संस्कृति-Proud to be Indian – Mythology and Science

तांडव नृत्य व क्वांटम सिद्धांत

आज चर्चा भगवान शिव के तांडव नृत्य की….। सृष्टि के विनाश और पुनः निर्माण का द्योतक…। आधुनिक क्वांटम सिद्धांत पर नटराज की तुलना वैज्ञानिक Fritzof Capra की नजर से देखिए…। 1975 में Tao of Physics नामक पुस्तक लिखी इन्होंने…। उनके मुताबिक आधुनिक भौतिकी में पदार्थ निष्क्रिय और जड़ नहीं है। एक-दूसरे का विनाश व रचना करते वह सतत नृत्य में रत है…। दाएं हाथ का डमरू नए परमाणु की उत्पत्ति व बाएं हाथ की मशाल पुराने परमाणुओं के विनाश की कहानी बताता है। अभय मुद्रा में भगवान का दूसरा दांया हाथ हमारी सुरक्षा जबकि वरद मुद्रा में उठा दूसरा बांया हाथ हमारी जरुरतों की पूर्ति सुनिश्चित करता है…। अर्थात शिव जी का ताण्डव नृत्य ब्रह्माण्ड में हो रहे मूल कणों के नृत्य का प्रतीक है…। लिहाजा कोई आश्चर्य नहीं नाभिकीय अनुसंधान यूरोपीय संगठन (CERN) में नटराज की प्रतिमा की स्थापना पर…। 

On 18 June CERN unveiled an unusual new landmark – a statue of the Indian deity Shiva. The statue is a gift from CERN’s Indian collaborators to celebrate CERN’s long association with India, which began in the 1960s. It was unveiled by His Excellency K M Chandrasekhar, ambassador (WTO Geneva), shown above signing the visitors’ book, Anil Kakodkar, chairman of the Atomic Energy Commission and secretary of the Indian Department of Energy, and CERN’s director-general, Robert Aymar.

पृथ्वी का चुंबकीय गुण

यदि कोई चुंबक धागे से लटकाया जाता है तो यह हमेशा उत्तर व दक्षिण दिशा में रुकता है…। माना जाता है कि 1600 में विलियम गिलबर्ट ने बताया कि इसकी वजह पृथ्वी का चुंबकीय गुण है…। लेकिन हमारे पूर्वज इससे परिचित थे…। हमारे गंथ्रों में जो सिद्धांत मिलते हैं उनकी पुस्टि आधुनिक काल में ह्वेल के स्थिरांक से हुई है…।
खगोलीय पिंड का रास्ता
आज चर्चा खगोलीय पिंडों के रास्ते पर, उनकी कक्षा पर…। Copernicus (1473-1543 AD) तक पाश्चात्य विज्ञान मानता था कि ग्रह और अन्य खगोलीय पिंड गोल रास्ते पर घूमते हैं। 1605 AD में Johannes Kepler ने साफ किया कि गोल नहीं, इनका रास्ता दीर्घा वृत्त जैसा है। अब देखिए, अपने धार्मिक आख्यानों में छिपे ज्ञान के भंडार को। ऋग्वेद का एक मंत्र है…। प्रथम मंडल के 164 वें सूक्त का दूसरा मंत्र…। वहां अग्निहोत्र की प्रसंशा में इसे उच्चारित किया गया है…। इसका मतलब है…

“खगोलीय पिंडों की दीर्घवृत्ताकार कक्षा स्थायी और कसावयुक्त है।”
एक बात और, यूनिवर्स का संस्कृत शब्द ब्रह्मांड है। इसका एक अर्थ है विशाल अंडा…। अर्थात खगोलीय पिंडों के पथ जैसा…।

