संस्कृति -1941 में डूबे ब्रिटिश जहाज से चांदी का खजाना मिला, कोलकाता से ब्रिटेन जा रहा था

1941 में डूबे ब्रिटिश जहाज से चांदी का खजाना मिला, कोलकाता से ब्रिटेन जा रहा था
लंदन, एजेंसी : अमेरिका की एक अन्वेषण कंपनी ने डूबे हुए एक ब्रिटिश जहाज से भारी मात्रा में चांदी का खजाना बरामद किया है, जिसकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत 15 करोड़ पाउंड (करीब 1155 करोड़ रुपये) हो सकती है। यह जहाज कोलकाता से लंदन की यात्रा पर रवाना हुआ था लेकिन अटलांटिक में 1941 में एक जर्मन यू बोट ने इसे डुबो दिया था।

परिवहन विभाग के अनुसार अन्वेषण कंपनी ओडिसी मैरिन इस माल का 80 फीसदी हिस्सा रखेगी। परिवहन विभाग ने कंपनी को डूबे विशालकाय जहाज के मलबे की खोज की जिम्मेदारी सौंपी थी। एसएस गैरसोप्पा नामक यह जहाज दिसंबर 1940 में कोलकाता से रवाना हुआ था और इस पर 240 टन चांदी, लोहा और चाय लदी थी। यह पोत ब्रिटिश स्टीम नेवीगेशन कंपनी से ताल्लुक रखता था।

यह जहाज लिवरपूल जाने वाला था लेकिन मजबूरन इसे अपने सैन्य काफिले से अलग होकर अपना रास्ता बदलना पड़ा था। चूंकि आयरलैंड के पास मौसम बहुत खराब हो गया था और इस जहाज में ईंधन भी बहुत कम बचा था। जब यह जहाज एक छोटा रास्ता अपनाकर आयरिश हार्बर के दक्षिण-पश्चिम में पहुंचा तो 17 फरवरी 1941 को जर्मन पनडुब्बी यू101 ने इस पर हमला कर दिया। एक ही तारपीडो में यह जहाज डूब गया।

इस हमले में जहाज में मौजूद 85 चालक दल मारे गए। जहाज में बस एक ही व्यक्ति जीवित बचा था। इस विशालकाय 412 फीट ऊंचे जहाज का मलबा हाल ही में आयरिश तट से 300 मील दूर उत्तरी अटलांटिक महासागर के 4700 मीटर गहरे तल में मिला। लेकिन यह वही जहाज है इस बात की पुष्टि एसएस गैयरसोप्पा ने पिछले हफ्ते ही की है।

इस अभियान दल के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार इस जहाज के मलबे को बाहर निकालने का काम 2012 के शुरुआती तीन महीनों में ही शुरू हो पाएगा। इस पूरे काम को अंजाम देने और खजाना बाहर निकालने में एक-दो साल तक लग सकते हैं।

“Ek jahaj me Rs. 1155 crore ka maal. Lord clive ne to 700 jahaj gold – silver le kar gaya tha. Isse pata chalta hai ki angrejo ne bharat ko kitna loota hai. aur hamare PM kahte hai ki angrejo ne to hume jine sikhaya. To 15 Aug ko shok divas Q nahi manate? hamare desh me aise kaale angrej bahut hai.”
Ajay Yadav IIT Kharagpur student

इलाज -Blow shell to get rid from diseases

यदि पाना हें रोगों से छुटकारा तो शंख बजाइए और रोग भगाइए ; Blow shell to get rid from diseases

(जानिए क्या हें शंख ,इसके प्रभाव और परिणाम)

भारतीय संस्कृति में शंख को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। माना जाता है कि समुद्र मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों में से एक शंख भी था। अथर्ववेदके अनुसार, शंख से राक्षसों का नाश होता है-शंखेन हत्वारक्षांसि।भागवत पुराण में भी शंख का उल्लेख हुआ है। शंख में ओम ध्वनि प्रतिध्वनितहोती है, इसलिए ओम से ही वेद बने और वेद से ज्ञान का प्रसार हुआ। पुराणों और शास्त्रों में शंख ध्वनि को कल्याणकारी कहा गया है। इसकी ध्वनि विजय का मार्ग प्रशस्त करती है।

शंख का महत्व धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, वैज्ञानिक रूप से भी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके प्रभाव से सूर्य की हानिकारक किरणें बाधक होती हैं। इसलिए सुबह और शाम शंखध्वनिकरने का विधान सार्थक है। जाने-माने वैज्ञानिक डॉ. जगदीश चंद्र बसु के अनुसार, इसकी ध्वनि जहां तक जाती है, वहां तक व्याप्त बीमारियों के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। इससे पर्यावरण शुद्ध हो जाता है। शंख में गंधक, फास्फोरस और कैल्शियम जैसे उपयोगी पदार्थ मौजूद होते हैं। इससे इसमें मौजूद जल सुवासित और रोगाणु रहित हो जाता है। इसीलिए शास्त्रों में इसे महाऔषधिमाना जाता है।

पूजा, यज्ञ एवं अन्य विशिष्ट अवसरों पर शंखनाद हमारी परंपरा में था। क्योंकि शंख से निकलने वाली ध्वनितरंगों में हानिकारक वायरस को नष्ट करने की क्षमता होती है।
1928 में बर्लिन विश्वविद्यालय के विज्ञानियों ने शंख ध्वनि पर अनुसंधान कर इस बात को प्रमाणित किया था। दरअसल, शंखनाद करने के पीछे मूलभावना यही थी कि इससे शरीर निरोगी हो जाता है। घर में शंख रखना और उसे बजाना वास्तु दोष को भी खत्म कर देता है। यह भारतीय संस्कृति की अनुपम धरोहर है।

मंदिरों में नियमित रूप से और बहुत से घरों में पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठान, व्रत, कथाएं, जन्मोत्सव के अवसरों पर शंख बजाना शुभ माना जाता है। ज्योतिषाचार्यो के अनुसार शंख बजाने से आसुरी शक्तियां घर के भीतर प्रवेश नहीं कर पाती।
समुद्र मंथन में मिले रत्नों में 6वां —-
समुद्र मंथन के समय मिले 14 रत्नों में छठवां रत्न शंख था। शंखनाद से निकली ध्वनि में अ-उ-म् (ओम्) अथवा ‘ओम्’ शब्द उद्धोषित होता है जहां तक ‘ओम्’ का नाद पहुंचता है वहां तक नकारात्मक ऊर्जा नष्ट हो जाती है।

