संस्कृति -मेरी सोच आज की भारतीय संस्कृति INDIAN CULTURE पर

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  • एक बार मेरा एक दोस्त बेर के पेड़ पर बेर के फल तोड़ रहा था।किसी कारणवश वो असंतुलित हो गया और नाचे गिर पड़ा।वो गिरा तो बहुत ऊंचाई से था पर उसके मित्र समूह में कुछ उसके विरोधी भी थे जो उसके गिरने पर हंसने लगे।तभी मेरे उस मित्र ने कहा कि हंस क्यों रहे हो सालों मैं पेड़ से गिरा थोड़े ही हूँ मैंने तो छलांग लगाई है वहाँ से।ह…हा…जब भी ये बात सोचता हूँ तो हंसी आ जाती है क्योंकि सच में उन विरोधियों का मुंह बंद कर दिया था उसने।
    यही हाल मैं अपने भारतीयों का देखता हूँ पर यहाँ मुझे हंसी नहीं आती दुःख होता है।क्योंकि यहाँ स्थिति उल्टी है।विरोधी की जगह मेरे देशवासी हैं और मेरे चालाक मित्र की जगह मेरे दुश्मन।

    जिस टाई को विदेशी अपनी नाक पोछने के लिए बांधते थे उस टाई को बांधना हमने अपनी शान समझ लिया।विदेशों में तो सर्दी है लोगों की नाक बहती रहती है पर हमारे यहाँ तो गर्मी है…..!
    विदेशी हमारी तरह रोटी-सब्जी या दाल-भात नहीं खाते हैं तो वे हाथ के बजाय कांटे-छूरी या चम्मच का प्रयोग करते हैं पर हम क्यों??चम्मच और कटोरी का मेल है।चूंकि कटोरी में खीर-सेवई जैसे तरल पदार्थ खाए जाते हैं तो चम्मच जरूरी है पर रोटी और सब्जी में चम्मच क्यों?हमारा हाल तो ऐसा हो गया है कि हम एक हाथ से रोटी खा भी नहीं पाते।रोटी तोड़ने के लिए हमें दोनों हाथ लगाने पड़ते हैं।चूंकि दाएँ हाथ में तो चम्मच होता है इसलिए बाएँ हाथ से ही रोटी का निवाला मुंह में डालते जाते है।चूंकि हाथ तो ज्यादा गंदा होता नहीं है इसलिए खाने के बाद हाथ धोने की बजाय बस हाथ झाड़कर काम चला लेते हैं हम।जो चम्मच की बजाय हाथ से खाना खाते हैं वो हमसे ज्यादा शुद्धता बरतते हैं क्योंकि खाने के बाद कम-से-कम वो हाथ तो धोते हैं पर फिर भी अगर हम अपने सामने किसी को हाथ से खाते देख लेते हैं तो हमें घिन आने लगती है कि कितना असभ्य और घिनौना है ये व्यक्ति जो चम्मच की बजाय हाथ गंदा कर रहा है।जो चीज हम मुंह में डालते हैं वही चीज किसी के हाथ में सट जाती है तो हमें घिन आने लगती है।आखिर हम सभ्य,आधुनिक और अंग्रेज़ के वफादार जो हैं और ये तो हाथ से खाने वाले साले असभ्य और गरीब भारतीय!
    हम भले ही हाथ से दाल-भात खाने में भी असमर्थ हों पर हम फिर भी सभ्य है।आखिर अंग्रेज़ होने का मुहर जो लग गया हमपर!
    अंग्रेजों को पानी की कमी होगी या ठण्ड के कारण हाथ भिंगोना नहीं चाहते होंगे तो वे पानी की बजाय कागज का प्रयोग करते हैं पर हमें तो ईश्वर ने गर्मी और प्रचुर पानी दिया है फिर हम क्यों इतने गंदे बन रहे हैं।खाने के बाद तो हाथ धोने की बात छोड़िए क्यों हम शौच के समय भी पानी के बजाय कागज से पोछने जैसा अत्यंत घिनौना काम करते हैं।??
    अंग्रेज़ तो चाहेंगे ही कि हम भी उनकी तरह बन जाएँ।आज जितने भी बड़े-बड़े विदेशी पिज्जा-हट,मैक-डोनाल्ड,कैफे-टाइम जैसे food-corner हैं जिसने उस दूकान में करोड़ों की पूंजी लगाई है जहां मंहगे-मंहगे कुर्सी-टेबल,सोफे आदि तो होते हैं पर हाथ धोने के लिए एक बेसिन तक नहीं होता।किस बात की ओर संकेत करता है ये।?
    परिस्थिति ऐसी हो चुकी है कि कल को अगर किसी बीमारी से सारे अंग्रेज़ टकले होने लगें तो भारतीय भी फैशन के नाम पर अपने-अपने सर के बाल मूडवाना शुरू कर देंगे।किसी कारण वश अगर वे लोग अपाहिज हो जाएँ और लाठी लेकर चलना उनकी मजबूरी हो जाय तो हम भी लाठी लेकर चलना अपनी शान समझने लगेंगे।अगर किसी दिन उन्हें कुत्ते का मूत्र भा जाए और वे पीना शुरू कर दे तो हमारे यहाँ भी कुत्ते का मूत मंहगी बोतलों में बिकना शुरू हो जाएगा और शान से हम कुतर-मूत्र की पार्टी भी मनाने लगेंगे॥

    भारतियों के लिए एक कहावत है कि हमेशा हमें दूसरों की बीबी पसंद आती है पर इसका मतलब ये तो नहीं ना कि हमारी बीबी अगर मेनका है और दूसरे की शूर्पनखा फिर भी हमें अपनी मेनका के बजाय शूर्पनखा ही पसंद आए

    गर्व करिए अपने भारतीय होने पर।हम भारतीय वो हैं जिसने पूरी दुनिया को पैंट पहनना और शुशु करना सिखाया है।हम भारतीय तो विश्वगुरु थे चेले-चटिए नहीं।हम चक्रव्रती सम्राट थे किसी के दास नहीं।याद कीजिए भीष्म जैसे हमारे महान पूर्वजों को और आजाद करिए अपने आपको विदेशियों की मानसिक गुलामी से।जो व्यक्ति अपना आत्मविश्वास और आत्मस्वाभिमान खो देता है वो बस एक गुलाम बनकर रह जाता है।ऐसा व्यक्ति कभी अपना विकास नहीं कर सकता।जगाना होगा हम भारतियों को अपना आत्मविश्वास क्योंकि हमें हमारे भारत माँ के खोए हुए सम्मान को फिर से वापस लाना है।हमारी रगों में जो हमारे महान पूर्वजों का खून दौड़ रहा है उसे लज्जित नहीं करना है हमें।हमें दिखा देना है अपने पूर्वजों को कि हम भी उन्हीं की महान संतान हैं जिनके चरणों में सारी दुनिया श्रद्धा से अपना सर झुकाती है

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