जीवा बनाम साइन्

आज चर्चा गणित के साइन् की। यहां हम विज्ञान लेखक गुणाकर मुले की पुस्तक आर्यभट्ट का संदर्भ देंगे। इसमें उन्होंने संस्कृत शब्दों के अरबी अनुवाद का जिक्र किया है। मुले के मुताबिक, “…अनुवादकों के सामने एक शब्द आया “जीवा”। अनुवादक जानते थे कि ‘जीवा’ खास अर्थ देता है। लिहाजा अनुवाद न कर उन्होंने इस शब्द को ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया। अब चूंकि अरबी साहित्य में स्वर नहीं हैं, इसलिए जीवा शब्द को अरबी में ज-ब लिख दिया गया। अरबी विद्वानों को तो इसकी समझ थी, लेकिन जब अरबी ग्रंथ यूरोप पहुंचे और इनका लैटिन में अनुवाद होने लगा तो ज-ब शब्द यूरोपीय विद्वानों को अबूझ लगा। उन्हें भान न था कि यह संस्कृत शब्द है। उनकी समझ से यह शब्द भी अरबी भाषा का है। यूरोपियों ने स्वर डालकर इसे जेब के इर्द-गिर्द समझा। यानि पाकिट या खीसा, जो कुर्ते में सीने के पास होता है। इस निष्कर्ष पर पहुंचते ही उन्होंने इसका तर्जुमा किया छाती। इसका लैटिन शब्द होता है सिनुस्। संक्षिप्त रुप में इसे साइन् से जाना गया।…”

एक सटीक टिप्पणी के साथ उन्होंने इस संदर्भ को खत्म किया। “दुनिया भर के कालेजों में आज गणित पढ़ने वाले छात्र साइन् से भली-भांति परिचित हैं। पर कितने अध्यापक व छात्र जानते हैं कि गणित का यह साइन शब्द संस्कृत के जीवा शब्द से बना है…????”

प्रत्यास्थता

आज चर्चा पदार्थों के उस गुण की, जिससे बाहरी दवाब पड़ने पर भी वह अपने आकार को दुबारा पा लेते हैं। वैज्ञानिक शब्दावली में इसे प्रत्यास्थता कहा जाता है। यह पदार्थों के ऐसा गुण है, जिससे वाह्य बल लगाने पर उसमें विकृति आती है। लेकिन बल हटते ही वह अपनी मूल स्थिति में आ जाता है। ब्रिटिश भौतिक शास्त्री Robert Hooke ने एक नियम भी दिया। 1676 AD में। इसके अनुसार, किसी प्रत्यास्थ वस्तु की लम्बाई में परिवर्तन, उस पर आरोपित बल के समानुपाती होता है।

अब भारतीय विद्वान श्रीधराचार्य की चर्चा करेंगे। 991 एडी में इन्होंने एक श्लोक लिखा…।

ये घना निबिड़ाः अवयवसन्निवेशाः तैः विशष्टेषु
स्पर्शवत्सु द्रव्येषु वर्तमानः स्थितिस्थापकः स्वाश्रयमन्यथा
कथमवनामितं यथावत् स्थापयति पूर्ववदृजुः करोति।

इसका मतलब देखिए…।

लचीलापन सघन बनावट वाले पदार्थों का मौलिक गुण है। यह वाह्य बल लगाने के बावजूद पदार्थ को वापस उसके मूल आकार में आने में मदद करता है।
 
स्वधा
 
आज नजर एक लेख पर गई। नाम था भारत विद्या का विज्ञान। विवरण ऋग्वेद की ऋचाओं व आधुनिक विज्ञान पर था। तुलना काफी रोचक तुलना लगी, लिहाजा आपसे साझा करने का लोभ छोड़ नहीं सका। ऋचा ऋग्वेद के नासदीय सूक्त की है। आप भी देखिए…।
‘…ऋषि ने कहा- सृष्टि के निर्माण के पूर्व सत और असत दोनों ही नहीं थे, न ही सूर्य, चंद्र और तारे आदि थे। आकाश या अंतरिक्ष भी नहीं था। तो क्या था? ऋषि का जवाब था- तमः आसति। अंधकार था। इस अंधकार में ‘एकमात्र’ वह (ब्रह्म) था। इस ‘एक’ की अपनी शक्ति ‘स्वधा’ थी।
इस ‘स्वधा’ पर विशेष ध्यान नहीं गया है। स्वयं को धारण करने वाली यह शक्ति है, जो एक (ब्रह्म) से अलग नहीं है। स्वधा का परिणाम है जगत की उत्पत्ति, माया, प्रकृति, परमाणु का सृजन हुआ है। वास्तव में वह एकमात्र चैतन्य ही था। स्वधा के परिणामस्वरुप न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत, आइंस्टीन का सापेक्षतावाद और क्वांटम सिद्धांत और वर्तमान में वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग के स्ट्रिंग सिद्धांत का अध्ययन किया जा सकता है। इन सिद्धांतों के लिए मैं स्वधा को मूल रूप में देखता हूं। सिद्धांतों के लिए स्वधा को मूल स्त्रोत मानता हूं। इसी प्रकार मानवों पर प्रभाव डालने की ग्रहों की दृष्टि का स्त्रोत भी यह वैदिक स्वधा ही है…।’