देवतुल्य है शंख —–
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार शंख चंद्रमा और सूर्य के समान ही देवस्वरूप है। इसके मध्य में वरुण, पृष्ठ भाग में ब्रह्मा और अग्र भाग में गंगा व सरस्वती का निवास है। शंख से शिवलिंग, कृष्ण या लक्ष्मी विग्रह पर जल या पंचामृत अभिषेक करने पर देवता प्रसन्न होते हैं। पांचजन्य व विष्णु शंख को दुकान, कार्यालय, फैक्टरी में स्थापित करने से व्यवसाय में लाभ होता है।

शंख की उत्पत्ति —-
हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार शंख की उत्पत्ति सृष्टी आत्मा से, आत्मा आकाश से, आकाश वायु से, वायु अग्रि से, आग जल से और जल पृथ्वी से उत्पन्न हुआ है और इन सभी तत्वों से मिलकर शंख की उत्पत्ति मानी गई है। वैसे शंख समुद्र में पाए जाने वाले एक प्रकार के घोंघे का खोल है, जिसे वह अपनी सुरक्षा के लिए बनाता है।
पाप नाशक —
शंख को सनातन धर्म का प्रतीक माना जाता है। यह निधि का प्रतीक है। इसे घर के पूजास्थल में रखने से अरिष्टों एवं अनिष्टों का नाश होता है और सौभाग्य की वृद्धि होती है। स्वर्गलोक में अष्टसिद्धियों एवं नवनिधियों में शंख का महत्वपूर्ण स्थान है। माना जाता है कि शंख का स्पर्श पाकर जल गंगाजल के समान पवित्र हो जाता है। शंख में जल भरकर ओम् नमोनारायण का उच्चारण करते हुए भगवान को स्नान कराने से पापों का नाश होता है। शंख नाद का प्रतीक है। नाद जगत में आदि से अंत तक व्याप्त है। सृष्टि का आरंभ भी नाद से होता है और विलय भी उसी में होता है।
स्वास्थ्य लाभ—–—-शंख बजाना स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत लाभदायक है। इससे पूरक, कुम्भक और रेचक जैसी प्राणायाम क्रियाएं एक साथ हो जाती हैं।
—–सांस लेने से पूरक, सांस रोकने से कुम्भक और सांस छोड़ने की क्रिया से रेचक सम्पन्न हो जाती हैं।
—-हृदय रोग, रक्तदाब, सांस सम्बन्धी रोग, मन्दाग्नि आदि में मात्र शंख बजाने से पर्याप्त लाभ मिलता है।
—-यदि कोई बोलने में असमर्थ है या उसे हकलेपन का दोष है तो शंख बजाने से ये दोष दूर होते हैं। इससे फेफड़ों के रोग भी दूर होते हैं :- जैसे दमा, कास प्लीहा यकृत और इन्फ्लूएन्जा रोगों में शंख ध्वनि फायदेमंद है।

——अगर आपको खांसी, दमा, पीलिया, ब्लडप्रेशर या दिल से संबंधित मामूली से लेकर गंभीर बीमारी है तो इससे छुटकारा पाने का एक सरल-सा उपाय है – शंख बजाइए और रोगों से छुटकारा पाइए।

——शंखनाद से आपके आसपास की नकारात्मक ऊर्जा का नाश तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। शंख से निकलने वाली ध्वनि जहां तक जाती है वहां तक बीमारियों के कीटाणुओं का नाश हो जाता है।
———–शंखनाद से सकारात्मक ऊर्जा का सर्जन होता है जिससे आत्मबल में वृद्धि होती है। शंख में प्राकृतिक कैल्शियम, गंधक और फास्फोरस की भरपूर मात्रा होती है। प्रतिदिन शंख फूंकने वाले को गले और फेफड़ों के रोग नहीं होते। शंख से मुख के तमाम रोगों का नाश होता है। शंख बजाने से चेहरे, श्वसन तंत्र, श्रवण तंत्र तथा फेफड़ों का व्यायाम होता है। शंख वादन से स्मरण शक्ति बढ़ती है।

शंख के प्रकार —

ये कई प्रकार के होते हैं और सबकी विशेषता एवं पूजन पद्धति भिन्न-भिन्न है। उच्च श्रेणी के श्रेष्ठ शंख कैलाश मानसरोवर, मालद्वीप, लक्षद्वीप, कोरामंडल द्वीप समूह, श्रीलंका और भारत में पाए जाते हैं।
दक्षिणावृत्ति शंख (दाहिने हाथ से पकड़ा जाता है), मध्यावृत्ति शंख (इसका मुंह बीच में खुलता है), वामावृत्ति शंख (यह बाएं हाथ से पकड़ा जाता है)। इनके अलावा लक्ष्मी शंख, गणोश शंख, गोमुखी शंख, कामधेनु शंख, विष्णु शंख, देवदत्त शंख, चक्र शंख, पौंड्र शंख, वीणा शंख, सुघोष शंख, गरुड़ शंख, मणिपुष्पक शंख, राक्षस शंख, शनि शंख, राहु शंख, केतु शंख, शेषनाग शंख, कच्छप शंख आदि होते हैं। इनकी दुर्लभता एवं चमत्कारिक गुणों के कारण ये अधिक मूल्यवान होते हैं।

विजय घोष का प्रतीक —-

शंख को विजय घोष का प्रतीक माना जाता है। कार्य के आरम्भ करने के समय शंख बजाना शुभता का प्रतीक है। इसकी नाद को सुनने वाले को सहज ही ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव हो जाता है।

