संस्कृति- APJ Kalam On Gift

Excerpts from Dr. A.P.J. Abdul Kalam’s address to the members of India Islamic Cultural Centre, New Delhi, 2007:

“I would like to mention the writings in Manu Smriti which, states that “By accepting gifts the divine light in the person gets extinguished”. Manu warns every individual against accepting gifts for the reason that it places the acceptor under an obligation in favour of the person who …gave the gift and ultimately it results in making a person to do things which are not permitted according to law.

I am sharing this thought with all of you since no one should get carried away by any gift which comes with a purpose and through which one loses his personality greatly.”

(Dr. Kalam delivered this speech when he still was in the high office as the President of India)

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बड़े ही काम की हैं ये वेबसाइट्स, आपको हो जाएगा फायदा (GOOD WEBSITES)

बड़े ही काम की हैं ये वेबसाइट्स, आपको हो जाएगा फायदा


स्टूडेंट्स क…ो गर्मी की छुट्टियों में कई असाइनमेंट्स मिले होंगे। इसके अलावा होम वर्क अलग से होगा। ऐसे में कुछ ऐसी वेबसाइट्स के बारे में जानते हैं, जो इन्हें पूरा करने में मदद करेंगी। स्टूडेंट्स कई बार घर पर पढ़ते हुए ऐसी डिटेल्स पाने की जरूरत महसूस करते हैं, जिनका जिक्र किताबों में तो होता है, लेकिन उस पर गहराई से जानकारी नहीं होती। ऐसे मुद्दों और विषयों पर गहराई से जानकारी हासिल करने के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल किया जा सकता है। जानते हैं कौन सी साइट्स बनेंगी मददगार।

Refdesk.com
यह तथ्यों की जांच करने में मददगार वेबसाइट है। यहां पर इतने विविध तथ्य और जानकारियां मौजूद हैं कि छात्रों के लिए इससे बेहतर होमपेज कोई और नहीं हो सकता। गूगल, बिंग और याहू सर्च रेफडेस्क के होमपेज से ही की जा सकती है। इसके साथ-साथ विकीपीडिया, यू-ट्यूब तथा कई डिक्शनरियों तथा इनसाइक्लोपीडिया में भी सर्च की सुविधा मौजूद है। दिन के खास समाचारों, खास तथ्यों, खास लोगों, खास शब्दों, खास घटनाओं आदि की आकाईव भी उपलब्ध है।
Factmonster.com

इस वेबसाइट को ऑनलाइन अल्मनेक, डिक्शनरी, इनसाइक्लोपीडिया और होम वर्क में मदद करने वाले रिसोर्स के रूप में देख सकते हैं। होमपेज पर ही दुनिया की हलचल, लोग, खेल, विज्ञान, गणित जैसे लिंक्स दिए गए हैं, जिनके भीतर जाने पर तथ्यों और जानकारियों का खजाना खुल जाता है। टाइमलाइन सेक्शन यूजर को इतिहास की यात्रा करने का मौका देता है, तो वर्ड वाइस में शब्द-ज्ञान को आजमा सकते हैं। एटलस आपको दुनिया की सैर कराता है।

Wolframalpha.com

यह एक अनूठा सर्च इंजन है, जो विद्याथिर्यों और शोधकर्ताओं के लिए बेहद उपयोगी है। इसे कम्प्यूटेशनल नॉलेज इंजन कहा गया है, क्योंकि यह किसी भी विषय पर मांगी गई सामग्री को जरूरत के हिसाब से दिखाने में सक्षम है। यह सामान्य सर्च नहीं, बल्कि इंटेलीजेंट सर्च रिजल्ट है जो सिर्फ सूचनाएं नहीं खोजता बल्कि उनका विश्लेषण करके नतीजे दिखाने में सक्षम है। मिसाल के तौर पर गूगल hindi and mandarin लिखकर सर्च करने पर ऐसे पेजों को दिखाया जाता है, जिनमें हिंदी और मंदारिन दोनों का जिक्र हो।
लेकिन यही सर्च टर्म जब Wolframalpha में डाला जाता है, तो वह इन दोनों भाषाओं का तुलनात्मक विश्लेषण दिखाता है। यहां इतिहास से लेकर वर्तमान तक के बारे में जरूरी तथ्य मिलेंगे। विश्व एवं खबरें, इतिहास, खेल, जीवनियां, कलाएं, मनोरंजन, बिजनेस, हेल्थ एंड साइंसेज, कैलेंडर एंड हॉलीडेज जैसी कई श्रणियों में सूचनाओं का भंडार भरा पड़ा है। ज्ञानवर्धक पहेलियां, देशों के प्रोफाइल, कनवर्जन कैलकुलेटर आदि सुविधाएं आपको लुभाएंगी।

