संस्कृति – पता – महर्षि वाग्भट्ट गौशाला एवं पंचगव्य अनुसंधान केंद्र

Website – http://panchgavya.org/
Courses – http://panchgavya.org/diploma/

Advertisements

संस्कृति – कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के पिताश्री: महर्षि पाणिनि —–

कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के पिताश्री: महर्षि पाणिनि —–
______________________________________________________

मेरे सनातनी भारतीय भाइयों महर्षि पाणिनि के बारे में बताने पूर्व में आज की कंप्यूटर प्रोग्रामिंग किस प्रकार कार्य करती है इसके बारे में कुछ जरा सा बताना चाहूँगा चूँकि में भी एक कंप्यूटर इंजिनियर हूँ । आज की कंप्यूटर प्रोग्रामिंग भाषाएँ जैसे c, c++, java आदि में प्रोग्रामिंग हाई लेवल लैंग्वेज (high level language) में लिखे जाते है जो अंग्रेजी के सामान ही होती है | इसे कंप्यूटर की गणना सम्बन्धी व्याख्या (theory of computation) जिसमे प्रोग्रामिंग के syntex आदि का वर्णन होता है, के द्वारा लो लेवल लैंग्वेज (low level language) जो विशेष प्रकार का कोड होता है जिसे mnemonic कहा जाता है जैसे जोड़ के लिए ADD, गुना के लिए MUL आदि में परिवर्तित किये जाते है | तथा इस प्रकार प्राप्त कोड को प्रोसेसर द्वारा द्विआधारी भाषा (binary language: 0101) में परिवर्तित कर क्रियान्वित किया जाता है |
इस प्रकार पूरा कंप्यूटर जगत theory of computation पर निर्भर करता है |
इसी computation पर महर्षि पाणिनि (लगभग 500 ई पू) ने संस्कृत व्याकरण द्वारा एक पूरा ग्रन्थ रच डाला |

महर्षि पाणिनि संस्कृत भाषा के सबसे बड़े व्याकरण विज्ञानी थे | इनका जन्म उत्तर पश्चिम भारत के गांधार में हुआ था। इनके व्याकरण का नाम अष्टाध्यायी है जिसमें आठ अध्याय और लगभग चार सहस्र सूत्र हैं। संस्कृत भाषा को व्याकरण सम्मत रूप देने में पाणिनि का योगदान अतुलनीय माना जाता है। अष्टाध्यायी मात्र व्याकरण ग्रंथ नहीं है। इसमें प्रकारांतर से तत्कालीन भारतीय समाज का पूरा चित्र मिलता है।
इनके द्वारा भाषा के सन्दर्भ में किये गये महत्त्व पूर्ण कार्य 19वी सदी में प्रकाश में आने लगे |
19वी सदी में यूरोप के एक भाषा विज्ञानी Franz Bopp (14 सितम्बर 1791 – 23 अक्टूबर 1867) ने श्री पाणिनि के कार्यो पर गौर फ़रमाया । उन्हें पाणिनि के लिखे हुए ग्रंथों में तथा संस्कृत व्याकरण में आधुनिक भाषा प्रणाली को और परिपक्व करने के नए मार्ग मिले |
इसके बाद कई संस्कृत के विदेशी चहेतों ने उनके कार्यो में रूचि दिखाई और गहन अध्ययन किया जैसे: Ferdinand de Saussure (1857-1913), Leonard Bloomfield (1887 – 1949) तथा एक हाल ही के भाषा विज्ञानी Frits Staal (1930 – 2012).

तथा इसी क्रम में आगे बढ़ते हुए 19वि सदी के एक जर्मन विज्ञानी Friedrich Ludwig Gottlob Frege (8 नवम्बर 1848 – 26 जुलाई 1925 ) ने इस क्षेत्र में कई कार्य किये और इन्हें आधुनिक जगत का प्रथम लॉजिक विज्ञानी कहा जाने लगा |