वैज्ञानिक पहलू—
शंख ध्वनि से सूर्य की किरणों बाधित होती हैं। अत: प्रात: व सायंकाल में ही शंख ध्वनि करने का विधान है। शंखोदक भस्म से पेट की बीमारियां, पीलिया, कास प्लीहा यकृत, पथरी आदि रोग ठीक हो जाते हैं।
ऋषि श्रृंग के अनुसार बच्चों के शरीर पर छोटे-छोटे शंख बांधने व शंख जल पिलाने से वाणी-दोष दूर हाते हैं। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि मूक व श्वास रोगी हमेशा शंख बजाए तो बोलने की शक्ति पा सकते हैं।
आयुर्वेदाचार्य डा.विनोद वर्मा के अनुसार हकलाने वाले यदि नित्य शंख-जल पीएं तो वे ठीक हो जाएंगे।शंख जल स्वास्थ्य, हड्डियों, दांतों के लिए लाभदायक है। इसमें गंधक, फास्फोरस व कैल्शियम होते हैं।
संगीत सम्राट तानसेन ने भी अपने आरंभिक दौर में शंख बजाकर ही गायन शक्तिप्राप्त की थी। अथर्ववेद के अनुसार, शंख में राक्षसों का नाश करने की भी शक्ति होती है।
क्या रहस्य है शंख बजाने का?

—–मंदिर में आरती के समय शंख बजते सभी ने सुना होगा परंतु शंख क्यों बजाते हैं? इसके पीछे क्या कारण है यह बहुत कम ही लोग जानते हैं। शंख बजाने के पीछे धार्मिक कारण तो है साथ ही इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी है और शंख बजाने वाले व्यक्ति को स्वास्थ्य लाभ भी मिलता है।
—–शंख की उत्पत्ति कैसे हुई ? इस संबंध में हिन्दू धर्म ग्रंथ कहते हैं सृष्टी आत्मा से, आत्मा आकाश से, आकाश वायु से, वायु अग्रि से, आग जल से और जल पृथ्वी से उत्पन्न हुआ है और इन सभी तत्व से मिलकर शंख की उत्पत्ति मानी जाती है।
—-शंख की पवित्रता और महत्व को देखते हुए हमारे यहां सुबह और शाम शंख बजाने की प्रथा शुरू की गई है। शंख बजाने का स्वास्थ्य लाभ यह है कि यदि कोई बोलने में असमर्थ है या उसे हकलेपन का दोष है तो शंख बजाने से ये दोष दूर होते हैं। शंख बजाने से कई तरह के फेफड़ों के रोग दूर होते हैं जैसे दमा, कास प्लीहा यकृत और इन्फ्लून्जा आदि रोगों में शंख ध्वनि फायदा पहुंचाती है।
——शंख के जल से शालीग्राम को स्नान कराएं और फिर उस जल को यदि गर्भवती स्त्री को पिलाया जाए तो पैदा होने वाला शिशु पूरी तरह स्वस्थ होता है। साथ ही बच्चा कभी मूक या हकला नहीं होता।
——यदि शंखों में भी विशेष शंख जिसे दक्षिणावर्ती शंख कहते हैं इस शंख में दूध भरकर शालीग्राम का अभिषेक करें। फिर इस दूध को निरूसंतान महिला को पिलाएं। इससे उसे शीघ्र ही संतान का सुख मिलता है।
—–गोरक्षासंहिता, विश्वामित्र संहिता, पुलस्त्यसंहिता आदि ग्रंथों में दक्षिणावर्तीशंख को आयुर्वद्धकऔर समृद्धि दायक कहा गया है। ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार, शंख चंद्रमा और सूर्य के समान ही देवस्वरूपहै। इसके मध्य में वरुण, पृष्ठ भाग में ब्रह्मा और अग्र भाग में गंगा और सरस्वती का निवास है।
—–शंख बजाने से दमा, अस्थमा, क्षय जैसे जटिल रोगों का प्रभाव काफी हद तक कम हो सकता है। इसका वैज्ञानिक कारण यह है कि शंख बजाने से सांस की अच्छी एक्सरसाइज हो जाती है। ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार, शंख में जल भरकर रखने और उस जल से पूजन सामग्री धोने और घर में छिडकने से वातावरण शुद्ध रहता है।

—–तानसेनने अपने आरंभिक दौर में शंख बजाकर ही गायन शक्ति प्राप्त की थी।
——अथर्ववेदके चतुर्थ अध्याय में शंखमणिसूक्त में शंख की महत्ता वर्णित है।

भागवत पुराण के अनुसार, संदीपन ऋषि आश्रम में श्रीकृष्ण ने शिक्षा पूर्ण होने पर उनसे गुरु दक्षिणा लेने का आग्रह किया। तब ऋषि ने उनसे कहा कि समुद्र में डूबे मेरे पुत्र को ले आओ। कृष्ण ने समुद्र तट पर शंखासुरको मार गिराया। उसका खोल (शंख) शेष रह गया।

——-माना जाता है कि उसी से शंख की उत्पत्ति हुई। पांचजन्य शंख वही था। शंख से शिवलिंग,कृष्ण या लक्ष्मी विग्रह पर जल या पंचामृत अभिषेक करने पर देवता प्रसन्न होते हैं। शंख की ध्वनि से भक्तों को पूजा-अर्चना के समय की सूचना मिलती है। आरती के समापन के बाद इसकी ध्वनि से मन को शांति मिलती है।

——कल्याणकारी शंख दैनिक जीवन में दिनचर्या को कुछ समय के लिए विराम देकर मौन रूप से देव अर्चना के लिए प्रेरित करता है। यह भारतीय संस्कृति की धरोहर है।

——शंख की पूजा इस मंत्र के साथ की जाती है——

“”त्वं पुरा सागरोत्पन्न:विष्णुनाविघृत:करे देवैश्चपूजित: सर्वथैपाञ्चजन्यनमोऽस्तुते।””