Wisegeek.com

इस वेबसाइट पर स्टूडेंट्स की जरूरत के विषयों पर स्तरीय लेखों का भंडार है। साइंस एंड इंजीनियरिंग से जुड़े विषयों पर कोई साढ़े चार हजार, एडल्ट एजुकेशन एंड ट्रेनिंग पर साढ़े पंद्रह हजार, महान हस्तियों पर तेरह सौ, बिजनेस एंड इकोनॉमी पर सात हजार से अधिक, जानवरों और पर्यावरण पर चार हजार, टेक्नोलॉजी और गैजेट्स पर करीब चार हजार लेख मौजूद हैं।

http://www.cultureunplugged.com/

यह साईट उन लोगों के लिए हैं जो विभिन्न संस्कृतियों पर लघु फिल्में और डाक्यूमेंट्री देखना पसंद करते हैं

http://www.totalbhakti.com/
यदि आप उन लोगों में से हैं जो घंटो भक्ति एवं आद्यात्मिक सामग्री सुन्ना पसंद करते हैं तो यह  वेबसाइट आपके लिए हैं

संस्कृति- अपनी भारत की संस्कृति को पहचाने —

अपनी भारत की संस्कृति को पहचाने —

दो पक्ष – कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष !


तीन ऋण – देव ऋण, पित्र ऋण एवं ऋषि त्रण !


चार युग – सतयुग , त्रेता युग , द्वापरयुग एवं कलयुग !


चार धाम – द्वारिका , बद्रीनाथ, जगन्नाथ पूरी एवं रामेश्वरम धाम !


चारपीठ – शारदा पीठ ( द्वारिका ), ज्योतिष पीठ ( जोशीमठ बद्रिधाम), गोवर्धन पीठ ( जगन्नाथपुरी ) एवं 


श्रन्गेरिपीठ !

चर वेद- ऋग्वेद , अथर्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद !


चार आश्रम – ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , बानप्रस्थ एवं संन्यास !


चार अंतःकरण – मन , बुद्धि , चित्त , एवं अहंकार !


पञ्च गव्य – गाय का घी , दूध , दही , गोमूत्र एवं गोबर , !


पञ्च देव – गणेश , विष्णु , शिव , देवी और सूर्य !


पंच तत्त्व – प्रथ्वी , जल , अग्नि , वायु एवंआकाश !


छह दर्शन – वैशेषिक , न्याय , सांख्य, योग , पूर्व मिसांसा एवं दक्षिण मिसांसा !


सप्त ऋषि – विश्वामित्र , जमदाग्नि , भरद्वाज , गौतम , अत्री , वशिष्ठ और कश्यप !


सप्त पूरी – अयोध्या पूरी , मथुरा पूरी , माया पूरी ( हरिद्वार ) , कशी , कांची ( शिन कांची – विष्णु कांची ) ,


 अवंतिका और द्वारिका पूरी !

आठ योग – यम , नियम, आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान एवं समाधी !


आठ लक्ष्मी – आग्घ , विद्या , सौभाग्य , अमृत, काम , सत्य , भोग , एवं योग लक्ष्मी !


नव दुर्गा – शैल पुत्री , ब्रह्मचारिणी , चंद्रघंटा , कुष्मांडा , स्कंदमाता , कात्यायिनी , कालरात्रि , महागौरी एवं 


सिद्धिदात्री !

दस दिशाएं – पूर्व , पश्चिम , उत्तर , दक्षिण, इशान , नेत्रत्य , वायव्य आग्नेय ,आकाश एवं पाताल !


मुख्या ग्यारह अवतार – मत्स्य , कच्छप , बराह , नरसिंह , बामन , परशुराम , श्री राम , कृष्ण , बलराम 


, बुद्ध , एवं कल्कि !