हर कण प्रेमी

आज चर्चा पृथ्वी के प्रेम की…। छोटे-बड़ी सभी वस्तुओं के आपसी लगाव की…। यानि इनके गुरुत्वाकर्षण शक्ति की…। शुरुआत ब्रिटिश खगोलविद Isaac Newton (1642 – 1727AD) से…। इन्होंने बताया कि पृथ्वी ही नहीं, अपितु विश्व का प्रत्येक कण दूसरे कण को अपनी ओर खींचता रहता है। इसका एक भी फार्मूला दिया इन्होंने…। इसके मुताबिक दो कणों के बीच कार्य करने वाला आकर्षण बल उन कणों के द्रव्यमान के गुणनफल का समानुपाती तथा उनके बीच की दूरी के वर्ग का व्युत्क्रमानुपाती होता है। कणों के बीच कार्य करने वाले आकर्षण को गुरुत्वाकर्षण व उससे उत्पन्न बल को गुरुत्वाकर्षण बल कहा जाता है। यही न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण नियम कहते हैं।

लेकिन भारतीय मनीषी भास्कराचार्य द्वितीय को देखिए। न्यूटन से करीब 500 साल पहले इन्होंने अपने ग्रंथ सिद्धांत शिरोमणि में साफ बताया कि पृथ्वी में ही नहीं, गुरुवाकर्षण शक्ति सभी भारी वस्तुओं में होती है….। इनका श्लोक पढि़ए…। इसका लब्बोलुबाब है, ‘पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है। इस शक्ति के सहारे पृथ्वी आकाश की तरफ से भारी वस्तुओं को अपनी तरफ खींचती है। वस्तुएं इसकी तरफ गिरती दिखतीं है। इसी तरह की शक्ति उस वस्तु में भी होती है, जो पृथ्वी पर गिरती है…।’ यही नहीं, इनसे पहले संत कणाद ने बताया था कि यह पृथ्वी की शक्ति है, जो सब प्रकार के अणुओं को अपनी ओर खींचती है…।

सूर्य व धरती का संबंध

 
आज बात करते हैं सूर्य और धरती व अन्य ग्रहों के संबंध की। सबसे पहले हमारी जुबान पर नाम आता है पोलैंड के खगोल शास्त्री कोपरनिकस का। 1543 ईसवी में प्रकाशित उसकी पुस्तक ‘De reveloutionibus Orbium Coelestium’ का। माना गया कि सबसे पहले कोपरनिकस ने बताया कि सूर्य केंद्र में है, जबकि पृथ्वी समेत अन्य ग्रह इसके चारों ओर चक्कर लगाते हैं।

लेकिन हम यहां वैदिक और उत्तर वैदिक काल के तीन श्लोक का जिक्र करेंगे। इनमें कोपरनिकस जैसी स्पष्टता तो नहीं, फिर भी उस जैसी आवाज सुनी जा सकती है….।

नैवास्तमनमर्कस्य नोयदः सर्वदा सतः।
उदयास्तमनाख्यं हि दर्शनादर्शनं रवेः।।

सूर्य का न तो उदय है और न ही अस्त। यह हमेशा अपने स्थान पर बना रहता है। दोनों शब्द (उदय व अस्त) महज उनकी उपस्थिति और अनुपस्थिति का अर्थ देते हैं।

दाधर्थ पृथिवीमभितो मयूखैः।
(सूर्य) अपनी किरणों द्वारा चारों तरफ से पृथ्वी को पकड़े रहता है।

