Sir, my Dad is the pilot, And he is taking me home

Story told by a man which is most frightening yet thought-provoking experience of his life.

He had been on a long flight.. The first warning of the approaching problems came when the sign on the airplane flashed on:

“Fasten your seat belts.”

Then, after a while, a calm voice said, “We shall not be serving the beverages at this time as we are expecting a little turbulence. Please be sure your seat belt is fastened..”

As he looked around the aircraft, it became obvious that many of the passengers were becoming apprehensive. Later, the voice of the announcer said, “We are so sorry that we are unable to serve the meal at this time..

The turbulence is still ahead of us.”

And then the storm broke. The ominous cracks of thunder could be heard even above the roar of the engines. Lightening lit up the darkening skies, and within moments that great plane was like a cork tossed around on a celestial ocean. One moment the airplane was lifted on terrific currents of air; the next, it dropped as if it were about to crash.

The man confessed that he shared the discomfort and fear of those around him. He said, “As I looked around the plane, I could see that nearly all the passengers were upset and alarmed. Some were praying.

The future seemed ominous and many were wondering if they would make it through the storm. And then, I suddenly saw a girl to whom the storm meant nothing. She had tucked her feet beneath her as she sat on her seat and was reading a book.

Everything within her small world was calm and orderly. Sometimes she closed her eyes, then she would read again; then she would straighten her legs, but worry and fear were not in her world. When the plane was being buffeted by the terrible storm, when it lurched this way and that, as it rose and fell with frightening severity, when all the adults were scared half to death, that marvelous child was completely composed and unafraid.”

The man could hardly believe his eyes. It was not surprising therefore, that when the plane finally reached its destination and all the passengers were hurrying to disembark, he lingered to speak to the girl whom he had watched for such a long time.

Having commented about the storm and behavior of the plane, he asked why she had not been afraid.

The sweet child replied,

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“Sir, my Dad is the pilot, And he is taking me home.”

DAYWITH A WOMAN

                             
After 21 years of Marriage, my Wife wanted me to take another woman out to dinner and a movie.
She said I love you but I know this other woman loves you and would love to spend some time with you.

The other woman that my wife wanted me to visit was my MOTHER, who has been a widow for 19 years, but the demands of my work and my three children had made it possible to visit her only occasionally.
That night I called to invite her to go out for dinner and a movie.
‘What’s wrong, are you well,’ she asked?

My mother is the type of woman who suspects that a late night call or a surprise invitation is a sign of bad news.
‘I thought that it would be pleasant to be with you,’ I responded. ‘Just the two of us.’
She thought about it for a moment, and then said, ‘I would like that very much.’

That Friday after work, as I drove over to pick her up I was a bit nervous.

When I arrived at her house, I noticed that she too seemed to be nervous about our date.

She waited in the door with her coat on.
She had curled her hair and was wearing the dress that she had worn to celebrate her last wedding anniversary. She smiled from a face that was as radiant as an angel’s.
‘I told my Friends that I was going to go out with my son, and they were impressed,’ she said, as she got into the car. ‘They can’t wait to hear about our meeting’…
We went to a restaurant that, although not elegant, was very nice and cosy.
My mother took my arm as if she were the first lady.
After we sat down, I had to read the menu in large print.
Half way through the entries, I lifted my eyes and saw mom sitting there staring at me.
A nostalgic smile was on her lips.
‘It was I who used to have to read the menu when you were small,’ she said.
‘Then it’s time that you relax and let me return the favour,’ I responded.
During the dinner, we had an agreeable conversation, nothing extra-ordinary, but catching up on recent events of each other’s life. We talked so much that we missed the Movie.
As we arrived at her house later, she said, ‘I’ll go out with you again, but only if you let me invite you.’ I agreed.
‘How was your dinner date?’ asked my wife when I got home.
‘Very nice much more so than I could have imagined,’ I answered.
A few days later, my mother died of a massive heart attack. It happened so suddenly that I didn’t have time to do anything for her.
Sometime later, I received an envelope with a copy of a restaurant receipt from the same place mother and I had dined.
An attached note said:

‘I paid this bill in advance.

I wasn’t sure that I could be there;

But nevertheless, I paid for two plates –

One for you and the other for your wife.

You will never know what that night meant for me.

I Love you, my son.’

At that moment, I understood the importance of saying in time: ‘I LOVE YOU!’ and to give our loved ones the time that they deserve.

Nothing in life is more important than God and your family.
Give them the time they deserve, because these things cannot be put off till ‘some other time.’

🙂

भारतीय संस्कृ्ति का महान प्रतीक चिन्ह—–स्वस्तिक(a symbol of life and preservation )

हिन्दू धर्म जितना विशाल और गहन है,उसकी मान्यताएं और प्रक्रियाएं भी उतनी ही विशद और विस्तृ्त हैं । आज हम देखते हैं कि जागरूकता की अधिकता के चलते बहुत से व्यक्ति विशेष रूप से पश्चिमी सभ्यता से अति प्रभावित लोग, अपने धर्म से संबंधित मान्यताओं,रीति-रिवाजों एवं कर्मकांडों पर शंका व्यक्त करने लगे हैं ।बहुत ही बातों को बिना जाने-समझे सिर्फ उन्हे ढकोसला एवं अनावश्यक समझने लगे हैं । जब कि यदि वे इन सब चीजों,प्रक्रियाओं के बारें में गहराई से मनन करें तो पाएंगें कि हिन्दू धर्म विश्व का एकमात्र ऎसा धर्म है जो कि अपने प्रत्येक कर्म,संस्कार और परम्परा में पूर्णत: वैज्ञानिकता समेटे हुए है । प्राचीन काल में शिक्षा पद्धति ऎसी थी कि बालकों को प्रारंभ से ही धर्म के बारे में विस्तृ्त जानकारी दी जाती थी,जिससे कि उनकी आस्था स्वधर्म और परम्पराओं के प्रति बनी रहे……..ओर वो उनका पालन सिर्फ एक दिखावे के लिए नहीं अपितु आन्तरिक श्रद्धा भाव से करें । किन्तु आज स्थिति ऎसी नहीं है । आज न तो हमारी शिक्षा प्रणाली ऎसी है कि बच्चों को इस प्रकार की शिक्षा दी सके और न ही ऎसे विद्वान आचार्य ही दिखाई पडते हैं जो कि धर्म के क्षेत्र में समाज को एक सही मार्ग दिखा सकें ।

जैसे कि ये तो सर्वविदित है कि प्रत्येक कार्य के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य छिपा होता है,क्यों कि कार्य हमेशा कारण से ही उपजता है । यदि एक स्त्रोत है तो दूसरा उसकी परिणति है । हिन्दू धर्म के अनुष्ठानों,परम्पराओं,मान्यताओं,सिद्धान्तों इत्यादि के मूल में भी सटीक वैज्ञानिक कारण निहित हैं । इन्ही में से कुछ कारणों को यहाँ उदघाटित करना हमारे इस ब्लाग का उदेश्य रहा है । आज बात करते हैं—भारतीय संस्कृ्ति में आदिकाल से प्रयोग किए जा रहे प्रतीक चिन्ह स्वस्तिक की———