बारह मास – चेत्र , वैशाख , ज्येष्ठ ,अषाड़ , श्रावन , भाद्रपद , अश्विन , कार्तिक , मार्गशीर्ष . पौष , माघ , 


फागुन !

बारह राशी – मेष , ब्रषभ , मिथुन , कर्क , सिंह, तुला , ब्रश्चिक , धनु , मकर , कुम्भ , एवं कन्या !


बारह ज्योतिर्लिंग – सोमनाथ , मल्लिकर्जुना , महाकाल , ओमकालेश्वर , बैजनाथ , रामेश्वरम , विश्वनाथ , 


त्रियम्वाकेश्वर , केदारनाथ , घुष्नेश्वर , भीमाशंकर एवं नागेश्वर !

पंद्रह तिथियाँ – प्रतिपदा , द्वतीय , तृतीय , चतुर्थी , पंचमी , षष्ठी , सप्तमी , अष्टमी , नवमी , दशमी , 


एकादशी , द्वादशी , त्रयोदशी , चतुर्दशी , पूर्णिमा , अमावश्या !

स्म्रतियां – मनु , विष्णु, अत्री , हारीत , याज्ञवल्क्य , उशना , अंगीरा , यम , आपस्तम्ब , सर्वत , 


कात्यायन , ब्रहस्पति , पराशर , व्यास , शांख्य , लिखित , दक्ष , शातातप , वशिष्ठ !

संस्कृति-अँग्रेजी भाषा के बारे में भ्रम *** गुलामी या आवश्यकता

  • आज के मैकाले मानसों द्वारा अँग्रेजी के पक्ष में तर्क और उसकी सच्चाई :

    1. अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है:: विश्व में इस समय १० सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थायें (Top 10 Economies) अमेरिका, चीन, जापान, भारत, जर्मनी, रशिया, ब्राजील, ब्रिटेन, फ्रांस एवं इटली है| जिसमे मात्र २ देश ही अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करते हैं अमेरिका और ब्रिटेन वोह भी एक सी नहीं, दोनों कि अंग्रेजी में भी अंतर है | अब आप ही बताएं कि किस आधार पर अंग्रेजी को वैश्विक भाषा (Global Language) माना जाए |दुनिया में इस समय 204 देश हैं और मात्र 12 देशों में अँग्रेजी बोली, पढ़ी और समझी जाती है। संयुक्त राष्ट्र संघ जो अमेरिका में है वहां की भाषा अंग्रेजी नहीं है, वहां का सारा काम फ्रेंच में होता है। इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईशा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे। ईशा मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषा अरमेक थी। अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी, समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी। पूरी दुनिया में जनसंख्या के हिसाब से सिर्फ 3% लोग अँग्रेजी बोलते हैं जिसमे भारत दूसरे नंबर पर है | इस हिसाब से तो अंतर्राष्ट्रीय भाषा चाइनीज हो सकती है क्यूंकि ये दुनिया में सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाती है और दूसरे नंबर पर हिन्दी हो सकती है।

    2. अँग्रेजी बहुत समृद्ध भाषा है:: किसी भी भाषा की समृद्धि इस बात से तय होती है की उसमें कितने शब्द हैं और अँग्रेजी में सिर्फ 12,000 मूल शब्द हैं बाकी अँग्रेजी के सारे शब्द चोरी के हैं या तो लैटिन के, या तो फ्रेंच के, या तो ग्रीक के, या तो दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ देशों की भाषाओं के हैं। उदाहरण: अँग्रेजी में चाचा, मामा, फूफा, ताऊ सब UNCLE चाची, ताई, मामी, बुआ सब AUNTY क्यूंकी अँग्रेजी भाषा में शब्द ही नहीं है। जबकि गुजराती में अकेले 40,000 मूल शब्द हैं। मराठी में 48000+ मूल शब्द हैं जबकि हिन्दी में 70000+ मूल शब्द हैं। कैसे माना जाए अँग्रेजी बहुत समृद्ध भाषा है ?? अँग्रेजी सबसे लाचार/ पंगु/ रद्दी भाषा है क्योंकि इस भाषा के नियम कभी एक से नहीं होते। दुनिया में सबसे अच्छी भाषा वो मानी जाती है जिसके नियम हमेशा एक जैसे हों, जैसे: संस्कृत। अँग्रेजी में आज से 200 साल पहले This की स्पेलिंग Tis होती थी। अँग्रेजी में 250 साल पहले Nice मतलब बेवकूफ होता था और आज Nice मतलब अच्छा होता है। अँग्रेजी भाषा में Pronunciation कभी एक सा नहीं होता। Today को ऑस्ट्रेलिया में Todie बोला जाता है जबकि ब्रिटेन में Today. अमेरिका और ब्रिटेन में इसी बात का झगड़ा है क्योंकि अमेरीकन अँग्रेजी में Z का ज्यादा प्रयोग करते हैं और ब्रिटिश अँग्रेजी में S का, क्यूंकी कोई नियम ही नहीं है और इसीलिए दोनों ने अपनी अपनी अलग अलग अँग्रेजी मान ली।