मित्रो दाधार पृथिवीमुतद्याम्। मित्रः कृष्टीः।
सूर्य पृथ्वी और आकाशीय क्षेत्र को बांधे रहता है। सूर्य में आकर्षण शक्ति है।

महर्षि रमण व कार्ल गुस्ताव जुंग

आज बात स्विस मनोचिकित्सक कार्ल गुस्ताव जुंग की। इन्होंने पॉल ब्रान्टन की पुस्तक ‘इन सर्च ऑफ सीक्रेट इंडिया’ पढ़ी। इसमें इन्हें भारतीय संत महर्षि रमण व उनकी आध्यात्म विद्या की अनुसंधान विधि का पता चला। जिज्ञासु जुंग की इनसे मिलने की इच्छा हुई। संयोगवश 1938 में उन्हें ब्रिटिश सरकार ने भारत बुलाया। इस प्रस्ताव को वह अस्वीकार न कर सके और सर्द मौसम में भारत आ गए। दिल्ली पहुंचकर उन्होंने सरकारी काम निपटाया, फिर निकल पड़े तिरुवन्नमलाई के अरूणाचलम पर्वत पर की तरफ। महर्षि रमण का यहीं निवास था। आश्रम में यह अंग्रजी के जानकार एक संत अन्नामलाई स्वामी से मिले। तय हुआ कि महर्षि रमण का दर्शन शाम में होगा।

कार्ल गुस्ताव जुंग (1875-1961)ः स्विस मनोचिकित्सक, प्रभावशाली विचारक व विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान के संस्थापकों में से एक। जुंग को पहला ऐसा मनोविज्ञानी माना जाता है जिनके अनुसार मानव मन स्वभाव से धार्मिक है। इसका गहराई तक परीक्षण भी किया जा सकता है। फ्रायड की तरह इनका मानना था कि चेतन व्यवहार के पीछे अदृश्य अचेतन का हाथ रहता है। लेकिन कामवासना और उसके दमन के इर्द-गिर्द सिमटे फ्रायड से उनका मतभेद रहा। क्योंकि जुंग मानते थे कि जीवन के अचेतन की चेतना के पार भी कुछ आध्यात्मिक आयाम होते हैं।

शाम को अरूणाचलम की तलहटी में खुले स्थान पर महर्षि से जुंग की मुलाकात हुई। पहली मुलाकात में ही जुंग को इस योगी से अपनत्व महसूस हुआ। हालांकि उनके मन में यह शंका थी कि क्या महर्षि उनके वैज्ञानिक मन की जिज्ञासाओं का समाधान कर पाएंगे। जुंग सोच ही रहे थे कि मुस्कराते हुए महर्षि रमण ने कहा, प्रचीन भारतीय ऋषियों की आध्यात्म विद्या पूरी तरह वैज्ञानिक है। आपकी शब्दावली में इसे वैज्ञानिक आध्यात्म कहना सही रहेगा। देखा जाए तो इसके पांच मूल तत्व हैं, 1. जिज्ञासा, विज्ञान इसे शोध समस्या कहता है, 2. प्रकृति एवं स्थिति के अनुरुप साधना का चयन अर्थात अनुसंधान, 3. शरीर की विकारहीन प्रयोगशाला में किए जाने वाले त्रुटिहीन प्रयोग। विज्ञान इसे नियंत्रित स्थिति में की जाने वाली वह क्रिया, प्रयोग मानता है, जिसका सतत सर्वेक्षण जरुरी होता है, 4. किए जा रहे प्रयोग का निश्चित क्रम से परीक्षण एवं सतत आकलन, 5. इन सबके परिणाम में सम्यक निष्कर्ष। सहज भाव से महर्षि ने अपनी बात पूरी की।