जबकि इनके जन्म से लगभग 2400 वर्ष पूर्व ही श्री पाणिनि इन सब पर एक पूरा ग्रन्थ सीना ठोक के लिख चुके थे |
अपनी ग्रामर की रचना के दोरान पाणिनि ने auxiliary symbols (सहायक प्रतीक) प्रयोग में लिए जिसकी सहायता से कई प्रत्ययों का निर्माण किया और फलस्वरूप ये ग्रामर को और सुद्रढ़ बनाने में सहायक हुए |
इसी तकनीक का प्रयोग आधुनिक विज्ञानी Emil Post (फरवरी 11, 1897 – अप्रैल 21, 1954) ने किया और आज की समस्त computer programming languages की नीव रखी |
Iowa State University, अमेरिका ने पाणिनि के नाम पर एक प्रोग्रामिंग भाषा का निर्माण भी किया है जिसका नाम ही पाणिनि प्रोग्रामिंग लैंग्वेज रखा है: यहाँ देखे |

एक शताब्दी से भी पहले प्रिसद्ध जर्मन भारतिवद मैक्स मूलर (१८२३-१९००) ने अपने साइंस आफ थाट में कहा –

“मैं निर्भीकतापूर्वक कह सकता हूँ कि अंग्रेज़ी या लैटिन या ग्रीक में ऐसी संकल्पनाएँ नगण्य हैं जिन्हें संस्कृत धातुओं से व्युत्पन्न शब्दों से अभिव्यक्त न किया जा सके । इसके विपरीत मेरा विश्वास है कि 2,50,000 शब्द सम्मिलित माने जाने वाले अंग्रेज़ी शब्दकोश की सम्पूर्ण सम्पदा के स्पष्टीकरण हेतु वांछित धातुओं की संख्या, उचित सीमाओं में न्यूनीकृत पाणिनीय धातुओं से भी कम है ।
अंग्रेज़ी में ऐसा कोई वाक्य नहीं जिसके प्रत्येक शब्द का 800 धातुओं से एवं प्रत्येक विचार का पाणिनि द्वारा प्रदत्त सामग्री के सावधानीपूर्वक वेश्लेषण के बाद अविशष्ट 121 मौलिक संकल्पनाओं से सम्बन्ध निकाला न जा सके ।”

The M L B D News letter ( A monthly of indological bibliography) in April 1993, में महर्षि पाणिनि को first softwear man without hardwear घोषित किया है। जिसका मुख्य शीर्षक था ” Sanskrit software for future hardware “
जिसमे बताया गया ” प्राकृतिक भाषाओं (प्राकृतिक भाषा केवल संस्कृत ही है बाकि सब की सब मानव रचित है ) को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए अनुकूल बनाने के तीन दशक की कोशिश करने के बाद, वैज्ञानिकों को एहसास हुआ कि कंप्यूटर प्रोग्रामिंग में भी हम 2600 साल पहले ही पराजित हो चुके है। हालाँकि उस समय इस तथ्य किस प्रकार और कहाँ उपयोग करते थे यह तो नहीं कह सकते, पर आज भी दुनिया भर में कंप्यूटर वैज्ञानिक मानते है कि आधुनिक समय में संस्कृत व्याकरण सभी कंप्यूटर की समस्याओं को हल करने में सक्षम है।

व्याकरण के इस महनीय ग्रन्थ मे पाणिनि ने विभक्ति-प्रधान संस्कृत भाषा के 4000 सूत्र बहुत ही वैज्ञानिक और तर्कसिद्ध ढंग से संगृहीत हैं।

NASA के वैज्ञानिक Mr.Rick Briggs.ने अमेरिका में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (artificial intelligence) और पाणिनी व्याकरण के बीच की शृंखला खोज की। प्राकृतिक भाषाओं को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए अनुकूल बनाना बहुत मुस्किल कार्य था जब तक कि Mr.Rick Briggs. द्वारा संस्कृत के उपयोग की खोज न गयी।
उसके बाद एक प्रोजेक्ट पर कई देशों के साथ करोड़ों डॉलर खर्च किये गये।

महर्षि पाणिनि शिव जी बड़े भक्त थे और उनकी कृपा से उन्हें महेश्वर सूत्र से ज्ञात हुआ जब शिव जी संध्या तांडव के समय उनके डमरू से निकली हुई ध्वनि से उन्होंने संस्कृत में वर्तिका नियम की रचना की थी।
तथा इन्होने महादेव की कई स्तुतियों की भी रचना की |

