैल पैदा करता है जिससे रक्त के प्रवाह में अवरोध खड़ा हो जाता है और नतीजा उच्च रक्तचाप के रूप में सामने आता है। अदरक में बहुत हीं ताकतवर एंटीओक्सीडेट्स होते हैं जो कि बुरे कोलेस्ट्रोल को नीचे लाने में काफी असरदार होते हैं। अदरक से आपके रक्तसंचार में भी सुधार होता है, धमनियों के आसपास की मांसपेशियों को भी आराम मिलता है जिससे कि उच्च रक्तचाप नीचे आ जाता है।
16) तीन ग्राम मेथीदाना पावडर सुबह-शाम पानी के साथ लें। इसे पंद्रह दिनों तक लेने से लाभ मालूम होता है

रस-प्रयोग:किस रोग में कौन सा रस लेंगे?

रस-प्रयोग::

किस रोग में कौन सा रस लेंगे?

भूख लगाने के हेतुः प्रातःकाल खाली पेट नींबू का पानी पियें। खाने से पहले अदरक का कचूमर सैंधव 

नमक 

के साथ लें।

रक्तशुद्धिः नींबू, गाजर, गोभी, चुकन्दर, पालक, सेव, तुलसी, नीम और बेल के पत्तों का रस।

दमाः लहसुन, अदरक, तुलसी, चुकन्दर, गोभी, गाजर, मीठी द्राक्ष का रस, भाजी का सूप अथवा मूँग का 

सूप और बकरी का शुद्ध दूध लाभदायक है। घी, तेल, मक्खन वर्जित है।

उच्च रक्तचापः गाजर, अंगूर, मोसम्मी और ज्वारों का रस। मानसिक तथा शारीरिक आराम आवश्यक है।

निम्न रक्तचापः मीठे फलों का रस लें, किन्तु खट्टे फलों का उपयोग न करें। अंगूर और मोसम्मी का रस 

अथवा दूध भी लाभदायक है।

पीलियाः अंगूर, सेव, रसभरी, मोसम्मी। अंगूर की अनुपलब्धि पर लाल मुनक्के तथा किसमिस का पानी। 

गन्ने को चूसकर उसका रस पियें। केले में 1.5 ग्राम चूना लगाकर कुछ समय रखकर फिर खायें।

मुहाँसों के दागः गाजर, तरबूज, प्याज, तुलसी और पालक का रस।

संधिवातः लहसुन, अदरक, गाजर, पालक, ककड़ी, गोभी, हरा धनिया, नारियल का पानी तथा सेव और गेहूँ 

के ज्वारे।

एसीडिटीः गाजर, पालक, ककड़ी, तुलसी का रस, फलों का रस अधिक लें। अंगूर मोसम्मी तथा दूध भी 

लाभदायक है।

कैंसरः गेहूँ के ज्वारे, गाजर और अंगूर का रस।

सुन्दर बनने के लिएः सुबह-दोपहर नारियल का पानी या बबूल का रस लें। नारियल के पानी से चेहरा 

साफ  करें।

फोड़े-फुन्सियाँ- गाजर, पालक, ककड़ी, गोभी और नारियल का रस।

कोलाइटिसः गाजर, पालक और पाइनेपल का रस। 70 प्रतिशत गाजर के रस के साथ अन्य रस समप्राण। 

चुकन्दर, नारियल, ककड़ी, गोभी के रस का मिश्रण भी उपयोगी है।

अल्सरः अंगूर, गाजर, गोभी का रस। केवल दुग्धाहार पर रहना आवश्यक है।

सर्दी-कफः मूली, अदरक, लहसुन, तुलसी, गाजर का रस, मूँग अथवा भाजी का सूप।

ब्रोन्काइटिसः पपीता, गाजर, अदरक, तुलसी, पाइनेपल का रस, मूँग का सूप। स्टार्चवाली खुराक वर्जित।



दाँत निकलते बच्चे के लिएः पाइनेपल का रस थोड़ा नींबू डालकर रोज चार औंस(100-125 ग्राम)।

रक्तवृद्धि के लिएः मोसम्मी, अंगूर, पालक, टमाटर, चुकन्दर, सेव, रसभरी का रस रात को। रात को 