स्वस्तिक चिन्ह:— भारतीय संस्कृ्ति में वैदिक काल से ही स्वस्तिक को विशेष महत्व प्रदान किया गया है । यूँ तो बहुत से लोग इसे हिन्दू धर्म का एक प्रतीक चिन्ह ही मानते हैं । किन्तु वे लोग ये नहीं जानते कि इसके पीछे कितना गहरा अर्थ छिपा हुआ है । सामान्यतय: स्वस्तिक शब्द को “सु” एवं “अस्ति” का मिश्रण योग माना जाता है । यहाँ “सु” का अर्थ है— शुभ और “अस्ति” का— होना ।

संस्कृ्त व्याकरण अनुसार “सु” एवं “अस्ति” को जब संयुक्त किया जाता है तो जो नया शब्द बनता है–वो है “स्वस्ति” अर्थात “शुभ हो”, “कल्याण हो” ।

मानक दर्शन अनुसार स्वस्तिक दक्षिणोन्मुख दाहिने हाथ की दिशा (घडी की सूई चलने की दिशा) का संकेत तथा वामोन्मुख बाईं दिशा (उसके विपरीत) के प्रतीक हैं । दोनों दिशाओं के संकेत स्वरूप दो प्रकार के स्वस्तिक स्त्री एवं पुरूष के प्रतीक के रूप मे भी मान्य हैं । किन्तु जहाँ दाईं ओर मुडी भुजा वाला स्वस्तिक शुभ एवं सौभाग्यवर्द्धक हैं ,वहीं उल्टा (वामावर्त) स्वस्तिक को अमांगलिक,हानिकारक माना गया है ।

प्राचीन काल में राजा महाराज द्वारा किलों का निर्माण स्वस्तिक के आकार में किया जाता रहा है ताकि किले की सुरक्षा अभेद्य बनी रहे। प्राचीन पारम्परिक तरीके से निर्मित किलों में शत्रु द्वारा एक द्वार पर ही सफलता अर्जित करने के पश्चात सेना द्वारा किले में प्रवेश कर उसके अधिकाँश भाग अथवा सम्पूर्ण किले पर अधिकार करने के बाद नर संहार होता रहा है । परन्तु स्वस्तिक नुमा द्वारों के निर्माण के कारण शत्रु सेना को एक द्वार पर यदि सफलता मिल भी जाती थी तो बाकी के तीनों द्वार सुरक्षित रहते थे । ऎसी मजबूत एवं दूरगामी व्यवस्थाओं के कारण शत्रु के लिए किले के सभी भागों को एक साथ जीतना संभव नहीं होता था । यहाँ स्वस्तिक किला/दुर्ग निर्माण के परिपेक्ष्य में “सु वास्तु” था ।

स्वस्तिक का महत्व सभी धर्मों में बताया गया है। इसे विभिन्न देशों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। चार हजार साल पहले सिंधु घाटी की सभ्यताओं में भी स्वस्तिक के निशान मिलते हैं। बौद्ध धर्म में स्वस्तिक का आकार गौतम बुद्ध के हृदय स्थल पर दिखाया गया है। मध्य एशिया के देशों में स्वस्तिक चिन्ह मांगलिक एवं सौभाग्य सूचक माना जाता रहा है। नेपाल में हेरंब, मिस्र में एक्टोन तथा बर्मा में महा पियेन्ने के नाम से पूजित हैं। आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड के मावरी आदिवासियों द्वारा आदिकाल से स्वस्तिक को मंगल प्रतीक के रूप में प्रयुक्त किया जाता रहा हैं।

यदि आधुनिक दृ्ष्टिकोण से देखा जाए तो अब तो विज्ञान भी स्वस्तिक, इत्यादि माँगलिक चिन्हों की महता स्वीकार करने लगा है । आधुनिक विज्ञान ने वातावरण तथा किसी भी जीवित वस्तु,पदार्थ इत्यादि के उर्जा को मापने के लिए विभिन्न उपकरणों का आविष्कार किया है ओर इस उर्जा मापने की इकाई को नाम दिया है—“बोविस” । मृत मानव शरीर का बोविस शून्य माना गया है और मानव में औसत ऊर्जा क्षेत्र 6,500 बोविस पाया गया है। स्वस्तिक में इस उर्जा का स्तर 1,00,0000 बोविस है। यदि इसे उल्टा बना दिया जाए तो यह प्रतिकूल ऊर्जा को इसी अनुपात में बढ़ाता है। इसी स्वस्तिक को थोड़ा टेड़ा बना देने पर इसकी ऊर्जा मात्र 1,000 बोविस रह जाती है।

इसके साथ ही विभिन्न धार्मिक स्थलों यथा मन्दिर,गुरूद्वारा इत्यादि का ऊर्जा स्तर काफी उंचा मापा गया है जिसके चलते वहां जाने वालों को शांति का अनुभव और अपनी समस्याओं,कष्टों से मुक्ति हेतु मन में नवीन आशा का संचार होता है। यही नहीं हमारे घरों,मन्दिरों,पूजा पाठ इत्यादि में प्रयोग किए जाने वाले अन्य मांगलिक चिन्हों यथा ॐ इत्यादि में भी इसी तरह की ऊर्जा समाई है। जिसका लाभ हमें जाने अनजाने में मिलता ही रहता हैं।

खजुराहो

विवरण खजुराहो भारत के मध्य प्रदेश प्रान्त, छतरपुर ज़िले में स्थित एक प्रमुख शहर है जो अपने प्राचीन एवं मध्यकालीन मंदिरों के लिये विश्वविख्यात है।

खजुराहो वैसे तो भारत के मध्य प्रदेश प्रान्त, छतरपुर ज़िले में स्थित एक छोटा सा क़स्बा है लेकिन फिर भी भारत में, ताजमहल के बाद, सबसे ज़्यादा देखे और घूमे जाने वाले पर्यटन स्थलों में अगर कोई दूसरा नाम आता है तो वह है, खजुराहो। खजुराहो, भारतीय आर्य स्थापत्य और वास्तुकला की एक नायाब मिसाल है। खजुराहो को इसके अलंकृत मंदिरों की वजह से जाना जाता है जो कि देश के सर्वोत्कृष्ठ मध्यकालीन स्मारक हैं। चंदेल शासकों ने इन मंदिरों की तामीर सन 900 से 1130 ईसवी के बीच करवाई थी। इतिहास में इन मंदिरों का सबसे पहला जो उल्लेख मिलता है,वह अबू रिहान अल बरूनी (1022 ईसवी) तथा अरब मुसाफ़िर इब्न बतूता का है।