महर्षि फिर आसन छोड़कर टहलने लगे।

टहलते-टहलते उन्होंने बताया, मेरे आध्यात्मिक प्रयोग की वैज्ञानिक जिज्ञासा थी कि मैं कौन हूं? इसके समाधान के लिए मैंने मनन एवं ध्यान की अनुसंधान विधि का चयन किया। इसी अरुणाचलम पर्वत की विरूपाक्षी गुफा में शरीर व मन की प्रयोगशाला में मेरे प्रयोग चलते रहे। इन प्रयोगों के परिणाम रहा कि अपरिष्कृत अचेतन लगातार परिष्कृत होता गया। चेतना की नई-नई परतें खुलती गईं। अंत में मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मेरा अहं आत्मा में विलीन हो गया। बाद में आत्मा परमात्मा से एकाकार हो गई। अहं का आत्मा में स्थानान्तरण मनुष्य को भगवान में रुपान्तरित कर दिया। बात सुनते-सुनते जुंग ने अपना चश्मा उतारा और रूमाल से उसे साफ कर फिर लगा लिया। उनके चेहरे पर पूर्ण प्रसन्नता व गहरी संतुष्टि के भाव थे। कुछ ऐसा कि उनकी दृष्टि का धुंधलका साफ सा हो गया हो। अब सब-कुछ स्पष्ट था। वैज्ञानिक आध्यात्म का मूल तत्व उनकी समझ में आ गया था।

भारत से लौटने के बाद येले विश्वविद्यालय में जुंग व्याख्यान दिया। इसका विषय था मनोविज्ञान और धर्म। इसमें उनके नवीन दृष्टिकोण का परिचय मिलता है। बाद के वर्षों में उन्होंने श्री रमण एंड हिज मैसेज टू माडर्न मैन की प्रस्तावना में लिखा कि श्री रमण भारत भूमि के सच्चे पुत्र हैं। वह आध्यात्म की वैज्ञानिक अभिव्यक्ति के प्रकाश स्तंभ हैं और साथ ही कुछ अद्भुत भी। उनके जीवन एवं शिक्षा में हमें उस पवित्रतम भारत के दर्शन होते हैं, जो समूची मानवता को वैज्ञानिक आध्यात्म के मूलमंत्र का संदेश दे रहा है।

आदि शक्ति व सुप्रीम एनर्जी

सप्तशती में वर्णित है कि सृष्टि का निर्माण आदिशक्ति से हुआ है। एक कथा भी है इसकी…। एक बार देव-असुर संग्राम हुआ…। युद्ध में देवता पराजित हुए…। इसके बाद उन्होंने आदिशक्ति (आदि=मूल, शक्ति=ऊर्जा) की पूजा की…। इससे प्रसन्न होकर मां देवी ने अपने अंदर से बहुत सारी शक्तियां उत्पन्न की और दानवों को परास्त किया…। दानवराज बोला, आपके पास इतनी शक्ति है। कोई आश्चर्य नहीं, कि आप सर्व शक्तिशाली हैं…। मां आदिशक्ति ने उसे जवाब दिया, यह सब मेरी शक्तियां हैं…। इसके बाद सारी शक्तियों को खुद में विलीन कर मां वहां से चली गईं।
पुस्तक में यह वर्णन कहानी के फार्म में है। यहां इसका वैज्ञानिक निहितार्थ नहीं बताया गया है। आइए इसे वैज्ञानिक सिद्धांत पर परखते हैं। आदि शक्ति यानि असीम ऊर्जा का स्रोत। इसी से महाविस्फोट हुआ। 12-14 अरब वर्ष पहले। ब्रह्मांड बना, लगातार विस्तार होता हुआ। आज तक। देश-काल भी तभी अस्तित्व में आया।
एक बात और। पुराणों में शक्ति की व्याख्या नहीं है। अवर्णनीय भर कहा गया इन्हें…। लेकिन आज अगर हम व्याख्या करना चाहें, तो इसके सबसे उपयुक्त हाइजेनवर्ग होंगे। जैसा कि पहले भी हमने बताया है कि शुरुआत में विज्ञान पदार्थ और ऊर्जा को भिन्न मानता था। लेकिन आंइस्टीन व हाइजेनबर्ग ने इसे झुठलाया। आइंस्टीन ने पदार्थ को ऊर्जा में रूपांतरित किया तो हाइजेनबर्ग ने बताया कि परमाणु के नाभिक के चारों ओर चक्कर लगाने वाले इलेक्ट्रान की स्थिति शुद्धता से नहीं जांची जा सकती। इनकी अनुभूति दृष्टा या आब्जर्वर व उसके द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया पर निर्भर करती है…।
अब बताइए, सुप्रीम एनर्जी को अवर्णनीय कहने का पौराणिक कथन वैज्ञानिक था या नहीं??