    3. अँग्रेजी नहीं होगी तो विज्ञान और तकनीक की पढ़ाई नहीं हो सकती:: दुनिया में 2 देश इसका उदाहरण हैं की बिना अँग्रेजी के भी विज्ञान और तकनीक की पढ़ाई होटी है- जापान और फ़्रांस । पूरे जापान में इंजीन्यरिंग, मेडिकल के जीतने भी कॉलेज और विश्वविद्यालय हैं सबमें पढ़ाई “JAPANESE” में होती है, इसी तरह फ़्रांस में बचपन से लेकर उच्चशिक्षा तक सब फ्रेंच में पढ़ाया जाता है।
    हमसे छोटे छोटे, हमारे शहरों जितने देशों में हर साल नोबल विजेता पैदा होते हैं लेकिन इतने बड़े भारत में नहीं क्यूंकी हम विदेशी भाषा में काम करते हैं और विदेशी भाषा में कोई भी मौलिक काम नहीं किया जा सकता सिर्फ रटा जा सकता है। ये अँग्रेजी का ही परिणाम है की हमारे देश में नोबल पुरस्कार विजेता पैदा नहीं होते हैं क्यूंकी नोबल पुरस्कार के लिए मौलिक काम करना पड़ता है और कोई भी मौलिक काम कभी भी विदेशी भाषा में नहीं किया जा सकता है। नोबल पुरस्कार के लिए P.hd, B.Tech, M.Tech की जरूरत नहीं होती है। उदाहरण: न्यूटन कक्षा 9 में फ़ेल हो गया था, आइंस्टीन कक्षा 10 के आगे पढे ही नही और E=hv बताने वाला मैक्स प्लांक कभी स्कूल गया ही नहीं। ऐसी ही शेक्सपियर, तुलसीदास, महर्षि वेदव्यास आदि के पास कोई डिग्री नहीं थी, इनहोने सिर्फ अपनी मात्रभाषा में काम किया।
    जब हम हमारे बच्चों को अँग्रेजी माध्यम से हटकर अपनी मात्रभाषा में पढ़ाना शुरू करेंगे तो इस अंग्रेज़ियत से हमारा रिश्ता टूटेगा। अंग्रेजी पढ़ायें इसमें कोई बुरे नहीं लेकिन हिंदी या मात्रभाषा की कीमत पर नहीं| किसी भी संस्कृति का पुट उसके साहित्य में होता है और साहित्य बिना भाषा के नहीं पढ़ा जा सकता| सोचिये यदि आज के बालकों को हिंदी का ज्ञान ही नहीं होगा तो वे कैसे रामायण, महाभारत और गीता पढ़ सकेंगे जिसका ज्ञान प्राप्त करने के लिए हजारों अंग्रेज ऋषिकेश, वाराणसी, वृन्दावन में पड़े रहते हैं और बड़ी लगन से हिंदी एवं संस्कृत का ज्ञान प्राप्त करतें हैं |

    क्या आप जानते हैं जापान ने इतनी जल्दी इतनी तरक्की कैसे कर ली ? क्यूंकी जापान के लोगों में अपनी मात्रभाषा से जितना प्यार है उतना ही अपने देश से प्यार है। जापान के बच्चों में बचपन से कूट- कूट कर राष्ट्रीयता की भावना भरी जाती है।

    * जो लोग अपनी मात्रभाषा से प्यार नहीं करते वो अपने देश से प्यार नहीं करते सिर्फ झूठा दिखावा करते हैं। *

