संस्कृति-जनेऊ पहनने से लाभ ……

जनेऊ पहनने से लाभ ……

पूर्व में बालक की उम्र आठ वर्ष होते ही उसका यज्ञोपवित संस्कार कर दिया जाता था। वर्तमान में यह प्रथा लोप सी गयी है। जनेऊ पहनने का हमारे स्वास्थ्य से सीधा संबंध है। विवाह से पूर्व तीन धागों की तथा विवाहोपरांत छह धागों की जनेऊ धारण की जाती है। पूर्व काल में जनेऊ पहनने के पश्चात ही बालक को पढऩे का अधिकार मिलता था। मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व जनेऊ को कानों पर कस कर दो बार लपेटनापड़ता है। इससे कान के पीछे की दो नसे जिनका संबंध पेट की आंतों से है।

आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती है। जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है तथा कान के पास ही एक नस से ही मल-मूत्र विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है। जनेऊ उसके वेग को रोक देती है, जिससे कब्ज, एसीडीटी, पेट रोग, मूत्रन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय रोगों सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते। जनेऊ पहनने वाला नियमों में बंधा होता है। वह मल विसर्जन के पश्चात अपनी जनेऊ उतार नहीं सकता। जब तक वह हाथ पैर धोकर कुल्ला न कर ले। अत: वह अच्छी तरह से अपनी सफाई करके ही जनेऊ कान से उतारता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जिवाणुओं के रोगों से बचाती है। जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ हृदय रोगियों को होता है।

 जो भी वेद पाठी है ओर ब्राह्मण ओर क्षत्रिय धर्म का पालन कर्ता है वो पहन सकता है | वैश्य भी पहन 

सकता है अगर इश्वर अनुरागी है | शुद्र इसलिए नही पहन सकता क्यों को उसका कर्म है सफाई आदि 

जिसकि वजह से जनेऊ कि शुद्धि के नियम उसके लिए पालन करना बहुत मुश्किल है| इसलिए उसे उसके

 सेवा धर्म से हि सिद्धि मिल जाती है | जिस पुण्य के लिए ब्राह्मण /क्षत्रिय आदि आदि झक मरते रहते हैं शुद्र 

उसी पुण्य का अधिकारी मात्र उनकी सेवा करने से बन जाता है | लेकिन जिन लोगों कि बुद्धि में अंग्रेजो कि 

पढाई ब्राह्मण /क्षत्रिय कि परिभाषा घुसी हुयी है उनके ये समझ में नही आएगी | अगर जन्म से ब्राह्मण /

क्षत्रिय अपने धर्म का पालन नही करते तो उन्हें भी अधिकार नही है , चाहे वो कितने भी कुलीन ओर विद्वान 

के गृह में क्यों न जन्मे हो | – वंदे मातृ संस्कृति




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इलाज -बरसात के मौसम मैं पकोड़ा खाने के लाभ



बरसात के मौसम मैं पकोड़ा खाने के लाभ 


बरसात होते ही हमारी भारतीय संस्कृति में पकोड़े खाने की प्रथा है, यह कोई मज़ाक नहीं परन्तु 100 प्रतिशत वैज्ञानिक और आपके स्वास्थ्य के लिए अति अनुकूल बात है l
आयुर्वेद के अनुसार वर्षा ऋतू में जब हवा में नमी की मात्र अधिक होती है उस समय शरीर में वात(वायु) का प्रकोप रहता है जिसे नियंत्रण में लाने के लिए शुद्ध तेल (सरसों का तेल)  में बनी चीज़ों का सेवन करना चाहिए l क्योंकि तेल(शुद्ध तेल रिफाइंड तेल नहीं ) वातनाशक होता है इसलिए हमारे यहाँ वर्षा ऋतू में पकोड़े खाने की प्रथा विकसित हुई है l इसलिए बरसात आते ही पकोड़े अवश्य खाएं और सबको खिलाएं……..