संस्कृति-Proud to be Indian – Mythology and Science

तांडव नृत्य व क्वांटम सिद्धांत

आज चर्चा भगवान शिव के तांडव नृत्य की….। सृष्टि के विनाश और पुनः निर्माण का द्योतक…। आधुनिक क्वांटम सिद्धांत पर नटराज की तुलना वैज्ञानिक Fritzof Capra की नजर से देखिए…। 1975 में Tao of Physics नामक पुस्तक लिखी इन्होंने…। उनके मुताबिक आधुनिक भौतिकी में पदार्थ निष्क्रिय और जड़ नहीं है। एक-दूसरे का विनाश व रचना करते वह सतत नृत्य में रत है…। दाएं हाथ का डमरू नए परमाणु की उत्पत्ति व बाएं हाथ की मशाल पुराने परमाणुओं के विनाश की कहानी बताता है। अभय मुद्रा में भगवान का दूसरा दांया हाथ हमारी सुरक्षा जबकि वरद मुद्रा में उठा दूसरा बांया हाथ हमारी जरुरतों की पूर्ति सुनिश्चित करता है…। अर्थात शिव जी का ताण्डव नृत्य ब्रह्माण्ड में हो रहे मूल कणों के नृत्य का प्रतीक है…। लिहाजा कोई आश्चर्य नहीं नाभिकीय अनुसंधान यूरोपीय संगठन (CERN) में नटराज की प्रतिमा की स्थापना पर…। 

On 18 June CERN unveiled an unusual new landmark – a statue of the Indian deity Shiva. The statue is a gift from CERN’s Indian collaborators to celebrate CERN’s long association with India, which began in the 1960s. It was unveiled by His Excellency K M Chandrasekhar, ambassador (WTO Geneva), shown above signing the visitors’ book, Anil Kakodkar, chairman of the Atomic Energy Commission and secretary of the Indian Department of Energy, and CERN’s director-general, Robert Aymar.

पृथ्वी का चुंबकीय गुण

यदि कोई चुंबक धागे से लटकाया जाता है तो यह हमेशा उत्तर व दक्षिण दिशा में रुकता है…। माना जाता है कि 1600 में विलियम गिलबर्ट ने बताया कि इसकी वजह पृथ्वी का चुंबकीय गुण है…। लेकिन हमारे पूर्वज इससे परिचित थे…। हमारे गंथ्रों में जो सिद्धांत मिलते हैं उनकी पुस्टि आधुनिक काल में ह्वेल के स्थिरांक से हुई है…।
खगोलीय पिंड का रास्ता
आज चर्चा खगोलीय पिंडों के रास्ते पर, उनकी कक्षा पर…। Copernicus (1473-1543 AD) तक पाश्चात्य विज्ञान मानता था कि ग्रह और अन्य खगोलीय पिंड गोल रास्ते पर घूमते हैं। 1605 AD में Johannes Kepler ने साफ किया कि गोल नहीं, इनका रास्ता दीर्घा वृत्त जैसा है। अब देखिए, अपने धार्मिक आख्यानों में छिपे ज्ञान के भंडार को। ऋग्वेद का एक मंत्र है…। प्रथम मंडल के 164 वें सूक्त का दूसरा मंत्र…। वहां अग्निहोत्र की प्रसंशा में इसे उच्चारित किया गया है…। इसका मतलब है…

“खगोलीय पिंडों की दीर्घवृत्ताकार कक्षा स्थायी और कसावयुक्त है।”
एक बात और, यूनिवर्स का संस्कृत शब्द ब्रह्मांड है। इसका एक अर्थ है विशाल अंडा…। अर्थात खगोलीय पिंडों के पथ जैसा…।

जीवा बनाम साइन्

आज चर्चा गणित के साइन् की। यहां हम विज्ञान लेखक गुणाकर मुले की पुस्तक आर्यभट्ट का संदर्भ देंगे। इसमें उन्होंने संस्कृत शब्दों के अरबी अनुवाद का जिक्र किया है। मुले के मुताबिक, “…अनुवादकों के सामने एक शब्द आया “जीवा”। अनुवादक जानते थे कि ‘जीवा’ खास अर्थ देता है। लिहाजा अनुवाद न कर उन्होंने इस शब्द को ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया। अब चूंकि अरबी साहित्य में स्वर नहीं हैं, इसलिए जीवा शब्द को अरबी में ज-ब लिख दिया गया। अरबी विद्वानों को तो इसकी समझ थी, लेकिन जब अरबी ग्रंथ यूरोप पहुंचे और इनका लैटिन में अनुवाद होने लगा तो ज-ब शब्द यूरोपीय विद्वानों को अबूझ लगा। उन्हें भान न था कि यह संस्कृत शब्द है। उनकी समझ से यह शब्द भी अरबी भाषा का है। यूरोपियों ने स्वर डालकर इसे जेब के इर्द-गिर्द समझा। यानि पाकिट या खीसा, जो कुर्ते में सीने के पास होता है। इस निष्कर्ष पर पहुंचते ही उन्होंने इसका तर्जुमा किया छाती। इसका लैटिन शब्द होता है सिनुस्। संक्षिप्त रुप में इसे साइन् से जाना गया।…”

एक सटीक टिप्पणी के साथ उन्होंने इस संदर्भ को खत्म किया। “दुनिया भर के कालेजों में आज गणित पढ़ने वाले छात्र साइन् से भली-भांति परिचित हैं। पर कितने अध्यापक व छात्र जानते हैं कि गणित का यह साइन शब्द संस्कृत के जीवा शब्द से बना है…????”

प्रत्यास्थता

आज चर्चा पदार्थों के उस गुण की, जिससे बाहरी दवाब पड़ने पर भी वह अपने आकार को दुबारा पा लेते हैं। वैज्ञानिक शब्दावली में इसे प्रत्यास्थता कहा जाता है। यह पदार्थों के ऐसा गुण है, जिससे वाह्य बल लगाने पर उसमें विकृति आती है। लेकिन बल हटते ही वह अपनी मूल स्थिति में आ जाता है। ब्रिटिश भौतिक शास्त्री Robert Hooke ने एक नियम भी दिया। 1676 AD में। इसके अनुसार, किसी प्रत्यास्थ वस्तु की लम्बाई में परिवर्तन, उस पर आरोपित बल के समानुपाती होता है।

अब भारतीय विद्वान श्रीधराचार्य की चर्चा करेंगे। 991 एडी में इन्होंने एक श्लोक लिखा…।

ये घना निबिड़ाः अवयवसन्निवेशाः तैः विशष्टेषु
स्पर्शवत्सु द्रव्येषु वर्तमानः स्थितिस्थापकः स्वाश्रयमन्यथा
कथमवनामितं यथावत् स्थापयति पूर्ववदृजुः करोति।