    दुनिया भर के वैज्ञानिकों का मानना है की दुनिया में कम्प्युटर के लिए सबसे अच्छी भाषा ‘संस्कृत’ है। सबसे ज्यादा संस्कृत पर शोध इस समय जर्मनी और अमेरिका चल रही है। नासा ने ‘मिशन संस्कृत’ शुरू किया है और अमेरिका में बच्चों के पाठ्यक्रम में संस्कृत को शामिल किया गया है। सोचिए अगर अँग्रेजी अच्छी भाषा होती तो ये अँग्रेजी को क्यूँ छोड़ते और हम अंग्रेज़ियत की गुलामी में घुसे हुए है। कोई भी बड़े से बड़ा तीस मार खाँ अँग्रेजी बोलते समय सबसे पहले उसको अपनी मात्रभाषा में सोचता है और फिर उसको दिमाग में Translate करता है फिर दोगुनी मेहनत करके अँग्रेजी बोलता है। हर व्यक्ति अपने जीवन के अत्यंत निजी क्षणों में मात्रभाषा ही बोलता है। जैसे: जब कोई बहुत गुस्सा होता है तो गाली हमेशा मात्रभाषा में ही देता हैं।
    किसी भी व्यक्ति कि अपनी पहचान ३ बातो से होती है, उसकी भाषा, उसका भोजन और उसका भेष (पहनावा). अगर ये तीन बात नहीं हों अपनी संस्कृति की तो सोचिये अपना परिचय भी कैसे देंगे किसी को ?
    ॥ मात्रभाषा पर गर्व करो…..अँग्रेजी की गुलामी छोड़ो ॥

    !!! भारत माता की जय !!

संस्कृति-भारतीय काल गणना की वैज्ञानिक पद्धति

भारतीय काल गणना की वैज्ञानिक पद्धति

यह अति सूक्ष्म से लेकत अति विशाल है .यह एक सेकण्ड के ३००० वे भाग त्रुटी से शुरू होता है तो युग जो कई लाख वर्ष का होता है

ब्रिटिश केलेंडर रोमन कलेण्डर कल्पना पर आधारित था। उसमें कभी मात्र 10 महीने हुआ करते थे। जिनमें कुल 304 दिन थे। बाद में उन्होने जनवरी व फरवरी माह जोडकर 12 माह का वर्ष किया। इसमें भी उन्होने वर्ष के दिनो को ठीक करने के लिये फरवरी को 28 और 4 साल बाद 29 दिन की। कुल मिलाकर ईसवी सन् पद्धति अपना कोई वैज्ञानिक प्रभाव है।भारतीय पंचाग में यूं तो 9 प्रकार के वर्ष बताये गये जिसमें विक्रम संवत् सावन पद्धति पर आधारित है। उन्होने बताया कि भारतीय काल गणना में समय की सबसे छोटी इकाई से लेकर ब्रम्हांड की सबसे बडी ईकाई तक की गणना की जाती है। जो कि ब्रहाण्ड में व्याप्त लय और गति की वैज्ञानिकता को सटीक तरीके से प्रस्तुत करती है।आज कि वैज्ञानिक पद्धति कार्बन आधार पर पृथ्वी की आयु 2 अरब वर्ष के लगभग बताती है। और यहीं गणना भारतीय पंचाग करता है। जो कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर पूरी तरह से प्रमाणिकता के साथ खडा हुआ है। हमारी पृथ्वी पर जो ऋतु क्रम घटित होता है। वह भारतीय नववर्ष की संवत पद्धति से प्रारम्भ होता है। हमारे मौसम और विविध प्राकृतिक घटनाओं पर ग्रह नक्षत्रो का प्रभाव पडता है। जिसका गहन अध्ययन भारतीय काल गणना पद्धति मे हुआ है

भारतीय ज्योतिष ग्रहनक्षत्रों की गणना की वह पद्धति है जिसका भारत में विकास हुआ है। आजकल भी भारत में इसी पद्धति से पंचांग बनते हैं, जिनके आधार पर देश भर में धार्मिक कृत्य तथा पर्व मनाए जाते हैं। वर्तमान काल में अधिकांश पंचांग सूर्यसिद्धांत, मकरंद सारणियों तथा ग्रहलाघव की विधि से प्रस्तुत किए जाते हैं।