नोट : आयुर्वेद के अनुसार सावन (वर्षा ऋतू) में दही, छाछ, दूध, हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन वर्जित बताया गया है क्योंकि ये वात (वायु) वर्धक होते हैं, इसलिए इन्हें सावन में खाया नहीं जाता अपितु महादेव पर अर्पित किया जाता है क्योंकि महादेव हर प्रकार के विष को ग्रहण कर लेते हैं l इसलिए सावन में इन खाद्य पदार्थों का सेवन ना करें l
केवल शुद्ध तेल को ही प्रयोग में लायें रिफाइंड तेल का प्रयोग ना करें क्योंकि तेल को रिफाइंड करने के बाद उसका वातनाशक गुण ख़त्म हो जाता है l

संस्कृति -The story Behind JAN GAN MAN-Our National Anthem

दोस्तों आपको अगर राष्ट्रगान के असली सच के बारे में पता नहीं है तो कृपया रविंद्रनाथ टैगोर जी की चिठ्ठी के साथ पूरी सच्चाई जरुर पढ़ें और अपना व्यक्तव्य भी जरुर दें…….
सन 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था। सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए …के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को 


दिल्ली ले गए और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया। पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो …अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये। इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया। रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा। उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक (Director) रहे। उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था। और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए।
रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है “जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता”। इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था। इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है “भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है। हे अधिनायक (Superhero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो। तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महारास्त्र, द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है। तुम्हारी ही हम गाथा गाते है। हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो। ” में ये गीत गाया गया।
जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया। जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की। वह बहुत खुश हुआ। उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके (जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये। रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए। जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था। उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया। तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबल पुरस्कार को लेने से मना कर दिया। क्यों कि गाँधी जी ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ टेगोर को उनके इस गीत के लिए खूब डांटा था। टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है। जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया।
रविन्द्र नाथ टैगोर की ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलिया वाला कांड हुआ और गाँधी जी ने लगभग गाली की भाषा में उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा, तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? फिर गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और बहुत जोर से डाटा कि अभी तक तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो ? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद खुली। इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया।
सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे। रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे। अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है) । इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत ‘जन गण मन’ अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है। इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है। इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है।लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे।
7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये। 1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी। लेकिन वह दो खेमो में बट गई। जिसमे एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु थे। मतभेद था सरकार बनाने को लेकर। मोती लाल नेहरु चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government) बने। जबकि गंगाधर तिलक कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है। इस मतभेद के कारण लोकमान्य तिलक कांग्रेस से निकल गए और उन्होंने गरम दल बनाया। कोंग्रेस के दो हिस्से हो गए। एक नरम दल और एक गरम दल। गरम दल के नेता थे लोकमान्य तिलक जैसे क्रन्तिकारी। वे हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे। और नरम दल के नेता थे मोती लाल नेहरु (यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे, वो किसी तरफ नहीं थे, लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिए आदरणीय थे क्योंकि गाँधी जी देश के लोगों के आदरणीय थे)। लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे।
नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है। और आप जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी है। उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे। उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को (उस समय तक) भारतीय थे मन,कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया। जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र हो गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली। संविधान सभा की बहस चली। संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई। बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना। और उस एक सांसद का नाम था पंडित जवाहर लाल नेहरु। उनका तर्क था कि वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के दिल को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए (दरअसल इस गीत से मुसलमानों को नहीं अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी)। अब इस झगडे का फैसला कौन करे, तो वे पहुचे गाँधी जी के पास। गाँधी जी ने कहा कि जन गन मन के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूँ और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये। तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया “विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा”। लेकिन नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुए। नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और जन गन मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है।
उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है, और दूसरा पक्ष नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गया नहीं गया। नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे, मुसलमानों के वो इतने हिमायती कैसे हो सकते थे जिस आदमी ने पाकिस्तान बनवा दिया जब कि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे, जन गण मन को इस लिए तरजीह दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था। बीबीसी ने एक सर्वे किया था। उसने पूरे संसार में जितने भी भारत के लोग रहते थे, उनसे पुछा कि आपको दोनों में से कौन सा गीत ज्यादा पसंद है तो 99 % लोगों ने कहा वन्देमातरम। बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और साफ़ हुई कि दुनिया के सबसे लोकप्रिय गीतों में दुसरे नंबर पर वन्देमातरम है। कई देश है जिनके लोगों को इसके बोल समझ में नहीं आते है लेकिन वो कहते है कि इसमें जो लय है उससे एक जज्बा पैदा होता है। तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का। अब ये आप को तय करना है कि आपको क्या गाना है ?