पाणिनीय व्याकरण की महत्ता पर विद्वानों के विचार:

“पाणिनीय व्याकरण मानवीय मष्तिष्क की सबसे बड़ी रचनाओं में से एक है” (लेनिन ग्राड के प्रोफेसर टी. शेरवात्सकी)।
“पाणिनीय व्याकरण की शैली अतिशय-प्रतिभापूर्ण है और इसके नियम अत्यन्त सतर्कता से बनाये गये हैं” (कोल ब्रुक)।
“संसार के व्याकरणों में पाणिनीय व्याकरण सर्वशिरोमणि है… यह मानवीय मष्तिष्क का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अविष्कार है” (सर डब्ल्यू. डब्ल्यू. हण्डर)।
“पाणिनीय व्याकरण उस मानव-मष्तिष्क की प्रतिभा का आश्चर्यतम नमूना है जिसे किसी दूसरे देश ने आज तक सामने नहीं रखा”। (प्रो. मोनियर विलियम्स)

संस्कृत का डंका :
_______________________

कई कल्पों पूर्व तक पूरी पृथ्वी पर जहाँ जहाँ उचित सभ्यता थी वह केवल संस्कृत ही एक मात्र भाषा थी अब वही समय पुनः आ रहा है |
जब से नासा को अपने परीक्षणों द्वारा ज्ञात हुआ की अनंत अन्तरिक्ष में कम्पायमान ध्वनी ॐ है
और यह भी सिद्ध हो चूका है की ॐ प्रणव (ध्वनी ) से ही सृस्ठी की उत्पत्ति हुई है । इस पर भी एक लेख हम जल्दी ही प्रकाशित करेंगे ।
तब से नासा की खपड़ी घूम गई है |
अब नासा कंप्यूटर की भाषा संस्कृत को बनाने की सोच रही है और अन्तरिक्ष में ॐ ध्वनी का संचार करने का विचार कर रही है |
यहाँ देखे :

http://www.ibtl.in/news/international/1815/nasa-to-echo-sanskrit-in-space-website-confirms-its-mission-sanskrit/
http://post.jagran.com/NASA-to-use-Sanskrit-as-computer-language-1332758613

 इस सृष्टी  की उत्पत्ति ॐ प्रणव (शिव नाद) से हुई है और इसी से पञ्च महाभूतों (जल,पृथ्वी, अग्नि, वायु और आकाश ) की भी उत्पति हुई है |
ये तो हमारे ग्रंथो, वेदों में आदि काल से लिखा हुआ है हमसे ही पुछ लेते इतने पैसे व्यर्थ में ही प्रयोगों में खर्च किये | 

संस्कृति – तिलक-टीका

तिलक-टीका: आज्ञा चक्र के भेद
योग ने उस चक्र को जगाने के बहुत-बहुत प्रयोग किये है। उसमें तिलक भी एक प्रयोग है। स्मतरण पूर्वक अगर चौबीस घण्टेु उस चक्र पर बार-बार ध्यालन को ले जाता है तो बड़े परिणाम आते है। अगर तिलक लगा हुआ है तो बार-बार ध्यासन जाएगा। तिलक के लगते ही वह स्था।न पृथक हो जाता है। वह बहुत सेंसिटिव स्थाघन है। अगर तिलक ठीक जगह लगा है तो आप हैरान होंगे, आपको उसकी याद करनी ही पड़ेगी, बहुत संवेदनशील जगह है। सम्भावत: शरीर में वि सर्वाधिक संवेदनशील जगह हे। उसकी संवेदनशीलता का स्पार्श करना, और वह भी खास चीजों से स्पेर्श करने की विधि है—जैसे चंदन का तिलक लगाना।

सैकड़ों और हजारों प्रयोगों के बाद तय किया था कि चन्दखन का क्योंग प्रयोग करना है। एक तरह की रैजोनेंस हे चंदन में। और उस स्थागन की संवेदनशीलता में। चंदन का तिलक उस बिन्दु की संवेदनशीलता को और गहन करता है। और घना कर जाता है। हर कोई तिलक नहीं करेगा। कुछ चीजों के तिलक तो उसकी संवेदनशीलता को मार देंगे, बुरी तरह मार देंगे आज स्त्रि यां टीका लगा रही है। बहुत से बाजारू टीके है वे उनकी कोई वैज्ञानिकता नहीं है। उनका योग से कोई लेना देना नहीं है। वे बाजारू टीके नुकसान कर रहे है। वह नुकसान करेंगे।