इसका मतलब देखिए…।

लचीलापन सघन बनावट वाले पदार्थों का मौलिक गुण है। यह वाह्य बल लगाने के बावजूद पदार्थ को वापस उसके मूल आकार में आने में मदद करता है।
 
स्वधा
 
आज नजर एक लेख पर गई। नाम था भारत विद्या का विज्ञान। विवरण ऋग्वेद की ऋचाओं व आधुनिक विज्ञान पर था। तुलना काफी रोचक तुलना लगी, लिहाजा आपसे साझा करने का लोभ छोड़ नहीं सका। ऋचा ऋग्वेद के नासदीय सूक्त की है। आप भी देखिए…।
‘…ऋषि ने कहा- सृष्टि के निर्माण के पूर्व सत और असत दोनों ही नहीं थे, न ही सूर्य, चंद्र और तारे आदि थे। आकाश या अंतरिक्ष भी नहीं था। तो क्या था? ऋषि का जवाब था- तमः आसति। अंधकार था। इस अंधकार में ‘एकमात्र’ वह (ब्रह्म) था। इस ‘एक’ की अपनी शक्ति ‘स्वधा’ थी।
इस ‘स्वधा’ पर विशेष ध्यान नहीं गया है। स्वयं को धारण करने वाली यह शक्ति है, जो एक (ब्रह्म) से अलग नहीं है। स्वधा का परिणाम है जगत की उत्पत्ति, माया, प्रकृति, परमाणु का सृजन हुआ है। वास्तव में वह एकमात्र चैतन्य ही था। स्वधा के परिणामस्वरुप न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत, आइंस्टीन का सापेक्षतावाद और क्वांटम सिद्धांत और वर्तमान में वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग के स्ट्रिंग सिद्धांत का अध्ययन किया जा सकता है। इन सिद्धांतों के लिए मैं स्वधा को मूल रूप में देखता हूं। सिद्धांतों के लिए स्वधा को मूल स्त्रोत मानता हूं। इसी प्रकार मानवों पर प्रभाव डालने की ग्रहों की दृष्टि का स्त्रोत भी यह वैदिक स्वधा ही है…।’

हर कण प्रेमी

आज चर्चा पृथ्वी के प्रेम की…। छोटे-बड़ी सभी वस्तुओं के आपसी लगाव की…। यानि इनके गुरुत्वाकर्षण शक्ति की…। शुरुआत ब्रिटिश खगोलविद Isaac Newton (1642 – 1727AD) से…। इन्होंने बताया कि पृथ्वी ही नहीं, अपितु विश्व का प्रत्येक कण दूसरे कण को अपनी ओर खींचता रहता है। इसका एक भी फार्मूला दिया इन्होंने…। इसके मुताबिक दो कणों के बीच कार्य करने वाला आकर्षण बल उन कणों के द्रव्यमान के गुणनफल का समानुपाती तथा उनके बीच की दूरी के वर्ग का व्युत्क्रमानुपाती होता है। कणों के बीच कार्य करने वाले आकर्षण को गुरुत्वाकर्षण व उससे उत्पन्न बल को गुरुत्वाकर्षण बल कहा जाता है। यही न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण नियम कहते हैं।

लेकिन भारतीय मनीषी भास्कराचार्य द्वितीय को देखिए। न्यूटन से करीब 500 साल पहले इन्होंने अपने ग्रंथ सिद्धांत शिरोमणि में साफ बताया कि पृथ्वी में ही नहीं, गुरुवाकर्षण शक्ति सभी भारी वस्तुओं में होती है….। इनका श्लोक पढि़ए…। इसका लब्बोलुबाब है, ‘पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है। इस शक्ति के सहारे पृथ्वी आकाश की तरफ से भारी वस्तुओं को अपनी तरफ खींचती है। वस्तुएं इसकी तरफ गिरती दिखतीं है। इसी तरह की शक्ति उस वस्तु में भी होती है, जो पृथ्वी पर गिरती है…।’ यही नहीं, इनसे पहले संत कणाद ने बताया था कि यह पृथ्वी की शक्ति है, जो सब प्रकार के अणुओं को अपनी ओर खींचती है…।

सूर्य व धरती का संबंध

 
आज बात करते हैं सूर्य और धरती व अन्य ग्रहों के संबंध की। सबसे पहले हमारी जुबान पर नाम आता है पोलैंड के खगोल शास्त्री कोपरनिकस का। 1543 ईसवी में प्रकाशित उसकी पुस्तक ‘De reveloutionibus Orbium Coelestium’ का। माना गया कि सबसे पहले कोपरनिकस ने बताया कि सूर्य केंद्र में है, जबकि पृथ्वी समेत अन्य ग्रह इसके चारों ओर चक्कर लगाते हैं।

लेकिन हम यहां वैदिक और उत्तर वैदिक काल के तीन श्लोक का जिक्र करेंगे। इनमें कोपरनिकस जैसी स्पष्टता तो नहीं, फिर भी उस जैसी आवाज सुनी जा सकती है….।

नैवास्तमनमर्कस्य नोयदः सर्वदा सतः।
उदयास्तमनाख्यं हि दर्शनादर्शनं रवेः।।

सूर्य का न तो उदय है और न ही अस्त। यह हमेशा अपने स्थान पर बना रहता है। दोनों शब्द (उदय व अस्त) महज उनकी उपस्थिति और अनुपस्थिति का अर्थ देते हैं।

दाधर्थ पृथिवीमभितो मयूखैः।
(सूर्य) अपनी किरणों द्वारा चारों तरफ से पृथ्वी को पकड़े रहता है।

मित्रो दाधार पृथिवीमुतद्याम्। मित्रः कृष्टीः।
सूर्य पृथ्वी और आकाशीय क्षेत्र को बांधे रहता है। सूर्य में आकर्षण शक्ति है।