रविन्द्र नाथ टैगोर द्वारा लिखित उनका हस्ताक्षरित …. इंग्लिश में अनुवादित 

Source- Mere Mitra Pankaj Bharat Swabhimani

संस्कृति – संगीत और व्यायाम

र्तमान समय में भारतीय चिकित्सक और विदेशी चिकित्सकों ने भारतीय शास्त्रीय संगीत के महत्व को स्वीकार किया है। संगीत के द्वारा चिकित्सा, यह कुशल चिकित्सक और प्रवीण संगीतज्ञ के द्वारा की जा सकती है। लेकिन यदि शास्त्रीय संगीत को एक व्यायाम के रूप में उपयोग में लिया जाए तो वह प्रत्येक मनुष्य के लिए लाभप्रद होगा। संगीत की तीनों विधाएँ गायन, वादन और नृत्य व्यायाम का कार्य करती है।
गायन के लिए शरीर को पर्याप्त प्रयास करने पड़ते है, जिसके कारण रक्तसंचार में वृद्धि और पाचन क्रिया में सुधार होता है। वक्ष और उदर की मांसपेशियाँ भी प्रभावित होती है। आलाप-तान आदि क्रियाओं से फेफड़े अधिक सक्रिय होकर श्वास सम्बंधित व्यायाम हो जाता है। उसी प्रकार ओम् शब्द पर साधना करते समय ‘ओ’ शब्द से संपूर्ण शरीर में तथा ‘म’ शब्द के उच्चारण से मस्तिष्क में कम्पन्न उत्पन्न होता है। जो हमारे शारीरिक और मानसिक स्वस्थ के लिए लाभप्रद है। इस प्रकार गायन से फेफड़ो के साथ उदर, वक्ष और मांसपेशियों में भी सक्रियता आती है। रक्तसंचार के बढ़ने से स्फूर्ति रहती है। चित्त प्रसन्न रहता है। यह पाचन तंत्र को विशेष रूप से प्रभावित करता है। वाद्य-संगीत की अपेक्षा कंठ संगीत का प्रभाव मानसिक और शारीरिक दोनों दृष्टियों से अधिक हितकर है।
भारतीय चिंतन के अनुसार संगीत के सात स्वर मानव शरीर में स्थित सात चक्रों को झंकृत करते हुए निकलते है। यदि हम संयमपूर्वक मेरु दण्ड को सीधा और स्थिर रखते हुए संगीत के सप्त स्वरों का और अलंकारों का अभ्यास नियमित करें तो शरीर-स्थित सप्त चक्र झंकृत होते हुए स्पष्ट प्रतीत होने लगते है। यह चक्र दूषित हो गए तो शरीर में विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न होते है। उदाहणार्थ—मणिपूर चक्र के दूषित होने पर पाचन सम्बन्धी रोग और अनाहत चक्र के दूषित होने से ह्रदय सम्बन्धी रोग उत्पन्न होते है। प्राचीन काल से ही संगीतज्ञों की यह मान्यता थी कि ध्वनि स्थायु-विद्युत के रूप में नाभि-केंद्र से उठकर ब्रह्मरन्ध्र तक पहुँचती है। इससे स्वर-संधान के साथ षट् चक्रों के सुप्त संधान भी