सवाल यह है कि संवेदनशीलता को बढ़ाते है या घटाते है। अगर घटाते है संवेदनशीलता को तो नुकसान करेंगे, और बढ़ाते है तो फायदा करेंगे। और प्रत्ये क चीज के अलग-अलग परिणाम है, इस जगत में छोटे से फर्क पड़ता है। इसको ध्याफन में रखते हुए कुछ विशेष चीजें खोजी गयी थी। जिनका ही उपयोग किया जाए। यदि आज्ञा का चक्र संवेदनशील हो सके, सक्रिय हो सके तो आपके व्योक्तिजत्व में एक गरिमा और इन्टीकग्रिटी आनी शुरू होगी। एक समग्रता पैदा होगी। आप एक जुट होने लगते है। कोई चीज आपके भीतर इकट्ठी हो जाती है। खण्डी-खण्डत नहीं अखण्डज हो जाती है।

इस संबंध में टीके के लिए भी पूछा है तो वह भी ख्याशल में ले लेन चाहिए। तिलक से थोड़ा हटकर टीके को प्रयोग शुरू हुआ। विशेषकर स्त्रि्यों के लिए शुरू हुआ। उसका कारण वही था, योग का अनुभव काम कर रहा था। असल में स्त्रि यों का आज्ञा चक्र बहुत कमजोर चक्र है—होगा ही। क्यों कि स्त्री का सारा व्यक्तित्व निर्मित किया गया है समर्पण के लिए। उसके सारे व्य क्तिचत्व की खूबी समर्पण की है। आज्ञा चक्र अगर उसका बहुत मजबूत हो तो समर्पण करना मुश्किकल हो जाएगा। स्त्री के पास आज्ञा का चक्र बहुत कमजोर हे। असाधारण रूप से कमजोर है। इसलिए स्त्री सदा ही किसी का सहारा माँगती रहेगी। चाहे वह किसी रूप में हो। अपने पर खड़े होने का पूरा साहस नहीं जुटा पायेगी। कोई सहारा किसी के कन्धेव पर हाथ, कोई आगे हो जाए कोई आज्ञा दे और वह मान ले इसमें उसे सुख मालूम पड़ेगा।

स्त्रीप के आज्ञा चक्र को सक्रिय बनाने के लिए अकेली कोशिश इस मुल्कऔ में हुई है, और कहीं भी नहीं हुई। और वह कोशिश इसलिए थी कि अगर स्त्रीो का आज्ञा चक्र सक्रिय नहीं होता तो परलोक में उसकी कोई गति नहीं होती। साधना में उसकी कोई गति नहीं होती। उसके आज्ञा चक्र को तो स्थि र रूप से मजबूत करने की जरूरत है। लेकिन अगर यह आज्ञा चक्र साधारण रूप से मजबूत किया जाए तो उसके स्त्रैरण होने में कमी पड़ेगी। और उसमें पुरुषत्व के गुण आने शुरू हो जायेंगे। इसलिए इस टीके को अनिवार्य रूप से उसके पति से जोड़ने की चेष्टाी की गई। उसके जोड़ने का करण है।

इस टीके को सीधा नही रखा दिया गया उसके माथे पर, नहीं तो उसके स्त्री त्वर कम होगा। वह जितनी स्वटनिर्भर होने लगेगी उतनी ही उसकी कमनीयता, उसका कौमार्य नष्ट् हो जाएगा। वह दूसरे का सहारा खोजती है इसमें एक तरह की कोमलता हे। पर जब वह अपने सहारे खड़ी होगी तो एक तरह की कठोरता अनिवार्य हो जाएगी। तब बड़ी बारीकी से ख्याहल किया गया कि उसको सीधा टीका लगा दिया जाए,नुकसान पहुँचेगा उसके व्यरक्ति त्वि में,उसमे मां होने में बाधा पड़ेगी, उसके समर्पण में बाधा पड़ेगी। इसलिए उसकी आज्ञा को उसके पति से ही जोड़ने का समग्र प्रयास किया गया। इस तरह दोहरे फायदे होंगे। उसके स्त्रैजण होने में अन्त र नहीं पड़ेगा। बल्किा अपने पति के प्रति ज्याेदा अनुगत हो पायेगी। और फिर भी उसकी आज्ञा का चक्र सक्रिय हो सकेगा।