विषुवद् वृत्त में एक समगति से चलनेवाले मध्यम सूर्य (लंकोदयासन्न) के एक उदय से दूसरे उदय तक एक मध्यम सावन दिन होता है। यह वर्तमान कालिक अंग्रेजी के ‘सिविल डे’ (civil day) जैसा है। एक सावन दिन में 60 घटी; 1 घटी 24 मिनिट साठ पल; 1 पल 24 सेंकेड 60 विपल तथा 2 1/2 विपल 1 सेंकेंड होते हैं। सूर्य के किसी स्थिर बिंदु (नक्षत्र) के सापेक्ष पृथ्वी की परिक्रमा के काल को सौर वर्ष कहते हैं। यह स्थिर बिंदु मेषादि है। ईसा के पाँचवे शतक के आसन्न तक यह बिंदु कांतिवृत्त तथा विषुवत्‌ के संपात में था। अब यह उस स्थान से लगभग 23 पश्चिम हट गया है, जिसे अयनांश कहते हैं। अयनगति विभिन्न ग्रंथों में एक सी नहीं है। यह लगभग प्रति वर्ष 1 कला मानी गई है। वर्तमान सूक्ष्म अयनगति 50.2 विकला है। सिद्धांतग्रथों का वर्षमान 365 दिo 15 घo 31 पo 31 विo 24 प्रति विo है। यह वास्तव मान से 8।34।37 पलादि अधिक है। इतने समय में सूर्य की गति 8.27 होती है। इस प्रकार हमारे वर्षमान के कारण ही अयनगति की अधिक कल्पना है। वर्षों की गणना के लिये सौर वर्ष का प्रयोग किया जाता है। मासगणना के लिये चांद्र मासों का। सूर्य और चंद्रमा जब राश्यादि में समान होते हैं तब वह अमांतकाल तथा जब 6 राशि के अंतर पर होते हैं तब वह पूर्णिमांतकाल कहलाता है। एक अमांत से दूसरे अमांत तक एक चांद्र मास होता है, किंतु शर्त यह है कि उस समय में सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में अवश्य आ जाय। जिस चांद्र मास में सूर्य की संक्रांति नहीं पड़ती वह अधिमास कहलाता है। ऐसे वर्ष में 12 के स्थान पर 13 मास हो जाते हैं। इसी प्रकार यदि किसी चांद्र मास में दो संक्रांतियाँ पड़ जायँ तो एक मास का क्षय हो जाएगा। इस प्रकार मापों के चांद्र रहने पर भी यह प्रणाली सौर प्रणाली से संबद्ध है। चांद्र दिन की इकाई को तिथि कहते हैं। यह सूर्य और चंद्र के अंतर के 12वें भाग के बराबर होती है। हमारे धार्मिक दिन तिथियों से संबद्ध है1 चंद्रमा जिस नक्षत्र में रहता है उसे चांद्र नक्षत्र कहते हैं। अति प्राचीन काल में वार के स्थान पर चांद्र नक्षत्रों का प्रयोग होता था। काल के बड़े मानों को व्यक्त करने के लिये युग प्रणाली अपनाई जाती है। वह इस प्रकार है:

कृतयुग (सत्ययुग) 17,28,000 वर्ष
द्वापर 12,96,000 वर्ष
त्रेता 8, 64,000 वर्ष
कलि 4,32,000 वर्ष
योग महायुग 43,20,000 वर्ष
कल्प 1000 महायुग 4,32,00,00,000 वर्ष