महर्षि रमण व कार्ल गुस्ताव जुंग

आज बात स्विस मनोचिकित्सक कार्ल गुस्ताव जुंग की। इन्होंने पॉल ब्रान्टन की पुस्तक ‘इन सर्च ऑफ सीक्रेट इंडिया’ पढ़ी। इसमें इन्हें भारतीय संत महर्षि रमण व उनकी आध्यात्म विद्या की अनुसंधान विधि का पता चला। जिज्ञासु जुंग की इनसे मिलने की इच्छा हुई। संयोगवश 1938 में उन्हें ब्रिटिश सरकार ने भारत बुलाया। इस प्रस्ताव को वह अस्वीकार न कर सके और सर्द मौसम में भारत आ गए। दिल्ली पहुंचकर उन्होंने सरकारी काम निपटाया, फिर निकल पड़े तिरुवन्नमलाई के अरूणाचलम पर्वत पर की तरफ। महर्षि रमण का यहीं निवास था। आश्रम में यह अंग्रजी के जानकार एक संत अन्नामलाई स्वामी से मिले। तय हुआ कि महर्षि रमण का दर्शन शाम में होगा।

कार्ल गुस्ताव जुंग (1875-1961)ः स्विस मनोचिकित्सक, प्रभावशाली विचारक व विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान के संस्थापकों में से एक। जुंग को पहला ऐसा मनोविज्ञानी माना जाता है जिनके अनुसार मानव मन स्वभाव से धार्मिक है। इसका गहराई तक परीक्षण भी किया जा सकता है। फ्रायड की तरह इनका मानना था कि चेतन व्यवहार के पीछे अदृश्य अचेतन का हाथ रहता है। लेकिन कामवासना और उसके दमन के इर्द-गिर्द सिमटे फ्रायड से उनका मतभेद रहा। क्योंकि जुंग मानते थे कि जीवन के अचेतन की चेतना के पार भी कुछ आध्यात्मिक आयाम होते हैं।

शाम को अरूणाचलम की तलहटी में खुले स्थान पर महर्षि से जुंग की मुलाकात हुई। पहली मुलाकात में ही जुंग को इस योगी से अपनत्व महसूस हुआ। हालांकि उनके मन में यह शंका थी कि क्या महर्षि उनके वैज्ञानिक मन की जिज्ञासाओं का समाधान कर पाएंगे। जुंग सोच ही रहे थे कि मुस्कराते हुए महर्षि रमण ने कहा, प्रचीन भारतीय ऋषियों की आध्यात्म विद्या पूरी तरह वैज्ञानिक है। आपकी शब्दावली में इसे वैज्ञानिक आध्यात्म कहना सही रहेगा। देखा जाए तो इसके पांच मूल तत्व हैं, 1. जिज्ञासा, विज्ञान इसे शोध समस्या कहता है, 2. प्रकृति एवं स्थिति के अनुरुप साधना का चयन अर्थात अनुसंधान, 3. शरीर की विकारहीन प्रयोगशाला में किए जाने वाले त्रुटिहीन प्रयोग। विज्ञान इसे नियंत्रित स्थिति में की जाने वाली वह क्रिया, प्रयोग मानता है, जिसका सतत सर्वेक्षण जरुरी होता है, 4. किए जा रहे प्रयोग का निश्चित क्रम से परीक्षण एवं सतत आकलन, 5. इन सबके परिणाम में सम्यक निष्कर्ष। सहज भाव से महर्षि ने अपनी बात पूरी की।

महर्षि फिर आसन छोड़कर टहलने लगे।

टहलते-टहलते उन्होंने बताया, मेरे आध्यात्मिक प्रयोग की वैज्ञानिक जिज्ञासा थी कि मैं कौन हूं? इसके समाधान के लिए मैंने मनन एवं ध्यान की अनुसंधान विधि का चयन किया। इसी अरुणाचलम पर्वत की विरूपाक्षी गुफा में शरीर व मन की प्रयोगशाला में मेरे प्रयोग चलते रहे। इन प्रयोगों के परिणाम रहा कि अपरिष्कृत अचेतन लगातार परिष्कृत होता गया। चेतना की नई-नई परतें खुलती गईं। अंत में मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मेरा अहं आत्मा में विलीन हो गया। बाद में आत्मा परमात्मा से एकाकार हो गई। अहं का आत्मा में स्थानान्तरण मनुष्य को भगवान में रुपान्तरित कर दिया। बात सुनते-सुनते जुंग ने अपना चश्मा उतारा और रूमाल से उसे साफ कर फिर लगा लिया। उनके चेहरे पर पूर्ण प्रसन्नता व गहरी संतुष्टि के भाव थे। कुछ ऐसा कि उनकी दृष्टि का धुंधलका साफ सा हो गया हो। अब सब-कुछ स्पष्ट था। वैज्ञानिक आध्यात्म का मूल तत्व उनकी समझ में आ गया था।

भारत से लौटने के बाद येले विश्वविद्यालय में जुंग व्याख्यान दिया। इसका विषय था मनोविज्ञान और धर्म। इसमें उनके नवीन दृष्टिकोण का परिचय मिलता है। बाद के वर्षों में उन्होंने श्री रमण एंड हिज मैसेज टू माडर्न मैन की प्रस्तावना में लिखा कि श्री रमण भारत भूमि के सच्चे पुत्र हैं। वह आध्यात्म की वैज्ञानिक अभिव्यक्ति के प्रकाश स्तंभ हैं और साथ ही कुछ अद्भुत भी। उनके जीवन एवं शिक्षा में हमें उस पवित्रतम भारत के दर्शन होते हैं, जो समूची मानवता को वैज्ञानिक आध्यात्म के मूलमंत्र का संदेश दे रहा है।