जागृत होते है। इस प्रकार शारीरिक और मानसिक असंतुलन को स्वर-विज्ञान कि सहायता से संतुलित किया जा सकता है। अनेक शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष प्रस्तापित किया है कि ध्वनी-तरंगे कानों द्वारा ग्रहण किये जाने के पश्चात् संवेदी तंत्रिकाओं के माध्यम से मस्तिष्क के मध्य तक पहुँचती है और वही से न्यूरॉन की संरचना द्वारा मस्तिष्क के अन्य भागों तक पहुँचती है।
संगीत के माध्यम से मानसिक दशा के साथ-साथ बुनियादी शारीरिक दशाओं को भी बदला जा सकता है। कुछ शास्त्रज्ञों का मानना है कि प्रतिदिन संगीत का अभ्यास करने वाले व्यक्ति के मस्तिष्क में कोशिकाओं की संख्या अन्य व्यक्तियों की तुलना में अधिक होती है।
गायन के समान वादन भी एक मृदु और मनोरंजक व्यायाम है। इससे शरीर और मन पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। प्रत्येक मनुष्य की हथेलियों और पैरों के तलवों में ऐसे केंद्र होते है जिनका सम्बन्ध शरीर के विभिन्न अंगों से होता है। वैदिक शास्त्र में इसे प्रेशर-पॉइंट कहते है। एक्यूप्रेशर पद्धति में इन्ही प्रेशर पॉइंटो पर दबाव डालकर रोगों की चिकित्सा की जाती है। जब तबला या पखावज का वादन करते है तब इन प्रेशर-पॉइंट पर दबाव पड़ता है और रोग निवारण में सहायता होती है।
नृत्य से शरीर के सभी अंगों का व्यायाम पूर्णरूप से हो जाता है। भ्रू, नयन, भुजा, करि, पाद, ग्रीवा आदि का संचालन नृत्य में विशेष महत्व रखता है। इन्ही के साथ-साथ उदर, वक्ष, फेफड़े, श्वास-तंत्र, पाचन तंत्र, रक्त संचालन भी विशेष रूप से प्रभावित होते है। नृत्य से बाह्य और आंतरिक अंग सक्रिय हो जाते है।
शास्त्रीय नृत्य और ‘ऐरोबिक’ के बीच प्रख्यात नृत्यांगना डॉ नीलम वर्मा ने ताल-मेल बैठाया है। उनका मानना है कि नृत्य से रीढ़ और पॉस्चर सम्बन्धी विभिन्न परेशानियों से राहत मिलती है और व्यक्तित्व का विकास भी होता है। इस प्रकार शारीरिक स्वस्थ्य के साथ ही मस्तिष्क को तरौ-ताज़ा बनाये रखने में भी सहायक है।
सारांश स्वरुप कह सकते है कि शरीर के प्रत्येक अवयव पर स्वास्थवर्धक और अतिशीघ्र प्रभाव डालने वाली संगीत ही उपयुक्त पद्धति है। पाईथागोरस का भी मानना था कि संगीत न केवल व्याधियों से छुटकारा दिलाता है अपितु चरित्र निर्माण में भी सहायक सिद्ध होता है।