खजुराहो मन्दिर, मध्य प्रदेशदरअसल यह क्षेत्र प्राचीन काल में वत्स के नाम से, मध्यकाल में जैजाक्भुक्ति नाम से तथा चौदहवीं सदी के बाद बुन्देलखन्ड के नाम से जाना गया। खजुराहो के चन्देल वंश का उत्थान दसवीं सदी के शुरू से माना जाता है। इनकी राजधानी प्रासादों, तालाबों तथा मंदिरों से परिपूर्ण थी। स्थानीय धारणाऑं के अनुसार तक़रीबन एक हज़ार साल पहले यहां के दरियादिल व कला पारखी चंदेल राजाओं ने क़रीब 84 बेजोड़ व लाजवाब मंदिरों की तामीर करवाई थी लेकिन उनमें से अभी तक सिर्फ़ 22 मंदिरों की ही खोज हो पाई है, यद्यपि दूसरे पुरावशेषों के प्रमाण प्राचीन टीलों तथा बिखरे वास्तुखंडों के रूप में आज भी खजुराहो तथा इसके आस पास देखे जा सकते हैं। पंद्रहवीं सदी के बाद इस इलाक़े की अहमियत ख़त्म होती गई।

सामान्य रूप से यहां के मंदिर बलुआ पत्थर से निर्मित किए गए हैं, लेकिन चौंसठ योगिनी, ब्रह्मा तथा ललगुआँ महादेव मंदिर ग्रेनाइट (कणाष्म) से निर्मित हैं। ये मंदिर शैव, वैष्णव तथा जैन संप्रदायों से सम्बंधित हैं। खजुराहो के मंदिरों का भूविन्यास तथा ऊर्ध्वविन्यास विशेष उल्लेखनीय है, जो मध्यभारत की स्थापत्यकला का बेहतरीन व विकसित नमूना पेश करते हैं। यहां मंदिर बिना किसी परकोटे के ऊंचे चबूतरे पर निर्मित किए गए हैं। आम तौर पर इन मंदिरों में गर्भगृह, अंतराल, मंडप तथा अर्ध मंडप देखे जा सकते हैं। खजुराहो के मंदिर भारतीय स्थापत्य कला के उत्कृष्ट व विकसित नमूने हैं,यहां की प्रतिमाऐं विभिन्न भागों में विभाजित की गई हैं। जिनमें प्रमुख प्रतिमा परिवार, देवता एवं देवी देवता, अप्सरा, विविध प्रतिमाऐं, जिनमें मिथुन (सम्भोगरत) प्रतिमाऐं भी शामिल हैं तथा पशु व व्याल प्रतिमाऐं हैं, जिनका विकसित रूप कंदारिया महादेव मंदिर में देखा जा सकता है। सभी प्रकार की प्रतिमाओं का परिमार्जित रूप यहां स्थित मंदिरों में देखा जा सकता है। यहां मंदिरों में जड़ी हुई मिथुन प्रतिमाऐं सर्वोत्तम शिल्प की परिचायक हैं जो कि दर्शकों की भावनाओं को अत्यंत उद्वेलित व आकर्शित करती हैं और अपनी मूर्तिकला के लिए विशेष उल्लेखनीय हैं। खजुराहो की मूर्तियों की सबसे अहम और महत्त्वपूर्ण ख़ूबी यह है कि इनमें गति है, देखते रहिए तो लगता है कि शायद चल रही है या बस हिलने ही वाली है, या फिर लगता है कि शायद अभी कुछ बोलेगी, मस्कुराएगी, शर्माएगी या रूठ जाएगी। और कमाल की बात तो यह है कि ये चेहरे के भाव और शरीर की भंगिमाऐं केवल स्त्री पुरुषों में ही नहीं बल्कि जानवरों में भी दिखाई देते हैं। कुल मिलाके कहा जाय तो हर मूर्ति में एक अजीब सी हलचल है।

खजुराहो के प्रमुख मंदिरों में लक्ष्मण, विश्वनाथ, कंदारिया महादेव, जगदम्बी, चित्रगुप्त, दूल्हादेव,पार्श्वनाथ,आदिनाथ, वामन, जवारी, तथा चतुर्भुज इत्यादि हैं।

परिचय

अगर भारत में कहीं भी मंदिर स्थापत्य व वास्तु कला का रचनात्मक, अद्वितीय, विलक्षण, भव्य, राजसी, बेजोड़, लाजवाब, शानदार और शाही सृजन है … तो वह है केवल और केवल खजुराहो में। खजुराहो चंदेल शासकों के प्राधिकार का प्रमुख स्‍थान था जिन्‍होंने यहाँ अनेकों तालाबों, शिल्‍पकला की भव्‍यता और वास्‍तुकलात्‍मक सुंदरता से सजे विशालकाय मंदिर बनवाए। यशोवर्मन[2] ने विष्‍णु का मंदिर बनवाया जो अब लक्ष्‍मण मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है और यह चंदेल राजाओं की प्रतिष्‍ठा का दावा करने वाले इसके समय के एक उदाहरण के रूप में स्थित है।

खजुराहो मन्दिर, मध्य प्रदेशविश्‍वनाथ, पार्श्‍व नाथ और वैद्य नाथ के मंदिर राजा डांगा के समय से हैं जो यशोवर्मन के उत्तरवर्ती थे। खजुराहो का सबसे बड़ा और महान मंदिर अनश्‍वर कंदारिया महादेव का है जिसे राजा गंडा[3] ने बनवाया है। इसके अलावा कुछ अन्‍य उदाहरण हैं जैसे कि वामन, आदि नाथ, जवारी, चतुर्भुज और दुल्‍हादेव कुछ छोटे किन्‍तु विस्‍तृत रूप से संकल्पित मंदिर हैं। खजुराहो का मंदिर समूह अपनी भव्‍य छतों (जगती) और कार्यात्‍मक रूप से प्रभावी योजनाओं के लिए भी उल्‍लेखनीय है। यहाँ की शिल्‍पकलाओं में धार्मिक छवियों के अलावा परिवार, पार्श्‍व, अवराणा देवता, दिकपाल और अप्‍सराएँ तथा सूर सुंदरियाँ भी हैं। यहाँ वेशभूषा और आभूषण भव्‍यता मनमोहक हैं।[4]

इतिहास

खजुराहो का प्राचीन नाम ‘खर्जुरवाहक’ है। 900 से 1150 ई. के बीच यह चन्देल राजपूतों के राजघरानों के संरक्षण में राजधानी और नगर था, जो एक विस्तृत क्षेत्र ‘जेजाकभुक्ति’ (अब मध्य प्रदेश का बुंदेलखंड क्षेत्र) के शासक थे। चन्देलों के राज्य की नींव आठवीं शती ई. में महोबा के चन्देल नरेश चंद्रवर्मा ने डाली थी। तब से लगभग पाँच शतियों तक चन्देलों की राज्यसत्ता जुझौति में स्थापित रही। इनका मुख्य दुर्ग कालिंजर तथा मुख्य अधिष्ठान महोबा में था। 11वीं शती के उत्तरार्द्ध में चन्देलों ने पहाड़ी क़िलों को अपनी गतिविधियों का केन्द्र बना लिया। लेकिन खजुराहो का धार्मिक महत्व 14वीं शताब्दी तक बना रहा। इसी काल में अरबी यात्री इब्न बतूता यहाँ पर योगियों से मिलने आया था। खजुराहो धीरे-धीरे नगर से गाँव में परिवर्तित हो गया और फिर यह लगभग विस्मृति में खो गया।