इंद्रधनुष

अठारहवीं सदी में खोजे गए स्पेक्टम के वैज्ञानिक तथ्य का वर्णन वेदों में काव्यात्मक तरीके से किया गया है कि सूर्य के एकचक्रीय रथ को सात रंगों के घोड़े चलाते हैं। यही नहीं, सर्य की किरणों के हानिकारक प्रभाव पर भी चर्चा की गई है। ऋग्वेद में इन्हें पुरुसाद कहा गया है। जिसका अर्थ ऐसी किरणों से है जो व्यक्ति को खा जाती हैं और इनसे सारा संसार भयभीत रहता है।

प्रकाश की चाल और हम
भौतिक विज्ञान 19 वीं सदी में प्रकाश की चाल की गणना करता है। अमेरिकी भौतिकविदों (Michelson and Morley) ने बताया कि यह 30,00,00,000 मीटर/ सेकेंड (1,86,000 मील/ सेकेंड या 3,00,000 किमी/ सेकेंड) होती है। जहां तक हिंदू धर्म शास्त्रों का सवाल है, तो 14 वीं शदी के दक्षिण भारतीय टीकाकार सायण या सयानाचार्य ने इस पर टिप्पणी की है। आप ताज्जुब करेंगे कि ऋग्वेद के आधार पर की गई गणना आधुनिक परिकल्पना के काफी नजदीक है।

जीवाणु और बीमारी

1969 में पाश्चात्य विद्वान जेजी हॉलवेल, एमआरएस ने कॉलेज ऑफ फिजिशियन, लंदन की एक सभा में लिखित रिपोर्ट दाखिल की थी कि भारत के चिकित्सकों के अनुसार असंख्य अदृश्य जीवाणुओं के कारण बीमारियां फैलती हैं।

वैमानिकी और हम

उत्तर वैदिक काल के मनीषी महर्षि भरद्वाज को उद्धृत कर रहा हूं। अपने ग्रंथ में इन्होंने विमान में प्रयुक्त होने वाली धातुओं के निर्माण की विधि का वर्णन किया है…। साथ ही एक अन्य प्रसंग का भी वर्णन करुंगा….। राइट बंधुओं से तो आप सब वाकिफ होंगे…। हमें बचपन से पढ़ाया जाता है कि इन्होंने स्वनिर्मित विमान से पहली हवाई यात्रा की…। 1905 ईसवी में 120 फिट उचांई तक सैर भी किया…। आविष्कारक बताया जाता है इन्हें विमान का…। लेकिन हममें से कितनों का पता है शिवकर बापूजी तलपड़े के बारे में..। मुंबई के मशहूर संस्कृत विद्वान थे तलपड़े…। 1864 में इनका जन्म हुआ था…। राइट बंधुओं से आठ साल पहले, 1895 में इन्होंने एक विमान बनाया…। वैदिक तकनीक पर…। मरुताक्षी नाम दिया इसका…। मुंबई के चैपाटी समुद्र तट पर मानव रहित विमान उड़ाया भी…। 1500 फीट की उंचाई तक…। महशूर जज व राष्टवादी महादेव गोविंद रानाडे, बड़ोदरा के महाराज शिवाजी राव गायकवाड़ के साथ भारी दर्शकों के बीच….। लेकिन दुर्भाग्य से वह वहीं क्रैश हो गया….।

क्या कहेंगे आप विमान के प्रथम भारतीय आविष्कारक पर…????