संस्कृति – हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में समय का महत्व

हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में समयानुसार गायन प्रस्तुत करने की पद्धति है, तथा उत्तर भारतीय संगीत-पद्धति में रागों के गायन-वादन के विषय में समय का सिध्दांत प्राचीन काल से ही चला आ रहा है, जिसे हमारे प्राचीन पंडितों ने दो भागों में विभाजित किया है। प्रथम भाग दिन के बारह बजे से रात्रि के बारह बजे तक और दूसरा रात्रि के बारह बजे से दिन के बारह बजे तक माना गया है। इसमें प्रथम भाग को पूर्व भाग और दुसरे को उत्तर भाग कहा जाता है। इन भागों में जिन रागों का प्रयोग होता है, उन्हें सांगीतिक भाषा में “पूर्वांगवादी राग” और “उत्तरांगवादी राग” भी कहते है। जिन रागों का वादी स्वर जब सप्तक के पूर्वांग अर्थात् ‘सा, रे, ग, म’, इन स्वरों में से होता है, तो वे ‘पूर्वांगवादी राग’ कहे जाते है, तथा जिन रागों का वादी स्वर सप्तक के उत्तरांग अर्थात् ‘प, ध, नि, सां’, इन स्वरों में से होता है, वे ‘उत्तरांगवादी राग’ कहे जाते है। स्वर और समय के अनुसार उत्तर भारतीय रागों के तीन वर्ग मानकर कोमल-तीव्र (विकृत) स्वरों के अनुसार भी उनका विभाजन किया गया है— १. कोमल ‘रे’ और कोमल ‘ध’ वाले राग, २. शुद्ध ‘रे’ और शुद्ध ‘ध’ वाले राग तथा ३. कोमल ‘ग’ और कोमल ‘नि’ वाले राग। इस आधार पर सम्पूर्ण राग-रागिनियों की रचना की गयी है।
जैसे— ब्रह्म मुहूर्त पर ईश्वर आराधना से दिन प्रारंभ होता है, इसलिए राग भैरव में गाते है “जागो मोहन प्यारे”। पूजा-अर्चना समाप्त हो जाने के बाद दिन शुरू होता है। कामकाज से जीवन आरम्भ होने लगता है, तब तोड़ी राग में गाते है “लंगर कांकरिया जिन मारों”। सूरज माथे पर चढ़ने लगा है, अलसाई हुई दोपहर की देहलीज पर शारीर का थकना स्वाभाविक है। तब राग सारंग में गाया जाता है- “अब मोरी बात मानले पियरवा”। पैरों के पास रुकी हुई परछाई अब शारीर से दूर होने लगती है, रुके थके हाथ फिर से कामकाज में मग्न हो जाते है।
संध्या का आभास होने लगता है, तब राग मुलतानी में गाया जाता है “आँगन में नन्द लाल, ठुमक-ठुमक चलत चाल”। थका हारा सूरज पश्चिम की ओर झूकने लगता है तब मन की उदासी में होठों पर राग मारवा के शब्द गुनगुनाने लगते है “पिया मोरे अनंत देस गये”। संध्या की बेला में श्याम रंग में लीन होने के लिए मन अधीर हो उठता है ऐसे समय पिया की याद आना स्वाभाविक है तब राग पुरियाधानाश्री में “तुमरे मिलन की आस करू मैं” गाया जाता है।

राग-समय-चक्र
रात का रंग चढ़ने लगता है, मन की चंचलता, मिलन की आकांक्षाओं में झूलता मन पिया के लिए राग बागेश्री में गाता है “अपनी गरज पकड़ लीनी बैंया मोरी”। गहराती श्यामल रात अकेलेपन से छुटकारा पाने के लिए विरह व्याकुल मन राग मालकौंस में गाता है “याद आवत मोहे पिया की बतियाँ, कैसे गुजारु सखी उन बिन रतियाँ”।
मध्यरात्रि का समय हो गया है, भौतिक सुख-दुःख की अनुभूतियाँ लेने के बाद भी मन की रिक्तता पूर्ण नहीं होती। तब इस सांसारिक बन्धनों के पार उस ईश्वर के दर्शन की अभिलाषा मन में जाग्रत होती है और तब दरबारी कान्हड़ा में गाया जाता है “प्रथम ज्योति ज्वाला, शरण तेरी ये माँ”। रात्रि का अंतिम प्रहर ईश्वर तक पहुँचने के लिए अधिर मन राग अड़ाना में गाता है “अब कैसे घर जाऊ, श्याम मोहे रोकत-रोकत”।
इसी चक्र के अनुसार रागों का चलन होता है। वैसे अनेक गायक-वादक अपनी इच्छानुसार इन रागों के क्रम में परिवर्तन करके गाते-बजाते है तथा अन्य रागों का समावेश भी इच्छानुसार कर लेते है। किन्तु गायक या वादक को समय का ध्यान रखकर ही गायन-वादन करना चाहिए अन्यथा समय का ध्यान रखकर गायन-वादन नहीं करने से श्रोताओं पर उसका अच्छा प्रभाव नहीं होता है, और न राग से रसोत्पत्ति संभव है।