भिगोया हुआ खजूर का पानी सुबह में। इलायची के साथ केले भी उपयोगी हैं।

स्त्रियों को मासिक धर्म कष्टः अंगूर, पाइनेपल तथा रसभरी का रस।



आँखों के तेज के लिएः गाजर का रस तथा हरे धनिया का रस श्रेष्ठ है।

अनिद्राः अंगूर और सेव का रस। पीपरामूल शहद के साथ।

वजन बढ़ाने के लिएः पालक, गाजर, चुकन्दर, नारियल और गोभी के रस का मिश्रण, दूध, दही, सूखा 

मेवा, अंगूर और सेवों का रस। 



डायबिटीजः गोभी, गाजर, नारियल, करेला और पालक का रस।



पथरीः पत्तों वाली भाजी न लें। ककड़ी का रस श्रेष्ठ है। सेव अथवा गाजर या कद्दू का रस भी सहायक है। जौ 

एवं सहजने का सूप भी लाभदायक है।



सिरदर्दः ककड़ी, चुकन्दर, गाजर, गोभी और नारियल के रस का मिश्रण।



किडनी का दर्दः गाजर, पालक, ककड़ी, अदरक और नारियल का रस।

फ्लूः अदरक, तुलसी, गाजर का रस।



वजन घटाने के लिएः पाइनेपल, गोभी, तरबूज का रस, नींबू का रस।



पायरियाः गेहूँ के ज्वारे, गाजर, नारियल, ककड़ी, पालक और सुआ की भाजी का रस। कच्चा अधिक 

खायें।



बवासीरः मूली का रस, अदरक का रस घी डालकर।



डिब्बेपैक फलों के रस से बचोः

बंद डिब्बों का रस भूलकर भी उपयोग में न लें। उसमें बेन्जोइक एसिड होता है। यह एसिड तनिक भी 

कोमल चमड़ी का स्पर्श करे तो फफोले पड़ जाते हैं। और उसमें उपयोग में लाया जानेवाला सोडियम 

बेन्जोइक नामक रसायन यदि कुत्ता भी दो ग्राम के लगभग खा ले तो तत्काल मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। 

उपरोक्त रसायन फलों के रस, कन्फेक्शनरी, अमरूद, जेली, अचार आदि में प्रयुक्त होते हैं। उनका उपयोग 

मेहमानों के सत्कारार्थ या बच्चों को प्रसन्न करने के लिए कभी भूलकर भी न करें।

‘फ्रेशफ्रूट’ के लेबल में मिलती किसी भी बोतल या डिब्बे में ताजे फल अथवा उनका रस कभी नहीं होता। 


बाजार में बिकता ताजा ‘ओरेन्ज’ कभी भी संतरा-नारंगी का रस नहीं होता। उसमें चीनी, सैक्रीन और कृत्रिम 

रंग ही प्रयुक्त होते हैं जो आपके दाँतों और आँतड़ियों को हानि पहुँचा कर अंत में कैंसर को जन्म देते हैं। बंद 

डिब्बों में निहित फल या रस जो आप पीते हैं उन पर जो अत्याचार होते हैं वे जानने योग्य हैं। सर्वप्रथम तो 

बेचारे फल को उफनते गरम पानी में धोया जाता है। फिर पकाया जाता है। ऊपर का छिलका निकाल लिया 

जाता है। इसमें चाशनी डाली जाती है और रस ताजा रहे इसके लिए उसमें विविध रसायन (कैमीकल्स) डाले 

जाते हैं। उसमें कैल्शियम नाइट्रेट, एलम और मैग्नेशियम क्लोराइड उडेला जाता है जिसके कारण अँतड़ियों 

में छेद हो जाते हैं, किडनी को हानि पहुँचती है, मसूढ़े सूज जाते हैं। जो लोग पुलाव के लिए बाजार के बंद 

डिब्बों के मटर उपयोग में लेते हैं उन्हें हरे और ताजा रखने के लिए उनमें मैग्नेशियम क्लोराइड डाला जाता 

है। मक्की के दानों को ताजा रखने के लिए सल्फर डायोक्साइड नामक विषैला रसायन (कैमीकल) डाला 