यातायात

खजुराहो, महोबा से 54 किलोमीटर दक्षिण में, छतरपुर से 45 किलोमीटर पूर्व और सतना ज़िले से 105 किलोमीटर पश्‍चिम में स्‍थित है तथा निकटतम रेलवे स्‍टेशनों अर्थात् महोबा, सतना और झांसी से पक्‍की सड़कों से खजुराहो अच्‍छी तरह जुड़ा हुआ है।[5]

हवाई मार्ग खजुराहो के लिए दिल्ली, बनारस और आगरा से प्रतिदिन विमान–सेवा उपलब्ध रहती है।

खजुराहो मन्दिर, मध्य प्रदेशरेल मार्ग दिल्ली से खजुराहो माणिकपुर होते हुए उत्तर प्रदेश संपर्क क्रांति ट्रेन से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा, दिल्ली-चेन्नई रेल मार्ग पर पड़ने वाले स्टेशनों महोबा (61 किमी ), हरपालपुर (94 किमी ) और झांसी (172 किमी ) से भी ट्रेन बदलकर खजुराहो जाया जा सकता है।

बस मार्ग खजुराहो सतना, हरपालपुर, झांसी और महोबा से बस सेवा द्वारा जुड़ा हुआ है।

मन्दिरों की खोज

1838 में एक ब्रिटिश इंजीनियर कैप्टन टी.एस. बर्ट को अपनी यात्रा के दौरान अपने कहारों से इसकी जानकारी मिली। उन्होंने जंगलों में लुप्त इन मन्दिरों की खोज़ की और उनका अलंकारिक विवरण बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी के समक्ष प्रस्तुत किया। 1843 से 1847 के बीच छतरपुर के स्थानीय महाराजा ने इन मन्दिरों की मरम्मत कराई। जनरल अलेक्ज़ेंडर कनिंघम ने इस स्थान की 1852 के बाद कई यात्राएँ कीं और इन मन्दिरों का व्यवस्थाबद्ध वर्णन अपनी भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट (आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया रिपोर्ट्स) में किया। खजुराहों के स्मारक अब भारत के पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग की देखभाल और निरीक्षण में हैं। जिसने अनेक टीलों की खुदाई का कार्य करवाया है। इनमें लगभग 18 स्थानों की पहचान कर ली गई है। सन 1950-51 में भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद खजुराहो आए। इस दौरान यहां के निवासियों ने खजुराहो के विकास की रूप्रेखा उनके समक्ष रखी,उसके बाद वर्ष 1955 में पंडित जवाहर लाल नेहरू का भी खजुराहो आगमन हुआ। उन्होंने खजुराहो के मंदिरों की सराहना करते हुए इसके विकास की दिशा में क़दम उठाने का आश्वासन दिया। इन्हीं मंदिरों की वजह से खजुराहो पर्यटन स्थल के रूप में शीघ्र विकसित हुआ। आज विश्व पर्यटन के मानचित्र पर खजुराहो का विशिष्ट स्थान है। खजुराहो को यूनेस्को से 1986 ई. में विश्व धरोहर स्थल का दर्जा भी मिला। आधुनिक खजुराहो एक छोटा-सा गाँव है, जो होटलों और हवाई अड्डे के साथ पर्यटन व्यापार की सुविधा उपलब्ध कराता है।

कलात्मकता

खजुराहो के मंदिर भारतीय स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना हैं। खजुराहो में चंदेल राजाओं द्वारा बनवाए गए ख़ूबसूरत मंदिरो में की गई कलाकारी इतनी सजीव है कि कई बार मूर्तियाँ ख़ुद बोलती हुई मालूम देती हैं। दुनिया को भारत का खजुराहो के कलात्मक मंदिर एक अनमोल तोहफ़ा हैं। उस समय की भारतीय कला का परिचय इनमे पत्थर की सहायता से उकेरी गई कलात्मकता देती है। खजुराहो के मंदिरों को देखने के बाद कोई भी इन्हें बनाने वाले हाथों की तारीफ़ किए बिना नहीं रह सकता।

निर्माण के पीछे कथा

खजुराहो के मंदिरों के निर्माण के पीछे एक बेहद रोचक कथा है। कहा जाता है कि हेमवती एक ब्राह्मण पुजारी की बेटी थी। एक बार जब जंगल के तालाब में नहा रही थी, तो चंद्र देव यानी कि चंद्रमा उस पर मोहित हो गए और दोनों के एक बेटा हुआ।

खजुराहो मन्दिर, मध्य प्रदेशहेमवती ने अपने बेटे का नाम चंद्रवर्मन रखा। इसी चंद्रवर्मन ने बाद में चंदेल वंश की स्थापना की। चंद्रवर्मन का लालन-पालन उसकी मां ने जंगल में किया था। राजा बनने के बाद उसने मां का सपना पूरा करने की ठानी। उसकी मां चाहती थी कि मनुष्य की तमाम मुद्राओं को पत्थर पर उकेरा जाए। इस तरह चंद्रवर्मन की मां हेमवती की इच्छा स्वरूप इन ख़ूबसूरत मंदिरों का निर्माण हुआ। खजुराहो के ये मंदिर पूरी दुनिया के लिए एक धरोहर हैं।

सर्वोत्कृष्ट कलाकृतियाँ

वास्तु और मूर्तिकला की दृष्टि से खजुराहो के मन्दिरों को भारत की सर्वोत्कृष्ट कलाकृतियों में स्थान दिया जाता है। यहाँ की श्रृंगारिक मुद्राओं में अंकित मिथुन-मूर्तियों की कला पर सम्भवतः तांत्रिक प्रभाव है, किन्तु कला का जो निरावृत और अछूता सौदर्न्य इनके अंकन में निहित है, उसकी उपमा नहीं मिलती। इन मन्दिरों के अलंकरण और मनोहर आकार-प्रकार की तुलना में केवल भुवनेश्वर के मन्दिर की कला टिक सकती है। मुख्य मन्दिर तथा मण्डपों के शिखरों पर आमलक स्थित है। ये शिखर उत्तरोत्तर ऊँचे होते गए हैं, और इसलिए बड़े प्रभावोत्पादक तथा आकर्षक दिखाई देते हैं। मन्दिरों की मूर्तिकला की सराहना सभी पर्यवेक्षकों ने की है। मन्दिर का अपूर्व सौन्दर्य, काफ़ी विस्तार और चित्रकार की कूची को लज्जित करने वाला बारीक नक़्क़ाशी का काम देखकर चकित होना पड़ता है।

खजुराहो की मिथुन प्रतिमाऐं

इन मूर्तियों के बारे में भिन्न भिन्न व्याख्याऐं व विचार हैं। कुछ की मान्यता है कि ये प्रतिमाऐं समकालीन समाज की जर्जर व कमज़ोर नैतिकता का प्रतिनिधित्व करती हैं। कुछ की धारणा है कि यह कामशास्त्र के पौराणिक ग्रंथों के रत्यात्मक आसनों का निदर्शन है। यह भी माना जाता है कि ये प्रतिमाऐं, कुछ विशेष मध्यकालीन भारतीय पंथ जो कि कामुक कृत्य को धार्मिक प्रतीकवाद मानते थे, का प्रतिनिधित्व करती हैं। ये लोग मोक्ष पाने के लिए योग तथा भोग दोनों ही मार्गों का अनुसरण करते रहे होंगे।