संस्कृति – Medical Benefits of Ragas

ब्रह्माण्ड ताल और लय से रचा गया है। इसके संचालन में एक सुक्ष्म ध्वनि होती है। यह ध्वनि एक शक्तिशाली उर्जा है। पंचमहाभूत इस निसर्ग में व्याप्त है, उसीसे मानवीय शरीर बना हुआ है। इससे मानवीय आत्मतत्व ईश्वरीय परतत्व के साथ एकरूप होता है। ध्वनि अर्थात नाद को ब्रह्म कहते है, यह नाद ब्रह्म भगवती सरस्वती के आशीर्वाद से संपन्न होने वाली कला है। जब यह ध्वनि भिन्न-भिन्न स्वरों से स्वरबद्ध होती है तब वह अलग-अलग ताल और राग में निबद्ध हो जाती है। संगीत के ताल और राग मानवीय मनोवस्था का परिवर्तन करने में सक्षम होती है। उसके साथ शारीरिक परिवर्तन भी होते है। इसलिए संगीत से प्रवाहित होनेवाली ध्वनि ही सांगीतिक उपचार के रूप में पहचानी जाती है।
हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत गायक के शरीर और मन को प्रभावित करता है। उसी प्रकार श्रोताओं पर भी उसका प्रभाव पड़ता है। संगीत की शिक्षा ग्रहण करने से हमारे मन पर अच्छा प्रभाव होता है। इसी के द्वारा निसर्ग उपचार भी किया जा सकता है। अच्छा संगीत हमको शक्ति प्रदान करता है, शरीर में स्फूर्ति उत्पन्न करता है तथा आनंद और शांति की अनुभूति होती है। मनुष्य शरीर के प्रत्येक कण-कण में शक्ति का संचार रहता है जो संगीत सुनने के बाद मानसिक शांति प्रदान करता है। विशिष्ट प्रकार का संगीत विशिष्ट समय पर सुनने से ऐसा निर्देशित हुआ है की यह स्वस्थ शरीर रखने में मददगार होता है। ऐसा वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया गया है की शास्त्रीय संगीत से पीयूषिका – ग्रंथि उधिपित्त होती है जो अंतर्गत स्वरुप में शारीरिक संरचना और रक्त प्रवाह को प्रभावित करता है।  आधुनिक चिकित्सा शास्त्र इस बात को स्वीकार करता है की ध्वनि तीव्र गति से मानवीय शरीर में प्रवेश कर सकती है और इसका उपयोग सातत्य से किया गया तो वह आधुनिक अल्ट्रा साउंड का कार्य भी करने में समर्थ है। स्वर वातावरण को कैसे प्रभावित करते है इसका उदाहरण सुप्रसिद्ध गायक तानसेन के गायन से दिया जा सकता है। जब उन्होंने दीप राग गाया तो अकबर के दरबार के दीपक जल उठे थे। आधुनिक चिकित्सा शास्त्र ध्वनि के इस सिद्धांत को स्वीकार करते है, इसलिए अनेक रोगों को ठीक करने के लिए इसका उपयोग करने का प्रयास किया जाता है।
पाश्चात्य देशों में संगीतीय उपचार पद्धति को स्वीकार गया है। अमेरिका के अनेक उपचार केन्द्रों पर उच्चरक्तचाप को ठीक करने के लिए गोरख कल्याण राग का प्रयोग किया जाता है। चेन्नई के राग रिसर्च सेंटर ने भारतीय शास्त्रीय संगीत के राग और उनका उपचार संगीत के माध्यम से कैसे किया जा सकता है इसका अभ्यास किया है। इस अध्ययन से यह स्पष्ट हो रहा है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत अपचन, गठिया, उच्च रक्तचाप, अस्थमा, पुरानी सिरदर्द, कैंसर आदि रोगों के उपचार में लाभकारी स्थापित हुआ है। इसके माध्यम से किसी निश्चित राग से निश्चित रोग को ठीक किया जा सकता है यह बताया गया है। जैसे—
  • टी.बी के लिए राग मेघमल्हार
  • पुरानी सिरदर्द के लिए राग दरबारी कान्हड़ा और जैजैवंती
  • उच्च रक्तचाप के लिए राग गोरख कल्याण, भीमपलासी और पुरिया
  • अवसाद के लिए राग नटनारायण
  • लकवे के लिए राग जैजैवंती
  • त्वचा रोग के लिए राग आसावरी।
महान संगीतज्ञ पंडित विश्वमोहन भट्ट कहते है कि “पाश्चात्य देशों के श्रोता इस बात का आश्चर्य करते है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत के गायक किसी भी प्रकार के नोटेशन अपने सामने न रखकर प्रस्तुति देते है। उनके स्वर भावनाओं से जुड़े होने के कारण श्रोताओं के मानसिक संवेदनाओं को प्रभावित करते है। इसलिए उन्हें स्वरों से ईश्वरीय आनंद कि अनुभूति होती है। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत मानवीय मन और शरीर दोनों को ही स्वस्थ करने में सक्षम है।