इसे ऐसा समझिए, आज्ञा का चक्र जिससे भी संबंधित कर दिया जाए, उसके विपरीत कभी नहीं जाता। चाहे गुरु से संबंधित कर दिया जाए तो गुरु के विपरीत कभी नही जाता। चाहे पति के संबंधित कर दिया जाए तो पति से विपरीत कभी नहीं जाता। आज्ञा चक्र जिससे भी संबंधित कर दिया जाए उसके विपरीत व्यक्तित्व नहीं जाता। अगर उस स्त्री के माथे पर ठीक जगह पर टीका है तो वह सिर्फ पति तो अनुगत हो सकेगी। शेष सारे जगत के प्रति वह सबल हो जाएगी। यह करीब-करीब स्थिैति वैसी है अगर आप सम्मोसहन के संबंध में कुछ समझते है तो इसे जल्दी समझ जायेंगे।

एक तरफ वह समर्पित होती है अपने पति के लिए। और दूसरी और शेष जगत के लिए मुक्ते हो जाती है। अब उसके स्त्रीब तत्वि के लिए कोई बाधा नहीं पड़ेगी। इसीलिए जैसे ही पति मर जाए टीका हटा दिया जाता है। वह इसलिए हटा दिया गया है। कि अब उसका किसी के प्रति भी अनुगत होने का कोई सवाल नहीं रहा।

लोगों को इस बात का कतई ख्यागल नहीं है, उनको तो ख्या ल है कि टीका पोंछ दिया,क्योंअकि विधवा हो गयी। पोंछने को प्रयोजन है। अब उसके अनुगत होने को कोई सवाल नहीं रहा। सच तो यह है कि अब उसको पुरूष की भांति ही जीना पड़ेगा। अब उसमें जितनी स्वरतंत्रता आ जाए, उतनी उसके जीवन के लिए हितकर होगी। जरा सा भी छिद्र बल्नीरेबिलिटी का जरा सा भी छेद जहां से वह अनुगत हो सके वह हट जाए।

टीके का प्रयोग एक बहुत ही गहरा प्रयोग है। लेकिन ठीक जगह पर हो, ठीक वस्तुा का हो। ठीक नियोजित ढंग से लगाया गया हो तो ही कार गार है अन्यीथा बेमानी है। सजावट हो शृंगार हो उसका कोई मूल्‍य नहीं है। उसका कोई अर्थ नहीं है। तब वह सिर्फ औपचारिक घटना है। इसलिए पहली बार जब टीका लगया जाए तो उसका पूरा अनुष्ठाअन हे। और पहली दफा गुरु तिलक दे तब उसके पूरा अनुष्ठा न से ही लगाया जाए। तो ही परिणामकारी होगा। अन्यदथा परिणामकारी नहीं होगा।

आज सारी चींजे हमें व्यर्थ मालूम पड़ने लगी है। उनका कारण है। आज तो व्यणर्थ है। क्योंठकि उनके पीछे को कोई भी वैज्ञानिक रूप नहीं रहा है। सिर्फ उसकी खोल रह गयी है। जिसको हम घसीट रहे है। जिसको हम खींच रहे है, बेमन जिसके पीछे मन का कोई लगाव नहीं रह गया है। आत्मास को कोई भाव नहीं रह गया है, और उसके पीछे की पूरी वैज्ञानिकता का कोई सूत्र भी मौजूद नहीं है। वह आज्ञा चक्र है, इस संबंध में दो तीन बातें और समझ लेनी चाहिए क्योंवकि यह काम आ सकती है। इसका उपयोग किया जा सकता है।