लक्ष्मण मन्दिर, खजुराहोयहां हमें यह भी ध्यान रखना पड़ेगा कि प्रारम्भिक काल से ही भारतीय कला, साहित्य तथा लोक परम्परा में सदा ही एक कामुक तत्त्व की उपस्थिति रही है। मिथुन (प्रेमी युगल) प्रतिमाऐं तो शुंग काल की मूर्तिकला तथा मृण्मूर्तियों में भी मौजूद थीं। इस कला ने अमरावती और मथुरा से शुरू होकर बाद की सभी कला शैलियों को अनुप्राणित किया।

बौद्ध धर्म

खजुराहो में विराजमान बुद्ध की एक विशाल प्रतिमा के प्राप्त होने से यह संकेत मिलता है कि इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म का भी प्रचलन था, भले ही वह सीमित पैमाने पर ही क्यों न रहा हो। कनिंघम के मत में गंठाई नामक मन्दिर बौद्ध धर्म से सम्बन्धित है, किन्तु यह तथ्य सत्य जान नहीं पड़ता।

हिन्दू धार्मिक प्रणाली

खजुराहो की हिन्दू धार्मिक प्रणाली तंत्र पर आधारित थी, लेकिन कापालिक सम्प्रदाय के खोपड़ी धारियों (शिव के कापाली स्वरूप के पूजक) से पृथक थी। ये लोग उग्र तांत्रिक नहीं थे, ये परम्परागत रूढ़िवादी और ब्राह्मणवादी धारा के थे, जो वैदिक पुनरुत्थान और पौराणिक तत्वों से प्रभावित थे, जैसा कि मन्दिरों के शिलालेखों से प्रमाण मिलता है।

पर्यटन स्थल

खजुराहो प्रसिद्ध पर्यटन और पुरातात्विक स्थल है। जिसमें हिन्दू व जैन मूर्तिकला से सुसज्जित 25 मन्दिर और तीन संग्रहालय हैं। 25 मन्दिरों में से 10 मंदिर विष्णु को समर्पित हैं, जिसमें उनका एक सशक्त मिश्रित स्वरूप वैकुण्ठ शामिल है। नौ मन्दिर शिव के, एक सूर्य देवता का, एक रहस्यमय योगिनियों (देवियों) का और पाँच मन्दिर दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के तीर्थकारों के हैं। खजुराहो के मन्दिर में तीन बड़े शिलालेख हैं, जो चन्देल नरेश गण्ड और यशोवर्मन के समय के हैं। 7वीं शती में चीनी यात्री युवानच्वांग ने खजुराहो की यात्रा की थी। उसने उस समय भी अनेक मन्दिरों को वहाँ पर देखा था। पिछली शती तक खजुराहो में सबसे अधिक संख्या में मन्दिर स्थित थे, किन्तु इस बीच वे नष्ट हो गए हैं।

पश्चिमी समूह के मंदिर

खजुराहो के पश्चिमी समूह में लक्ष्मण, कंदारिया महादेव, मतंगेश्वर, विश्वनाथ, लक्ष्मी, जगदम्बी, चित्रगुप्त, पार्वती तथा गणेश मंदिर आते हैं। यहीं पर वराह व नन्दी के मंडप भी हैं।

लक्ष्मण मंदिर

लक्ष्मण मन्दिर, खजुराहोयह वैष्णव मंदिर, पंचायतन शैली का संधार मंदिर है। इस मंदिर को 930 से 950 ईसवी के बीच, चंदेल शासक यशोवर्मन ने बनवाया था। इस मंदिर की लम्बाई 29 मीटर तथा चौड़ाई 13 मीटर है। स्थापत्य तथा वास्तु कला के आधार पर, बलुआ पत्थरों से बने मंदिरों में लक्ष्मण मंदिर सर्वोत्तम है। ऊंची जगत पर स्थित इस मंदिर के गर्भगृह में 1.3 मीटर ऊंची विष्णु की मूर्ति अलंकृत तोरण के बीच स्थित है। पूरा मंदिर एक ऊंची जगत पर स्थित होने के कारण मंदिर में विकसित इसके सभी भाग देखे जा सकते हैं। जिनके अर्धमंडप, मंडप, महामंडप, अंतराल तथा गर्भगृह में, मंदिर की बाहरी दीवारों पर प्रतिमाओं की दो पंक्तियां जिनमें देवी देवतागण, युग्म और मिथुन वगैरह हैं। मंदिर के बाहरी हिस्से की दीवारों तथा चबूतरे पर युद्ध, शिकार, हाथी, घोड़ों, सैनिक, अप्सराऑं और मिथुनाकृतियों के दृश्य अंकित हैं। सरदल के मध्य में लक्ष्मी है, जिसके दोनों ओर ब्रह्मा एवं विष्णु हैं।

विश्वनाथ मंदिर

आज से लगभग 1000 वर्ष पूर्व पंचायतन शैली में महाराजा धंगदेव वर्मन द्वारा बनवाए गए विश्वनाथ[6] मंदिर में तीन सिर वाले ब्रह्माजी की मूर्ति स्थापित है। अब इसका कुछ भाग खंडित हो चुका है। भारत देश में भगवान विष्णु और शिव शंकर के मंदिर तो बहुत जगह हैं, लेकिन ब्रह्मा जी के मंदिर देश में ढूंढने से भी नहीं मिलते हैं। मंदिर की उत्तरी दिशा में स्थित शेर और दक्षिणी दिशा में स्थित हाथी की प्रतिमाएँ काफ़ी सजीव लगती हैं। इनके अलावा एक नंदी की प्रतिमा भगवान की ओर मुँह किए हुए भी मौज़ूद है।

खजुराहो मन्दिर, मध्य प्रदेशकंदारिया महादेव

कंदारिया महादेव मंदिर[7] खजुराहो के मंदिरों में सबसे बड़ा, ऊंचा और कलात्मक यही मंदिर है। यह मंदिर 109 फुट लम्बा, 60 फुट चौड़ा और 116 फुट ऊँचा है। इस मन्दिर के सभी भाग- अर्द्धमण्डप, मण्डप, महामण्डप, अन्तराल तथा गर्भगृह आदि, वास्तुकला के बेजोड़ नमूने हैं। गर्भगृह चारों ओर से प्रदक्षिणापथ युक्त है। यह मंदिर शिव को समर्पित है तथा इस मंदिर में शिवलिंग के अलावा तमाम देवी-देवताओं की कलात्मक मूर्तियाँ मन मोह लेती हैं।

मन्दिर के प्रत्येक भाग में केवल दो और तीन फुट ऊँची मूर्तियों की संख्या ही 872 है। छोटी मूर्तियाँ तो असंख्य हैं। पूरी समानुपातिक योजना, आकार, ख़ूबसूरत मूर्तिकला एवं भव्य वास्तुकला की वजह से यह मंदिर मध्य भारत में अपनी तरह का शानदार मंदिर है।

