संस्कृति – भगवान कहाँ छुपे हैं ????? एक लघुकथा

सुना था की ईश्वर पहले यहीं रहते थे ,इसी धरती पर ! लेकिन लोगों ने जान खा ली थी ,चौबीस घंटे सोने ही ना दें । जब देखो तब लोगों का ताँता लगा है दरवाजे पर खडे हैं ,कतार लगी हुई है इसको यह चाहिये ,उसको वह चाहिये और माँगे एसी कि एक की पूरी करो तो दूसरे दूसरे की माँग बिखर जाये ,दूसरे की माँग पूरी करो तो किसी तीसरे के लिये गडबड हो जाये । कोई कहता है आज बारिश हो जाये क्युँकि मैने बीज बोये हैं,कोई कहता है कि आज कडक धूप निकालना मैंने कपडे रंगे हैं उन्हें सुखाना है।अब परमात्मा क्या करे और… क्या ना करे हजारों लोग हजारों माँगे ।इसीलिये अपने सलाहकरों को बुलाया और कहा कि भैय्या अब मुझे कोई जगह बताओ जहाँ मैं छिप सकूँ ।अब भूल होगयी जो इंसान बना दिया।

यह तो पता है कि इंसान को बनाने के बाद ईश्वर ने कुछ नहीं बनाया ,क्युँ नहीं बनाया ?

बनाने से ही विरक्त हो गया आदमी को बनाकर समझ गया गडबड हो गयी अब रुक जाओ पूर्णविराम लगादो।आदमी जब तक नहीं बनाया तबतक बनाता ही चला गया ।गधे बनाये,घोडे बनाये, तब भी नहीं घबराया, शेर बनाया,बंदर बनाया,भालू बनाया ! नहीं रुका बडाही मस्त था उसी मस्ती में निर्माण होता चला गया उसी धुन में उसी मस्ती में उसी भूल में आदमी बन गया।

और बस आदमी ने ईश्वर की जान साँसत में डाल दी कि सलाहकारों से पूछना पड गया कि कहाँ छिप जाऊँ कोई जगह बताओ?

एक सलाहकार ने कहा आप हिमालय के शिखर पर चले जाओ तो ईश्वर ने कहा कि वहाँ भी कुछ समय बाद तेनसिंग हेलरी को लेकर आने वाला है एक पहुँच जाये फिर क्या औरों को आने में देर लगती है जल्दी ही बसें आ जायेंगी सिनेमा खुल जायेंगे होटल खुल जायेंगे मेरी जान ये लोग वहीं खायेंगे यह तो अस्थायी इलाज है कोई स्थाई इलाज बताओ ।

एक सलाहकार ने कहा कि आप चाँद पर चले जाओ

ईश्वर बोले तुम भी नहीं समझे और दो दिन की देरी इंसान वहाँ भी पहुँच जायेगा ये मुझे वहाँ भी नहीं छोडेंगे

तब एक बूढे सलाहकार ने कहा कि आप एसा करो इंसान के अंदर छिप जाओ और यह बात ईश्वर के जंचगयी और तब से वह इंसान के अंदर छिपा है क्यूँकि उस बूढे इंसान ने कहा था कि इंसान एक जगह कभी नहीं जायेगा अपने भीतर ,बाकी सभी जगह जायेगा

और यह सही भी था हमारी आँखे दूर टकटकी लगाये बठा है आकाश में तारों में मक्का में मदीना में काशी में कैलाश में कि मक्का से आयेगा ईश्वर,काशी से आयेगा गिरनार से आयेगा,शिखर जी से आयेगा ।

आँख खोलो नहीं बंद करो मौन में डूबो! आनंदमग्न ! अपने भीतर ! जितनी गहराई में बैठो वहीं उसे पाओगे । वह वहीं मौजूद है न देर है न अंधेर मात्र तुम ठीक जगह पहुँच जाओ,तुम ठीक हो जाओ । तुम्हारे तार ठीक बैठ जायें तुम सरगम में आ जाओगे, तुम्हारा साज ठीक से बैठ जाये बस धुन बज उठेगी,गीत झर उठेंगे, फूल खिल उठेंगे !

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