आज्ञा चक्र की जो रेखा है उस रेखा से ही जुड़ा हुआ हमारे मस्तिोष्क का भाग है। इससे ही हमारा मस्ति ष्का शुरू होता है। लेकिन अभी भी हमारे मस्ति्ष्को का आधा हिस्सास बेकार पडा हुआ है। साधारण:। हमारा जो प्रतिभाशाली से प्रतिभाशाली व्यिक्तिो होता है। जिसको हम जीनियस कहें, उसके भी केवल आधा ही मस्तिाष्का काम करता है। आध काम नहीं करता। वैज्ञानिक बहुत परेशान है, फिजियोलाजिस्ट बहुत परेशान है कि यह आधी खोपड़ी का जो हिस्साक है, यह किसी भी काम में नहीं आता। अगर आपके इस आधे हिस्सेे को काटकर निकाल दिया जाए तो आपको पता भी नहीं चलेगा। कि कहीं कोई चीज कम हो गई है। क्यों कि उसका ता कभी उपयोग ही नहीं हुआ है, वहन होने के बारबार है।

लेकिन वैज्ञानिक जानते है प्रकृति कोई भी चीज व्यकर्थ निर्मित नहीं करती। भूल होती है, एकाध आदमी के साथ हो सकती है। यह ता हर आदमी के साथ आधा मस्तिउष्कम खाली पडा हुआ है। बिलकुल निष्क्रि य पडा हुआ है। उसके कहीं कोई चहल पहल भी नहीं है। योग का कहना है कि वह जो आधा मस्ति ष्क है वह आज्ञा चक्र के चलने के बाद शुरू होता है। आधा मस्ति ष्कम आज्ञा चक्र ने नीचे के चक्रों से जुड़ा है और आधा मस्ति ष्के आज्ञा चक्र के ऊपर के चक्रों से जुड़ा हुआ है। नीचे के चक्र शुरू होत है तो आधा मस्तिाष्क काम करता है और जब आज्ञा के ऊपर काम शुरू होता है तब आधा मस्तिैष्कै काम शुरू करता है।

इस संबंध में हमें ख्यामल भी नहीं आता कि जब कोई चीज सक्रिय न हो जाए हम सोच भी नहीं सकते। सोचने का भी कोई उपाय नहीं है। जब कोई चीज सक्रिय होती तब हमें पता चला है।

ओशो
हिंदी लेखन स्वामी आनंद प्रसाद

संस्कृति – उज्ज्वई सांस से हार्ट का बचाव HOW TO SURVIVE A HEART ATTACK WHEN ALONE



संस्कृति – उज्ज्वई सांस से हार्ट का बचाव 


HOW TO SURVIVE A HEART ATTACK WHEN ALONE…….
Since many people are alone when they suffer a heart  attack, without help,the person whose heart is beating
improperly and who begins to feel faint, has only about 10 seconds left before losing consciousness.

However,these victims can help themselves by coughing repeatedly and very vigorously. A deep breath should be taken before each cough, and the cough must be deep and prolonged, as when producing sputum from deep inside the chest.

A breath and a cough must be repeated about every two seconds without let-up until help arrives, or until the heart is felt to be beating normally again. Deep breaths get oxygen into the lungs and coughing movements squeeze the heart and keep the blood circulating. The squeezing pressure on the heart also helps it regain normal rhythm. In this way, heart attack victims can get to a hospital. Tell as many other people as possible about this. It could save their lives!!

Source – https://www.facebook.com/CrushOnNurses
Community Name – Sanjeevni college of Medical Science. 

      News paper Name – Dainik Jagran – dated – 22feb,2013

संस्कृति – यज्ञ चिकित्सा –




यज्ञ चिकित्सा 


टायफायड :
यह एक मौसमी व भयानक रोग होता है | इस रोग के कारण इससे यथा समय उपचार न होने से रोगी अत्यंत कमजोर हो जाता है तथा समय पर निदान न होने से मृत्यु भी हो सकती है | उपर्वर्णित ग्रन्थों के आधार पर यदि ऐसे रोगी के पास नीम , चिरायता , पितपापदा , त्रिफला , आदि जड़ी बूटियों को समभाग लेकर इन से हवन किया जावे तथा इन का धुआं रोगी को दिया जावे तो लाभ होगा |