मंदिर में सोपान द्वारा अलंकृत कीर्तिमुख, नृत्य दृश्य युक्त तोरण द्वार से प्रवेश किया जा साकता है। बाहर से देखने पर इसका मुख्य द्वार एक गुफ़ा यानी कि कंदरा जैसा नज़र आता है, शायद इसीलिए इस मंदिर का नाम कंदारिया महादेव पड़ा है। गर्भगृह के सरदल पर विष्णु, उनके दाऎं ब्रह्मा एवं बाऎं शिव दिखाए गए हैं। कुछ अन्य मंदिरों की तरह इस मंदिर की भी यह विशेशता है कि अगर कुछ दूर से आप इसे देखें तो आपको लगेगा कि आप सैंड स्टोन से बने मंदिर को नहीं बल्कि चंदन की लकड़ी पर तराशी गई कोई भव्य कृति देख रहे हैं। अब सवाल उठता है कि अगर यह मंदिर बलुआ पत्थर से बना है तो फिर मूर्तियों, दीवारों और स्तम्भों में इतनी चमक कैसे, दरअसल यह चमक आई है चमड़े से ज़बरदस्त घिसाई करने के कारण। अपनी तरह के इस अनोखे मंदिर की दीवारें और स्तम्भ इतने ख़ूबसूरत बने हुए हैं कि पर्यटक उन्हें देखकर हैरान रह जाते हैं।

चित्रगुप्त मंदिर

चित्रगुप्त मन्दिर पूर्व की ओर मुख वाला मंदिर है। यह मंदिर भगवान सूर्य को समर्पित है। इस मंदिर के अंदर 5 फुट ऊँचे सात घोड़ों के रथ पर सवार भगवान सूर्य की प्रतिमा मनमोहक है। इस मंदिर की दीवारों पर राजाओं के शिकार और उनकी सभाओं में समूह नृत्य के दृश्य काफ़ी ख़ूबसूरती के साथ उकेरे गए हैं। इससे चंदेल राजाओं की संपन्नता का पता लगता है।

खजुराहो मन्दिर, मध्य प्रदेशजगदंबी मंदिर

राजा गंडदेव वर्मन द्वारा निर्मित यह मंदिर चित्रगुप्त मंदिर के ही समीप स्थित है। विष्णु भगवान के इस मंदिर में सैकड़ों वर्ष बाद छतरपुर के महाराजा ने यहाँ पर पार्वती की प्रतिमा स्थापित करवाई थी, इसीलिए इसे ‘जगदंबी मंदिर’ कहा जाता है।

मतंगेश्वर मंदिर

राजा हर्षवर्मन द्वारा सन् 920 ईसवी में बनवाया गया यह मंदिर खजुराहो में चंदेल राजाओं द्वारा बनवाए गए सभी मंदिरों में सबसे पुराना माना जाता है। यहाँ के सभी पुराने मंदिरों में यही एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहाँ अभी भी पूजा–अर्चना की जाती है।[8]

चौंसठ योगिनी मन्दिर

खजुराहो में 64 योगिनियों का खुला मन्दिर[9] खुरदुरे ग्रेनाइट पत्थर का बना हुआ है। उत्तरमुखी इस मन्दिर का निर्माण 900 ईसवी में माना जाता है। जबकि 10वीं शताब्दी के मध्य में बने नागर शैली के उत्कृष्ट मन्दिर, चिकने बलुआ पत्थर से निर्मित हैं। यहां से ब्रह्माणी, इंद्राणी व महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमाऐं प्राप्त हुई हैं।

पूर्वी समूह के मन्दिर

पूर्वी समूह के मंदिरों में हैं – ब्रह्मा, वामन, जवारी व हनुमान मन्दिर … और जैन मंदिरों में हैं – पार्श्वनाथ, आदिनाथ व घंटाई मंदिर।

वामन मन्दिर

खजुराहो, मध्य प्रदेशयह मंदिर विष्णु के वामन अवतार को समर्पित है। इसके भू-विन्यास में सप्तरथ, गर्भगृह, अंतराल, महामंन्डप तथा मुखमंडप हैं। इसका गर्भगृह निरंधार है तथा चतुर्भुज वामन की प्रतिमा स्थापित की हुई है। जिनके दोनो ओर क्रमशः चक्रपुरुष व शंखपुरुष हैं। इस मंदिर के महामण्डप की छत पश्चिमी भारत के मध्यकालीन मंदिरों के समान संवर्ण शैली के अनुरूप हैं। मंदिर के गर्भगृह के प्रवेश द्वार सप्त शाखाऔं से अलंकृत हैं। जो लता, पुष्प, नृत्यरत गण, मिथुन, कमला पुरुष, कुण्डलीयुक्त नारी की आकृति से सुसज्जित हैं।

प्रवेश द्वार के निचले हिस्से में स्त्री परिचर व द्वारपाल सहित गंगा और यमुना को त्रिभंग में बताया गया है, जो हाथों में कलश तथा मालाऐं लिए हुए हैं।

सरदल के मध्य भाग में चतुर्भुज विष्णु तथा दोनों ओर आलियों में ब्रह्मा और विष्णु किए गए हैं। मंदिर के मध्य भाग में प्रतिमाओं की दो पंक्तियां हैं,जिनका आकर्षण सुर-सुंदरियों की प्रतिमाएं हैं। साथ ही गर्भगृह के बाहरी भाग पर प्रमुख आलियों में वराह व नृसिंह वामन की प्रतिमाऐं लगी हुई हैं।

जवारी मन्दिर

सन 1075 से 1100 ईसवी के बीच निर्मित इस मंदिर की सानुपातिक संरचना के प्रदक्षिणापथविहीन, गर्भगृह, अंतराल तथा मंडप विद्यमान है। यह उत्कृष्ट मकरतोरण तथा सुंदर शिखर से अलंकृत है तथा बाह्य दीवारें सुंदर प्रतिमाओं से सुसज्जित हैं जो कि तीन पंक्तियों में उत्कीर्ण हैं। यह मंदिर खजुराहो के चतुर्भुज मंदिर से निकट साम्य रखता है। इसके अलावा अन्य विशेषताऐं मध्य भारत की मध्य युगीन मंदिर संरचना से समानता रखती हैं।

हनुमान मंदिर

खजुराहो एक ऐसा धार्मिक केन्द्र था, जहाँ कई सम्प्रदाय फले-फूले थे। खजुराहो की तरफ़ जाने वाले रास्ते पर हनुमान की 3 मीटर ऊंची प्रतिमा एक चबूतरे पर स्थित है। इस मूर्ति का महत्व इसलिए भी है क्यों कि यहां जो शिला लेख उत्कीर्ण है वह 922 ईसवी का है। इस हिसाब से खजुराहो का यह सबसे पुराना मंदिर है।

प्रतिभा व स्थापत्य शैली के आधार पर इस मंदिर का निर्माण काल तक़रीबन 1050 से 1075 ईसवी के बीच निर्धारित किया गया है।