आदि शक्ति व सुप्रीम एनर्जी

सप्तशती में वर्णित है कि सृष्टि का निर्माण आदिशक्ति से हुआ है। एक कथा भी है इसकी…। एक बार देव-असुर संग्राम हुआ…। युद्ध में देवता पराजित हुए…। इसके बाद उन्होंने आदिशक्ति (आदि=मूल, शक्ति=ऊर्जा) की पूजा की…। इससे प्रसन्न होकर मां देवी ने अपने अंदर से बहुत सारी शक्तियां उत्पन्न की और दानवों को परास्त किया…। दानवराज बोला, आपके पास इतनी शक्ति है। कोई आश्चर्य नहीं, कि आप सर्व शक्तिशाली हैं…। मां आदिशक्ति ने उसे जवाब दिया, यह सब मेरी शक्तियां हैं…। इसके बाद सारी शक्तियों को खुद में विलीन कर मां वहां से चली गईं।
पुस्तक में यह वर्णन कहानी के फार्म में है। यहां इसका वैज्ञानिक निहितार्थ नहीं बताया गया है। आइए इसे वैज्ञानिक सिद्धांत पर परखते हैं। आदि शक्ति यानि असीम ऊर्जा का स्रोत। इसी से महाविस्फोट हुआ। 12-14 अरब वर्ष पहले। ब्रह्मांड बना, लगातार विस्तार होता हुआ। आज तक। देश-काल भी तभी अस्तित्व में आया।
एक बात और। पुराणों में शक्ति की व्याख्या नहीं है। अवर्णनीय भर कहा गया इन्हें…। लेकिन आज अगर हम व्याख्या करना चाहें, तो इसके सबसे उपयुक्त हाइजेनवर्ग होंगे। जैसा कि पहले भी हमने बताया है कि शुरुआत में विज्ञान पदार्थ और ऊर्जा को भिन्न मानता था। लेकिन आंइस्टीन व हाइजेनबर्ग ने इसे झुठलाया। आइंस्टीन ने पदार्थ को ऊर्जा में रूपांतरित किया तो हाइजेनबर्ग ने बताया कि परमाणु के नाभिक के चारों ओर चक्कर लगाने वाले इलेक्ट्रान की स्थिति शुद्धता से नहीं जांची जा सकती। इनकी अनुभूति दृष्टा या आब्जर्वर व उसके द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया पर निर्भर करती है…।
अब बताइए, सुप्रीम एनर्जी को अवर्णनीय कहने का पौराणिक कथन वैज्ञानिक था या नहीं??

इंद्रधनुष

अठारहवीं सदी में खोजे गए स्पेक्टम के वैज्ञानिक तथ्य का वर्णन वेदों में काव्यात्मक तरीके से किया गया है कि सूर्य के एकचक्रीय रथ को सात रंगों के घोड़े चलाते हैं। यही नहीं, सर्य की किरणों के हानिकारक प्रभाव पर भी चर्चा की गई है। ऋग्वेद में इन्हें पुरुसाद कहा गया है। जिसका अर्थ ऐसी किरणों से है जो व्यक्ति को खा जाती हैं और इनसे सारा संसार भयभीत रहता है।

प्रकाश की चाल और हम
भौतिक विज्ञान 19 वीं सदी में प्रकाश की चाल की गणना करता है। अमेरिकी भौतिकविदों (Michelson and Morley) ने बताया कि यह 30,00,00,000 मीटर/ सेकेंड (1,86,000 मील/ सेकेंड या 3,00,000 किमी/ सेकेंड) होती है। जहां तक हिंदू धर्म शास्त्रों का सवाल है, तो 14 वीं शदी के दक्षिण भारतीय टीकाकार सायण या सयानाचार्य ने इस पर टिप्पणी की है। आप ताज्जुब करेंगे कि ऋग्वेद के आधार पर की गई गणना आधुनिक परिकल्पना के काफी नजदीक है।

जीवाणु और बीमारी

1969 में पाश्चात्य विद्वान जेजी हॉलवेल, एमआरएस ने कॉलेज ऑफ फिजिशियन, लंदन की एक सभा में लिखित रिपोर्ट दाखिल की थी कि भारत के चिकित्सकों के अनुसार असंख्य अदृश्य जीवाणुओं के कारण बीमारियां फैलती हैं।

वैमानिकी और हम

उत्तर वैदिक काल के मनीषी महर्षि भरद्वाज को उद्धृत कर रहा हूं। अपने ग्रंथ में इन्होंने विमान में प्रयुक्त होने वाली धातुओं के निर्माण की विधि का वर्णन किया है…। साथ ही एक अन्य प्रसंग का भी वर्णन करुंगा….। राइट बंधुओं से तो आप सब वाकिफ होंगे…। हमें बचपन से पढ़ाया जाता है कि इन्होंने स्वनिर्मित विमान से पहली हवाई यात्रा की…। 1905 ईसवी में 120 फिट उचांई तक सैर भी किया…। आविष्कारक बताया जाता है इन्हें विमान का…। लेकिन हममें से कितनों का पता है शिवकर बापूजी तलपड़े के बारे में..। मुंबई के मशहूर संस्कृत विद्वान थे तलपड़े…। 1864 में इनका जन्म हुआ था…। राइट बंधुओं से आठ साल पहले, 1895 में इन्होंने एक विमान बनाया…। वैदिक तकनीक पर…। मरुताक्षी नाम दिया इसका…। मुंबई के चैपाटी समुद्र तट पर मानव रहित विमान उड़ाया भी…। 1500 फीट की उंचाई तक…। महशूर जज व राष्टवादी महादेव गोविंद रानाडे, बड़ोदरा के महाराज शिवाजी राव गायकवाड़ के साथ भारी दर्शकों के बीच….। लेकिन दुर्भाग्य से वह वहीं क्रैश हो गया….।

क्या कहेंगे आप विमान के प्रथम भारतीय आविष्कारक पर…????

यज्ञ का विज्ञान

03 दिसंबर 1984 की भोपाल गैस त्रासदी पर एक किताब पढ़ते समय अग्रेंजी समाचार पत्र “द हिंदू” की एक स्टोरी पर नजर पड़ी…। आपको भी सुनाता हूं…।

….जहरीली गैस मिथाइल आइसोसाइनेट का रिसाव होने के थोड़ी देर बाद अध्यापक एसएल कुशवाहा ने अपने घर में अग्निहोत्र यज्ञ करना शुरु कर दिया। इसके करीब बीस मिनट बाद गैस का असर उसके घर पर खत्म हो गया और उनकी जिंदगी बच गई….।