यज्ञ का विज्ञान

03 दिसंबर 1984 की भोपाल गैस त्रासदी पर एक किताब पढ़ते समय अग्रेंजी समाचार पत्र “द हिंदू” की एक स्टोरी पर नजर पड़ी…। आपको भी सुनाता हूं…।

….जहरीली गैस मिथाइल आइसोसाइनेट का रिसाव होने के थोड़ी देर बाद अध्यापक एसएल कुशवाहा ने अपने घर में अग्निहोत्र यज्ञ करना शुरु कर दिया। इसके करीब बीस मिनट बाद गैस का असर उसके घर पर खत्म हो गया और उनकी जिंदगी बच गई….।

शल्य चिकित्सा और हम
भारतीय शल्य चिकित्सा का एक विवरण मद्रास गजेट (1793) में आया है…। इसके मुताबिक अग्रेजों की सहायता करने के नाराज टीपू सुल्तान ने 1793 में मराठा केवशजी सहित चार सैनिकों की नाक काट दी। ब्रिटिश कमांडिग अधिकारी इन्हें एक वैद्य के पास ले गया। वैद्य ने सर्जरी कर इनकी नाक ठीक की। 1794 में यह स्टोरी लंदन की जेंटलमेन मैगजीन में भी प्रकाशित हुई। इससे प्रेरित होकर ब्रिटिश सर्जन J.C. Carpue ने दो भारतीयों की सर्जरी की। बाद में यही काम जर्मन सर्जन Greafe ने भी किया।
कहने का मतलब यह कि भारतीय शल्य चिकित्सा पद्धति मराठा प्रदेश से यूरोप पहुंची। फिर 200 साल बाद प्लास्टिक सर्जरी के रूप में इसका यूरोप से आयात किया गया। जबकि हमारे यहां यह बहुत पहले से ही विकसित थी। ईसा पूर्व में ही। सुश्रुत संहिता में नाक, ओठ व कान की सर्जरी का विस्तार से वर्णन है।
मिट्टी और मकान
मकान बनाने के लिए मिट्टी की क्वालिटी जाननी जरूरी होती है। 5 वीं सदी ईसा पूर्व के कई संस्कृत ग्रंथों में इसका विस्तार से वर्णन है। आपको हैरत हो सकती है कि एक तकनीक का आज भी धड़ल्ले से प्रयोग होता है। इसके मुताबिक पहले जमीन में गहरा गड्ढा खोदा जाता है। फिर इससे निकली मिट्टी से दुबारा गड्ढ़ा भरा जाता है। अगर गड्ढा भरने के बाद भी मिट्टी बची रहती है तो पता चलता है कि संबंधित जमीन मजबूत है और यहां मकान बनाना उपयुक्त रहेगा।
पौराणिक आख्यान और फोटान सिद्धांत

आइए पौराणिक आख्यानों और फोटान सिद्धांत की तुलना की जाए। भगवान सूर्य, इनका सात रंग के सात घोड़ों का रथ, लगाम के तौर पर सांप…। इसकी जानकारी तो आपको होगी ही…। बात सर्प की करते हैं…। देखा जाए तो बनावट में इसका पिछला हिस्सा पतला और मुख चैड़ा होता है…। इसके फण पर मणि होती है और चाल तरंग जैसी होती है…। वहीं आधुनिक विज्ञान प्रकाश को फोटान नामक कणों का प्रवाह मानता है…। इसका न द्रव्यमान होता है न भार…। सारे मौलिक कणों की तरह इनमें भी तरंग व कण दोनों की प्रवृत्ति होती है…। इसका पिछला सिरा पतला और आगे धीरे-धारे चैड़ा होता जाता है। संस्कृत ग्रंथो में प्रकाश किरणों को प्रिथु मुखः कहा गया है…। इस तरह कहा जा सकता है कि बेशक हमारे पूर्वजों ने फोटान शब्द का उल्लेख नहीं किया…। इसका श्रेय आइंस्टीन को जाता है। लेकिन इसकी संभावना पूरी है कि वह इसके गुणों से परिचित थे…।
अर्जुन की छाल

28 जून 2003 को Wolfson Institute के Dr. N.J.Wald व Dr. M.R.Law की ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में थिसिस प्रकाशित हुई थी…। इसमें पाॅलीपिल (Palypill) नामक एक टेबलेट हार्ट अटैक के लिए उपयुक्त बताई गई। हालांकि अभी यह दवा अभी भी निर्मित होने के चरण में है, लेकिन इस क्षेत्र के जानकारों ने इसका स्वागत किया है। आपको हैरत होगी कि इस दवा की बहुत सारी खूबियां अर्जुन की छाल में मौजूद हैं।
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