ज्वर :
ज्वर भी व्यक्ति को अति परेशान करता है किन्तु जो व्यक्ति प्रतिदिन यग्य करता है , उसे ज्वर नहीं होता | ज्वर आने की अवास्था में अजवायन से यज्ञ करें तथा इस की धुनी रोगी को दें | लाभ होगा |


नजला, , सिरदर्द जुकाम
यह मानव को अत्यंत परेशान करता है | इससे श्रवण शक्ति , आँख की शक्ति कमजोर हो जाते हैं तथा सर के बाल सफ़ेद होने लगते हैं | लम्बे समय तक यह रोग रहने पर इससे तायिफायीद या दमा आदि भयानक रोग भी हो सकते हैं | इन के निदान के लिए मुनका से हवन करें तथा इस की धुनी रोगी को देने से लाभ होता है |


नेत्र ज्योति 
नेत्र ज्योति बढ़ाने का भी हवन एक उत्तम साधन है | इस के लिए हवन में शहद की आहुति देना लाभकारी है | शहद का धुआं आँखों की रौशनी को बढ़ता है


मस्तिष्क को बलमस्तिष्क की कमजोरी मनुष्य को भ्रांत बना देती है | इसे दूर करने के लिए शहद तथा सफ़ेद चन्दन से यग्य करना चाहिए तथा इस का धुन देना उपयोगी होता है |


वातरोग
: वातरोग में जकड़ा व्यक्ति जीवन से निराश हो जाता है | इस रोग से बचने के लिए यज्ञ सामग्री में पिप्पली का उपयोग करना चाहिए | इस के धुएं से रोगी को लाभ मिलता है |


मनोविकार
मनोरोग से रोगी जीवित ही मृतक समान हो जाता है | इस के निदान के लिए गुग्गल तथा अपामार्ग का उपयोग करना चाहिए | इस का धुआं रोगी को लाभ देता है |


मधुमेह :
यह रोग भी रोगी को अशक्त करता है | इस रोग से छुटकारा पाने के लिए हवन में गुग्गल, लोबान , जामुन वृक्ष की छाल, करेला का द्न्थल, सब संभाग मिला आहुति दें व् इस की धुनी से रोग में लाभ होता है |


उन्माद मानसिक
यह रोग भी रोगी को मृतक सा ही बना देता है | सीताफल के बीज और जटामासी चूरन समभाग लेकर हवन में डालें तथा इस का धुआं दें तो लाभ होगा |


चित्भ्रम
यह भी एक भयंकर रोग है | इस के लिए कचूर ,खास, नागरमोथा, महया , सफ़ेद चन्दन, गुग्गल, अगर, बड़ी इलायची ,नारवी और शहद संभाग लेकर यग्य करें तथा इसकी धुनी से लाभ होगा |


पीलिया
इस के लिए देवदारु , चिरायत, नागरमोथा, कुटकी, वायविडंग संभाग लेकर हवन में डालें | इस का धुआं रोगी को लाभ देता है |


क्षय रोग
यह रोग भी मनुष्य को क्षीण कर देता है तथा उसकी मृत्यु का कारण बनता है | ऐसे रोगी को बचाने के लिए गुग्गल, सफेद चन्दन, गिलोय , बांसा(अडूसा) सब का १०० – १०० ग्राम का चूरन कपूर ५- ग्राम, १०० ग्राम घी , सब को मिला कर हवन में डालें | इस के
धुएं से रोगी को लाभ होगा |


मलेरिया
मलेरिया भी भयानक पीड़ा देता है | ऐसे रोगी को बचाने के लिए गुग्गल , लोबान , कपूर, हल्दी , दारुहल्दी, अगर, वाय्वडिंग, बाल्छाद, ( जटामासी) देवदारु, बच , कठु, अजवायन , नीम के पते समभाग लेकर संभाग ही घी डाल हवन करें | इस का धुआं लाभ देगा |


अपराजित या सर्वरोग नाशक धुप
गुग्गल, बच, गंध, तरीन, नीम के पते, अगर, रल, देवदारु, छिलका सहित मसूर संभाग घी के साथ हवन करें | इसके धुआं से लाभ होगा तथा परिवार रोग से बचा रहेगा |