शल्य चिकित्सा और हम
भारतीय शल्य चिकित्सा का एक विवरण मद्रास गजेट (1793) में आया है…। इसके मुताबिक अग्रेजों की सहायता करने के नाराज टीपू सुल्तान ने 1793 में मराठा केवशजी सहित चार सैनिकों की नाक काट दी। ब्रिटिश कमांडिग अधिकारी इन्हें एक वैद्य के पास ले गया। वैद्य ने सर्जरी कर इनकी नाक ठीक की। 1794 में यह स्टोरी लंदन की जेंटलमेन मैगजीन में भी प्रकाशित हुई। इससे प्रेरित होकर ब्रिटिश सर्जन J.C. Carpue ने दो भारतीयों की सर्जरी की। बाद में यही काम जर्मन सर्जन Greafe ने भी किया।
कहने का मतलब यह कि भारतीय शल्य चिकित्सा पद्धति मराठा प्रदेश से यूरोप पहुंची। फिर 200 साल बाद प्लास्टिक सर्जरी के रूप में इसका यूरोप से आयात किया गया। जबकि हमारे यहां यह बहुत पहले से ही विकसित थी। ईसा पूर्व में ही। सुश्रुत संहिता में नाक, ओठ व कान की सर्जरी का विस्तार से वर्णन है।
मिट्टी और मकान
मकान बनाने के लिए मिट्टी की क्वालिटी जाननी जरूरी होती है। 5 वीं सदी ईसा पूर्व के कई संस्कृत ग्रंथों में इसका विस्तार से वर्णन है। आपको हैरत हो सकती है कि एक तकनीक का आज भी धड़ल्ले से प्रयोग होता है। इसके मुताबिक पहले जमीन में गहरा गड्ढा खोदा जाता है। फिर इससे निकली मिट्टी से दुबारा गड्ढ़ा भरा जाता है। अगर गड्ढा भरने के बाद भी मिट्टी बची रहती है तो पता चलता है कि संबंधित जमीन मजबूत है और यहां मकान बनाना उपयुक्त रहेगा।
पौराणिक आख्यान और फोटान सिद्धांत

आइए पौराणिक आख्यानों और फोटान सिद्धांत की तुलना की जाए। भगवान सूर्य, इनका सात रंग के सात घोड़ों का रथ, लगाम के तौर पर सांप…। इसकी जानकारी तो आपको होगी ही…। बात सर्प की करते हैं…। देखा जाए तो बनावट में इसका पिछला हिस्सा पतला और मुख चैड़ा होता है…। इसके फण पर मणि होती है और चाल तरंग जैसी होती है…। वहीं आधुनिक विज्ञान प्रकाश को फोटान नामक कणों का प्रवाह मानता है…। इसका न द्रव्यमान होता है न भार…। सारे मौलिक कणों की तरह इनमें भी तरंग व कण दोनों की प्रवृत्ति होती है…। इसका पिछला सिरा पतला और आगे धीरे-धारे चैड़ा होता जाता है। संस्कृत ग्रंथो में प्रकाश किरणों को प्रिथु मुखः कहा गया है…। इस तरह कहा जा सकता है कि बेशक हमारे पूर्वजों ने फोटान शब्द का उल्लेख नहीं किया…। इसका श्रेय आइंस्टीन को जाता है। लेकिन इसकी संभावना पूरी है कि वह इसके गुणों से परिचित थे…।
अर्जुन की छाल

28 जून 2003 को Wolfson Institute के Dr. N.J.Wald व Dr. M.R.Law की ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में थिसिस प्रकाशित हुई थी…। इसमें पाॅलीपिल (Palypill) नामक एक टेबलेट हार्ट अटैक के लिए उपयुक्त बताई गई। हालांकि अभी यह दवा अभी भी निर्मित होने के चरण में है, लेकिन इस क्षेत्र के जानकारों ने इसका स्वागत किया है। आपको हैरत होगी कि इस दवा की बहुत सारी खूबियां अर्जुन की छाल में मौजूद हैं।

संस्कृति-Different Expressions-Hindu Mythology, Leadership.

A young girl and her father were on a pilgrimage. When they reached the temple of Shiva, her father said, “Lets collect bilva leaves and dhatura flowers and offer them to Shiva to show our devotion.” This is what the father and daughter did. Then, they reached a Vishnu temple, and her father said, “Lets collect tulsi leaves and offer it to Vishnu to show our devotion.” This is what the father and daughter did. Then they reached a Ganesha temple. On the father’s advice, the daughter offered blades of grass. At the temple of the Kali, the daughter was told to offer neem leaves and lemons. At the temple of Hanuman, she offered sesame oil.

The daughter was confused, “You say all gods are actually one.” “Yes,” the father confirmed. “Then why different offerings to different gods?” “Because,” said the father, “Each form is different and different forms need to be told the same thing in different ways. Each time we have expressed our devotion but the vehicle of communication has changed depending on the preferences of the recipient. That is why: the wild bilva and poisonous dhatura for the hermit Shiva, the fragrant tulsi for the romantic Vishnu, the rapidly regenerating grass for Ganesha who was resurrected with an elephant head, the sour lemon and bitter neem for Kali who consumes all things, negativity included, and sesame for Hanuman, the mighty wrestler, feared even by death.”

Often we want to communicate an idea to our customers. But we do not pay adequate attention to the method of communication. The method chosen should be the function of the customer. Different customers need different methods. But most corporations find the idea of customizing methods of communication rather inefficient. So they try to come up with an efficient standard method of communication, often at the cost of effectiveness.

Vishal had learnt in a training workshop the value of an ‘elevator speech’ to express his idea to a customer in less than a minute. He had used it many times. But it never had the desired effect – an appointment with the client. He wondered why. His colleague who had greater success with the elevator speech asked him over a cup of coffee, “In which language was the elevator speech for Mr. Masand?” English, said Vishal. “But you and I both know Mr. Masand prefers speaking in Hindi.”

At that moment the penny dropped. While speaking to the customer, Vishal was focusing on what he wanted to communicate and not on how it was received by the customer. Communication is not so much about the idea but about the customer. The method of communication depends on the capacity, capability and intent of the customer, and not so much on the capacity, capability and intent of the communicator. The reference point is the customer and not the communicator. This is often forgotten.

That is why the same devotion is expressed differently for different gods: bilva for Shiva, tulsi for Vishnu, grass for Ganesha, hibiscus for Kali and sesame for Hanuman!