जाता है। एरीथ्रोसिन नामक रसायन कोकटेल में प्रयुक्त होता है। टमाटर के रस में नाइट्रेटस डाला जाता है। 

शाकभाजी के डिब्बों को बंद करते समय शाकभाजी के फलों में जो नमक डाला जाता है वह साधारण नमक 

से 45 गुना अधिक हानिकारक होता है।

इसलिए अपने और बच्चों के स्वास्थ्य के लिए और मेहमान-नवाजी के फैशन के लिए भी ऐसे बंद डिब्बों 

की शाकभाजी का उपयोग करके स्वास्थ्य को स्थायी जोखिम में न डालें।

संस्कृति – सनातन धर्म के अनुसार भोजन ग्रहण करने के कुछ नियम है



भोजन सम्बन्धी कुछ नियम

१ पांच अंगो ( दो हाथ , २ पैर , मुख ) को अच्छी तरह से धो कर ही भोजन करे !

२. गीले पैरों खाने से आयु में वृद्धि होती है !

३. प्रातः और सायं ही भोजन का विधान है !

४. पूर्व और उत्तर दिशा की ओर मुह करके ही खाना चाहिए !

५. दक्षिण दिशा की ओर किया हुआ भोजन प्रेत को प्राप्त होता है !

६ . पश्चिम दिशा की ओर किया हुआ भोजन खाने से रोग की वृद्धि होती है !

७. शैय्या पर , हाथ पर रख कर , टूटे फूटे वर्तनो में भोजन नहीं करना चाहिए !

८. मल मूत्र का वेग होने पर , कलह के माहौल में , अधिक शोर में , पीपल , वट वृक्ष के नीचे , भोजन नहीं 

करना चाहिए !

९ परोसे हुए भोजन की कभी निंदा नहीं करनी चाहिए !

१०. खाने से पूर्व अन्न देवता , अन्नपूर्णा माता की स्तुति कर के , उनका धन्यवाद देते हुए , तथा सभी 

भूखो को भोजन प्राप्त हो इस्वर से ऐसी प्राथना करके भोजन करना चाहिए !

११. भोजन बनने वाला स्नान करके ही शुद्ध मन से , मंत्र जप करते हुए ही रसोई में भोजन बनाये और 

सबसे पहले ३ रोटिया अलग निकाल कर ( गाय , कुत्ता , और कौवे हेतु ) फिर अग्नि देव का भोग लगा कर 

ही घर वालो को खिलाये !

१२. इर्षा , भय , क्रोध , लोभ , रोग , दीन भाव , द्वेष भाव , के साथ किया हुआ भोजन कभी पचता नहीं है !

१३. आधा खाया हुआ फल , मिठाईया आदि पुनः नहीं खानी चाहिए !

१४. खाना छोड़ कर उठ जाने पर दुबारा भोजन नहीं करना चाहिए !

१५. भोजन के समय मौन रहे !

१६. भोजन को बहुत चबा चबा कर खाए !

१७. रात्री में भरपेट न खाए !

१८. गृहस्थ को ३२ ग्रास से ज्यादा न खाना चाहिए !

१९. सबसे पहले मीठा , फिर नमकीन , अंत में कडुवा खाना चाहिए !

२०. सबसे पहले रस दार , बीच में गरिस्थ , अंत में द्राव्य पदार्थ ग्रहण करे !

२१. थोडा खाने वाले को –आरोग्य , आयु , बल , सुख, सुन्दर संतान , और सौंदर्य प्राप्त होता है !

२२. जिसने ढिढोरा पीट कर खिलाया हो वहा कभी न खाए !

२३. कुत्ते का छुवा , रजस्वला स्त्री का परोसा , श्राध का निकाला , बासी , मुह से फूक मरकर ठंडा किया , 

बाल गिरा हुवा भोजन , अनादर युक्त , अवहेलना पूर्ण परोसा गया भोजन कभी न करे !

२४. कंजूस का , राजा का , वेश्या के हाथ का , शराब बेचने वाले का दिया भोजन कभी नहीं करना चाहिए !