जैन मन्दिर

खजुराहो में जो मन्दिर बनवाए गए उनमें से तीस आज भी स्थित हैं। इन मंदिरों में आठ जैन मन्दिर हैं। जैन मन्दिरों की वास्तुकला अन्य मन्दिरों के शिल्प से मिलती-जुलती है। सबसे बड़ा मन्दिर पार्श्वनाथ का है, जिसका निर्माण काल 950-1050 ई. है। यह 62 फुट लम्बा और 31 फुट चौड़ा है। इसकी बाहरी भित्तियों पर तीन पंक्तियों में जैन मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं।

पार्श्वनाथ मंदिर

खजुराहो की मूर्तियों की सबसे अहम और महत्त्वपूर्ण ख़ूबी यह है कि इनमें गति है, देखते रहिए तो लगता है कि शायद चल रही है या बस हिलने ही वाली है, या फिर लगता है कि शायद अभी कुछ बोलेगी, मस्कुराएगी, शर्माएगी या रूठ जाएगी। और कमाल की बात तो यह है कि ये चेहरे के भाव और शरीर की भंगिमाऐं केवल स्त्री पुरुषों में ही नहीं बल्कि जानवरों में भी दिखाई देते हैं। कुल मिलाके कहा जाय तो हर मूर्ति में एक अजीब सी जुंबिश नज़र आती है।

खजुराहो में जितने भी प्राचीन जैन मंदिर हैं, उनमें से यह सबसे सुंदर, विशाल व भव्य है। यह अपने भू विन्यास में विशिष्ट है। हां …यह मंदिर साधारण है, लेकिन फिर भी इसमें किसी भी प्रकार का वातायन नहीं है। इसकी अन्य विशेषता यह है कि इसके गर्भगृह के पीछे एक और छोटा मंदिर भी जुड़ा है। दूसरे अर्थों में यह कहा जा सकता है कि यह विकसित खजुराहो (चंदेल) शैली का एक मंदिर है जिसमें अद्भुत अलंकरण तथा प्रतिमाऑं की सौम्यता दृष्ट्व्य होती है। इस मंदिर का निर्माण दसवीं शताब्दी के मध्य हुआ था। मूलरूप से यह मंदिर प्रथम तीर्थंकर को समर्पित किया गया था।

आदिनाथ मंदिर

इस मंदिर के गर्भगृह में आदिनाथ प्रतिमा स्थापित होने के कारण यह जैन मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह निरंधार शैली का मंदिर है जिसमें मंडप तथा अर्धमंडप रहा होगा जो कि वर्तमान में पूर्ण रूप से नष्ट हो चुका है। आजकल इस में गर्भगृह तथा अंतराल हैं। इसके साथ ही वर्तमान समय में निर्मित मेहराबदार निर्माण देखा जा सकता है। जिसके अंदर गुम्बदनुमा छत है जो कि प्राचीन निर्माण से जुड़ी है। यह मंदिर सप्तरथ है एवं इसका भूविन्यास वामन मंदिर जैसा है, फिर भी यह मंदिर अत्याधिक विकसित शैली का है। इसका शिखर तथा जंघा भाग वामन मंदिर के समान ही अलंकृत है। शैली के आधार पर यह मंदिर ग्यारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में निर्मित हुआ था।

दक्षिणी समूह के मंदिर

खजुराहो के दक्षिणी समूह के मंदिरों में आते हैं चतुर्भुज और दूल्हादेव मंदिर।

चतुर्भुज मंदिर

खजुराहो मन्दिर, मध्य प्रदेशइस मंदिर में प्रदक्षिणा पथ रहित गर्भगृह, अंतराल, मंडप तथा मुखमंडप है। यह मंदिर एक साधारण चबूतरे पर स्थित है। खजुराहो में यह एक ऐसा मंदिर है, जिसमें मिथुन मूर्तियों का अभाव है। दीवार के चारों तरफ़ मूर्तियों की तीन श्रंखलाऐं हैं, जिनमें से ऊपरी पंक्ति में अंकित विद्याधरों की प्रतिमाओं के अलावा अन्य सभी प्रतिमाऐं एक जैसी हैं, जो कि शिल्पकला में हुए पतन का द्योतक है। दीवारों में जड़ी प्रतिमाऑं के अंतर्गत प्रथम पंक्ति में दिक्पाल की प्रतिमाऐं मध्य भाग में अष्ट बसु तथा शेष पंक्तियों में अप्सराऔं का अंकन है। आलियों में व्याल विशेष उल्लेखनीय हैं। गर्भगृह के प्रवेश द्वार के निचले भाग में त्रिभंग मुद्रा में गंगा, यमुना व द्वारपालों को प्रदर्शित किया गया है। इस मन्दिर के गर्भगृह में शिव की दक्षिणा मूर्ति स्थापित है, जिनकी मुखाकृति शांतभाव परिलक्षित करती है।

इस मंदिर का निर्माण काल सन 1100 ईसवी माना जाता है।

लाइट एंड साउंड शो

खजुराहो जैसी ऐतिहासिक जगह पर घूमने के बाद भी पर्यटकों के मन में इसके इतिहास से जुड़े कई सवाल अधूरे रह जाते हैं। पर्यटकों की तमाम शंकाओं के समाधान के लिए खजुराहो में लाइट एंड साउंड शो का आयोजन किया जाता है। इस शो में चंदेल राजाओं के वैभवशाली इतिहास से लेकर इन अप्रतिम मंदिरों के निर्माण की कहानी बताई जाती है। वेस्टर्न ग्रुप के मंदिरों के पास ही बने एक कॉम्पलेक्स में 50 मिनट तक चलने वाले एक शो में सुपर स्टार अमिताभ बच्चन अपनी आवाज में दर्शकों को खजुराहो के गौरवशाली इतिहास से रूबरू कराते हैं। ये शो रोजाना शाम को हिंदी और अंग्रेज़ी में चलाए जाते हैं।

खजुराहो मन्दिर, मध्य प्रदेशस्टेट म्यूज़ियम और ट्राइबल एंड फ़ोक आर्ट्स

यह संग्रहालय ‘चंदेल कल्चरल कॉम्पलेक्स’ में स्थित है। इस संग्रहालय में पूरे मध्य प्रदेश की आदिवासी जनजातियों की लोक कला के नमूने रखे गए हैं। मध्य प्रदेश सरकार के इस संग्रहालय में टेराकोटा, धातु शिल्प, काष्ठ शिल्प, आदिवासी और लोक चित्रकारी, टैटू, ज़ेवर और मुखौटों के 500 से ज़्यादा नमूने मौजूद हैं। यह संग्रहालय सोमवार और सरकारी छुट्टियों के अलावा रोजाना 12 बजे से 8 बजे तक खुलता है।

खजुराहो नृत्य समारोह

हर साल फ़रवरी – मार्च में खजुराहो में एक नृत्य समारोह का आयोजन किया जाता है। एक सप्ताह तक चलने वाले इस सास्कृतिक कार्यक्रम के लिए खजुराहो के मंदिरों के पश्चिमी समूह को एक पृष्ठपट की तरह इस्तैमाल किया जाता है। भारत का हर शास्त्रीय नर्तक इस भव्य समारोह में हिस्सा लेना अपना सौभाग्य समझता है।