सूर्य सिद्धांत में बताए आँकड़ों के अनुसार कलियुग का आरंभ 17 फरवरी, 3102 ईo पूo को हुआ था। युग से अहर्गण (दिनसमूहों) की गणना प्रणाली, जूलियन डे नंबर के दिनों के समान, भूत और भविष्य की सभी तिथियों की गणना में सहायक हो सकती है।
वायु पुराण में दिए गए विभिन्न काल खंडों के विवरण के अनुसार , दो परमाणु मिलकर एक अणु का निर्माण करते हैं और तीन अणुओं के मिलने से एक त्रसरेणु बनता है। तीन त्रसरेणुओं से एक त्रुटि , 100 त्रुटियों से एक वेध , तीन वेध से एक लव तथा तीन लव से एक निमेष (क्षण) बनता है। इसी प्रकार तीन निमेष से एक काष्ठा , 15 काष्ठा से एक लघु , 15 लघु से एक नाडिका , दो नाडिका से एक मुहूर्त , छह नाडिका से एक प्रहर तथा आठ प्रहर का एक दिन और एक रात बनते हैं। दिन और रात्रि की गणना साठ घड़ी में भी की जाती है। तदनुसार प्रचलित एक घंटे को ढाई घड़ी के बराबर कहा जा सकता है। एक मास में 15-15 दिन के दो पक्ष होते हैं। शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। सूर्य की दिशा की दृष्टि से वर्ष में भी छह-छह माह के दो पक्ष माने गए हैं- उत्तरायण तथा दक्षिणायन। वैदिक काल में वर्ष के 12 महीनों के नाम ऋतुओं के आधार पर रखे गए थे। बाद में उन नामों को नक्षत्रों के आधार पर परिवर्तित कर दिया गया , जो अब तक यथावत हैं। चैत्र , वैशाख , ज्येष्ठ , आषाढ़ श्रावण , भाद्रपद , आश्विन , कार्तिक , मार्गशीर्ष , पौष , माघ और फाल्गुन। इसी प्रकार दिनों के नाम ग्रहों के नाम पर रखे गए- रवि , सोम (चंद्रमा) , मंगल , बुध , गुरु , शुक्र और शनि। इस प्रकार काल खंडों को निश्चित आधार पर निश्चित नाम दिए गए और पल-पल की गणना स्पष्ट की गई।

सृष्टि की कुल आयु 4320000000 वर्ष मानी गई है। इसमें से वर्तमान आयु निकालकर सृष्टि की शेष आयु 2,35,91,46,895 वर्ष है।

इलाज – तुलसी के बीज का महत्त्व

तुलसी के बीज का महत्त्व

जब भी तुलसी में खूब फुल यानी मंजिरी लग जाए तो उन्हें पकने पर तोड़ लेना चाहिए वरना तुलसी के झाड में चीटियाँ और कीड़ें लग जाते है और उसे समाप्त कर देते है . इन पकी हुई मंजिरियों को रख ले . इनमे से काले काले बीज अलग होंगे उसे एकत्र कर ले . यही सब्जा है . तुलसी के पत्ते गर्म तासीर के होते है पर सब्जा शीतल होता है . इसे फालूदा में इस्तेमाल किया जाता है . इसे भिगाने से यह जेली की तरह फुल जाता है . इसे हम दूध या लस्सी के साथ थोड़ी देशी गुलाब की पंखुड़ियां दाल कर ले तो गर्मी में बहुत ठंडक देता है .इसके अलावा यह पाचन सम्बन्धी गड़बड़ी को भी दूर करता है .यह पित्त घटाता है.

आसाराम जी बापू ने तुलसी बीज और त्रिकटु (सोंठ ,काली मिर्च और पीपर )मिलाकर स्वादिष्ट गोलियां बनायी है जो सदैव घर में रखने योग्य है . ये कफनाशक , क्षुधावर्धक और पाचक है .

इलाज -क्या कारण है की गर्मी शुरू होते ही सभी प्रकार के बेक्टीरिया और वायरस क्रियाशील हो जाते है

क्या कारण है की गर्मी शुरू होते ही सभी प्रकार के बेक्टीरिया और वायरस क्रियाशील हो जाते है और मलेरिया , टायफोइड ,जोंडिस ,डायरिया , स्वाइन फ्लू जैसी बीमारियाँ फ़ैल जाती है ?

 इसका मुख्य कारण है पित्त का बढना .—

 इसलिए पित्त को सम रखो और इन सब बीमारियों से बचो .

 जीरा , धनिया , सौंफ , हिंग , अजवाइन ,लौकी , कच्चा नारियल , बेल , गाय के दूध से बना छाछ इनका भरपूर इस्तेमाल करो

शक्कर  की जगह मिश्री और नमक की जगह सेंधा या काले नमक का इस्तेमाल करें .

सुबह २ से ४ ग्लास पानी पिए, हो सके तो आंवला और एलो वेरा ज्यूस के साथ ..

पित्त सम होने से पसीने में बदबू नहीं आएगी ;

चाहे कितना ही पसीना क्यों ना आए और इससे होने वाली परेशानियां जैसे दाद , रेश , पिम्पल्स फोड़े , फुंसियां इत्यादि भी नहीं होंगी