संस्कृति – सूर्य-मंदिर और मिहिर नृत्य

प्राचीन नृत्य-शैलियों के दो प्रकार प्रचलित थे, एक ताण्डव नृत्य और दूसरा लास्य नृत्य। समय के साथ यह नाम शिव तांडव में सात भागो में विभाजित हो गए। । वेद कालीन नृत्यों का प्रचलन महाभारत काल तक रहा था। उस युग में कृष्ण का निर्यात ताण्डव, अर्जुन का धीर ताण्डव इसके अतिरिक्त मृत्युंजय-ताण्डव, लक्षण ताण्डव आदि है।
नृत्य का उपयोग स्वस्थ लाभ के लिए सर्वोत्तम साधन माना जाता है । इसके अंग-सञ्चालन, पद-सञ्चालन और हास्य मुद्राओं आदि के प्रयोग से शरीर के विभिन्न नाड़ियों पर प्रभाव पड़ता है। जिससे अनेक प्रकार की बीमारियाँ ठीक हो जाती है। इसके लिए भगवान कृष्ण के पौत्र साम्ब का उदाहरण दिया जाता है।
कुष्ठ रोग से पीड़ित साम्ब की चिकित्सा-हेतु सूर्योपसना नृत्य अर्थात् धुम्र ताण्डव की शिक्षा देकर वैदिक रीति से नृत्य कराया गया। विभिन्न औषधियों के एवं यज्ञ-हवनो के साथ ही नृत्य कला को भी चिकित्सा का मुख्य साधन माना गया था। जिससे साम्ब को लाभ हुआ। फिर उन ब्राह्मणों को वहीं बसाकर सूर्योपसना हेतू उनके लिए सूर्य-मंदिर स्थापित कर दिए गये।
सूर्य प्रतिमा के इन पुजारियों ने भगवान सूर्य को प्रसन्न करने की दृष्टी से मंदिरों में जो नृत्य किया अथवा शिष्यों द्वारा करवाया वह ‘मिहिर नृत्य’ कहलाया। इस नृत्य कला के आचार्य “मिहिराचार्य” के नाम से जाने गये। इस नृत्य शैली का प्रभाव प्रमुखतः से उत्तर भारत के सूर्य-मंदिरों में रहा।
“मिहिर” शब्द सूर्य का द्योतक है। सूर्य-मंदिरों के नाम से कई स्थानों पर मिहिर-मंदिर भी मिलते है। सूर्य-मंदिरों में गायक, वादक अथवा नर्तक-नर्तकियों को भी नियुक्त किया जाता था।
इस शैली के अंग-प्रत्यंगों के सञ्चालन एवं पदाक्षर आदि के दर्शन वर्तमान में प्रचलित शास्त्रीय नृत्य “कत्थक” और उडिसी नृत्य शैली में होता है। कत्थक नृत्य का स्वरुप ताण्डव प्रधान होने से यह सूर्योपासना ताण्डव है तथा उडिसी नृत्य लास्य नृत्य का रूप है। उडिसी नृत्य की नृत्यांगनाऒ को मेहरी नाम से संबोधित किया जाता था। कत्थक और उडिसी नृत्य की शैली से ताण्डव (पुरुष) और लास्य (महिला) नृत्य भेदों की जानकारी प्राप्त होती है।
सूर्य-मंदिरों की समाप्ति के साथ “मिहिर-नृत्य” शैली की भी इतिश्री हो गई। यह अपना मूल स्वरुप परिवर्तित कर आज कत्थक और उडिसी नृत्य के रूप में प्रचलित है।