इलाज – अंग का सड़ जाना



कुछ चोट लग जाती है, और कुछ छोटे बहुत गंभीर हो जाती है। जैसे 

कोई डाईबेटिक पेशेंट है चोट लग गयी तो उसका सारा दुनिया जहां एक 

ही जगह है, क्योंकि जल्दी ठीक ही नही होता है। और उसके लिए 

कितना भी चेष्टा करे करे डॉक्टर हर बार उसको सफलता नही मिलता 

है। और अंत में वो चोट धीरे धीरे गैंग्रीन (अंग का सड़ जाना) में कन्वर्ट 

हो जाती है। और फिर काटना पड़ता है, उतने हिस्से को शारीर से 

निकालना पड़ता है। ऐसी परिस्तिथि में एक औषधि है जो गैंग्रीन को भी 

ठीक करती है और Osteomyelitis (अस्थिमज्जा का प्रदाह) को भी 

ठीक करती है।

गैंग्रीन माने अंग का सड़ जाना, जहाँ पे नए कोशिका विकसित नही 

होते। न तो मांस में और न ही हड्डी में और सब पुराने कोशिका मरते 

चले जाते हैं। इसीका एक छोटा भाई है Osteomyelitis इसमें भी 

कोशिका कभी पुनर्जीवित नही होते, जिस हिस्से में होता है उहाँ बहुत 

बड़ा घाव हो जाता है और वो ऐसा सड़ता है के डॉक्टर कहता है की 

इसको काट के ही निकलना है और कोई दूसरा उपाय नही है।। ऐसे 

परिस्तिथि में जहां शारीर का कोई अंग काटना पड़ जाता हो या पड़ने की 

संभावना हो, घाव बहुत हो गया हो उसके लिए आप एक औषधि अपने 

घर में तैयार कर सकते है।

औषधि है देशी गाय का मूत्र (सूती के आट परत कपड़ो में चन कर) , 

हल्दी और गेंदे का फुल। गेंदे के फुल की पिला या नारंगी पंखरियाँ 

निकलना है, फिर उसमे हल्दी डालके गाय मूत्र डालके उसकी चटनी 

बनानी है। अब चोट कितना बड़ा है उसकी साइज़ के हिसाब से गेंदे के 

फुल की संख्या तै होगी, माने चोट छोटे एरिया में है तो एक फुल, बड़े है 

तो दो, तिन, चार अंदाज़े से लेना है। इसकी चटनी बनाके इस चटनी को 

लगाना है जहाँ पर भी बाहर से खुली हुई चोट है जिससे खून निकल 

जुका है और ठीक नही हो रहा। कितनी भी दावा खा रहे है पर ठीक नही 

हो रहा, ठीक न होने का एक कारण तो है डाईबेटिस दूसरा कोई जिनगत 

कारण भी हो सकते है। इसको दिन में कम से कम दो बार लगाना है 

जैसे सुबह लगाके उसके ऊपर रुई पट्टी बांध दीजिये ताकि उसका असर 

बॉडी पे रहे; और शाम को जब दुबारा लगायेंगे तो पहले वाला धोना 

पड़ेगा टी इसको गोमूत्र से ही धोना है डेटोल जैसो का प्रयोग मत करिए, 

गाय के मूत्र को डेटोल की तरह प्रयोग करे। धोने के बाद फिर से चटनी 

लगा दे। फिर अगले दिन सुबह कर दीजिये।

यह इतना प्रभावशाली है के आप सोच नही सकते देखेंगे तो चमत्कार 

जैसा लगेगा। इस औषधि को हमेशा ताजा बनाके लगाना है। किसीका 

भी जखम किसी भी औषधि से ठीक नही हो रहा है तो ये लगाइए। जो 

सोराइसिस गिला है जिसमे खून भी निकलता है, पस भी निकलता है 

उसको यह औषधि पूर्णरूप से ठीक कर देता है। अकसर यह एक्सीडेंट के 

केसेस में खूब प्रोयोग होता है क्योंकि ये लगाते ही खून बांध हो जाता है। 

ऑपरेशन का कोई भी घाव के लिए भी यह सबसे अच्छा औषधि है। 

गिला एक्जीमा में यह औषधि बहुत काम करता है, जले हुए जखम में 

भी काम करता है।