संस्कृति – निंदारस – Criticism

इस दोहे में यही कहा गया है कि अपनी निंदा, आलोचना, बुराई करने वालों सदा अपने पास रखना चाहिए। अपनी आलोचना सुनकर उसे सुधारने से हमारा स्वभाव अच्छा होता है और हमारी कमियां दूर होती हैं।

यह दोहा अति प्राचीन है और आज के युग में कोई अपनी बुराई कतई सुनना नहीं चाहता। भला मेरे काम में कमी कैसी? यही सोच है अधिकांश लोगों की। सभी चाहते हैं कि चारों ओर उनकी तारीफ हो, उनके कार्य में कमियां ना निकाले। परंतु जब उम्मीद के विपरित कोई बुराई या कमी निकाल देता है तो वहां उनका अहं जाग जाता है।

लोगो…ं को मजा भी बुराई निकालने में ही आता है। दुसरों की बुराई करने को आज भी भाषा में निंदारस कहा जाने लगा है। बुराई करना जैसे एक फैशन हो गया है। किसी के अच्छे कार्यों को कोई एक बार भले याद ना करें परंतु यदि किसी से कोई चूक या गलती हो गई तो जैसे उसने गुनाह कर दिया।

दरअसल व्यक्ति दूसरों की बुराई करके अपनी कमजोरियों को छुपाना चाहता है। वह यही दिखाना चाहता है कि कमियां सिर्फ मुझ ही में नहीं है। कुछ लोगों की सोच होती है जो कार्य मैं नहीं कर सकता या मुझसे नहीं हुआ तो उसे कोई और कैसे कर सकता है? परंतु जब कोई वह कार्य कर देता है तो उसे अपनी कमजोरी का अहसास होता है और वह उसके कार्य में बुराई या कमी तलाश करने में लग जाता है।इसी तरह की भावनाओं से ग्रसित होकर दूसरों में बुराई ढूंढी जाती है और फिर उसे प्रचारित करने में उन्हें एक अद्भूत आंनद की प्राप्ति होती है।यदि कोई आपकी बुराई करता है या कमियां निकालता है तो कोशिश करनी चाहिए उसे पॉजिटिव रूप में लेने की और अपनी कमजोरी दूर करें। साथ ही दूसरों की बुराई करने से बचें। इससे होता कुछ नहीं है उलटा आपकी इमेज पर नेगेटिव प्रभाव पड़ता है।

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