रनेह जल प्रपात (रनेह फ़ॉल्स) तथा केन घड़ियाल अभयारण्य

खजुराहो मन्दिर, मध्य प्रदेशरनेह (कृपया इसे “स्नेह” न समझें) प्रपात खजुराहो से केवल 19 किलो मीटर दूर है और यह वहीं स्थित है जहां से केन घड़ियाल अभयारण्य शुरू होता है। दरअसल केन घड़ियाल अभयारण्य में घड़ियाल स्थानीय नहीं हैं बल्कि लखनऊ से लाकर डाले गए हैं।

जिन चट्टानों पर रनेह जल प्रपात गिरता और बहता है, वे रंग बिरंगे ग्रेनाइटों से बनी हैं। यह चट्टानें लाल, नीले, फ़िरोज़ी और काले रंग में इतनी अद्भुत लगती हैं कि बिना इन्हें देखे इनकी भव्यता की कल्पना नहीं की जा सकती। इसके अलावा वहीं एक ज्वालामुख (क्रेटर) भी है, रनेह जल प्रपात जब रंगीन चट्टानों से गिरता हुआ इस ज्वालामुख से गुज़रता है तो बस वह नज़ारा देखते ही बनता है।

पन्ना नेशनल पार्क

पन्ना नेशनल पार्क खजुराहो से मात्र 32 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। केन नदी के किनारे स्थित यह नेशनल पार्क खजुराहो से सिर्फ आधा घंटे की दूरी पर है। पन्ना नेशनल पार्क में आप शेर के अलावा, चीता, भेड़िया और घड़ियाल देख सकते हैं। इसके अलावा, यहाँ नीलगाय, सांभर और चिंकारा के झुंड अक्सर घूमते नज़र आ जाते हैं। यहीं एक भव्य जलप्रपात तथा कुछ ग़ुफ़ाएं हैं जिन्हें पांडव जल प्रपात (पांडव फ़ॉल्स) तथा पांडव गुफ़ाऑं के नाम से जाना जाता है। [10]

पांडव (फ़ॉल्स) जल प्रपात

पन्ना राष्ट्रीय उद्यान में स्थित पांडव फ़ॉल्स घने जंगलों से घिरा है तथा खजुराहो से यह लगभग 34 किलोमीटर दूर है। 98 फ़ुट से भी अधिक ऊंचाई से अनवरत गिरती एक मोटी जलधारा,पांडव गुफाओं की शोभा को और भी बढ़ा देती है। माना जाता है कि यहां पांडव आकर ठहरे थे। पौराणिक के साथ साथ इस स्थान का महत्व ऐतिहासिक भी है क्यों कि स्वतंत्रता सैनानी चंद्रशेखर आज़ाद ने यहां एक गुप्त गोष्ठी की थी।

खजुराहो में नई खोजें

इससे तो हम वाकिफ़ हैं ही कि खजुराहो के दृश्यपटल पर 22 मंदिर दिखाई देते हैं लेकिन सच्चाई और यथातथ्यता उन मंदिरों की अभिनिश्चित करनी थी जिनकी संख्या अनुश्रुति के अनुसार 84 बताई जाती है और जो दिखाई नहीं देते। तो इस कार्य को सम्पन्न करने का बीड़ा 1980 में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण ने उठया और मंदिरों की खोज आरम्भ करदी। अब तक वे 18 प्राचीन टीलों को खोज निकालने में क़ामयाब रहे हैं। मार्च 1999 में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण एक ऐसे टीले को खोजने में सफल हुआ जो कि अ‍गर ध्वस्त न हुआ होता तो वह खजुराहो का सबसे बड़ा मंदिर होता। इस का नाम है बीजमंडल और आश्चर्यजनक बात यह है कि यह कंदारिया महादेव मंदिर से चार मीटर बड़ा है।

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हिंदुत्व: धर्म या जीवन पद्धति
                                       धर्म ही सिखाता है कैसे जीएँ

हिंदुत्व के चार सिद्धांत (पुरुषार्थ):- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।

तर्क का काम वेश्याओं की तरह होता है। जिनके पास ताकत होती है उनका तर्क चलता है फिर भले ही वे कुतर्क कर रहे हों। तर्क से अच्छे को बुरा और बुरे को अच्छा सिद्ध किया जा सकता है। तर्क के आगे तथ्‍य और तत्व कमजोर सिद्ध होता आया है।

यदि यह कहा जाए कि हिंदुत्व धर्म है और धर्म से ही जीवन पद्धति मिलती है तो इसके खिलाफ तर्क जुटाए जा सकते हैं और यह कहा जाए कि हिंदुत्व धर्म नहीं जीवन पद्धति है, तो फिर इसके खिलाफ भी तर्क जुटाए जा सकते हैं। किंतु शास्त्र कहते हैं कि धर्म की बातें तर्क से परे होती हैं। बहस से परे होती हैं।

हिंदू धर्मग्रंथ को पढ़कर समझने वाले ही धर्म को जानते हैं और फिर उस पर किसी भी प्रकार की टिप्पणी करने, बहस करने से कतराते हैं। करते भी हैं तो कहते हैं कि ऐसा वेद, उपनिषद या गीता में लिखा है, यह मेरा मत नहीं है। धर्म पर किसी भी प्रकार की बहस नहीं होती। बहस करने वाले लोग अधूरे ज्ञान के शिकार होते हैं। अधूरा ज्ञान गफलत पैदा करता है।

हिंदुत्व को लेकर मनमानी व्याख्याओं और टिप्पणियों का दौर बहुत समय से रहा है। वर्तमान में आरएसएस और भाजपा में इसको लेकर गफलत की स्थिति है। आरएसएस के मुखिया अपने शिविरों में हिंदुत्व की परिभाषा व्यक्त करते रहते हैं। उनकी परिभाषा गोलवरकरजी और हेडगेवारजी से निकलती है।

सर संघचालक मोहन भागवत ने संघ मुख्यालय पर एक महीने तक चले प्रशिक्षण शिविर के समापन समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि हिन्दुत्व कोई धर्म नहीं, बल्कि जीवन पद्धति है।

इससे यह प्रतिध्वनित होता है कि इस्लाम, ईसाइयत, बौद्ध और जैन सभी धर्म है। धर्म अर्थात आध्यात्मिक मार्ग, मोक्ष मार्ग। धर्म अर्थात जो सबको धारण किए हुए हो। यह अस्तित्व और ईश्वर है। लेकिन हिंदुत्व तो धर्म नहीं है। जब धर्म नहीं है तो उसके कोई पैगंबर और अवतारी भी नहीं हो सकते। उसके धर्मग्रंथों को फिर धर्मग्रंथ कहना छोड़ो, उन्हें जीवन ग्रंथ कहो। गीता को धर्मग्रंथ मानना छोड़ दें? भगवान कृष्ण ने धर्म के लिए युद्ध लड़ा था कि जीवन के लिए?

जहाँ तक हम सभी धर्मों के धर्मग्रंथों को पढ़ते हैं तो पता चलता है कि सभी धर्म जीवन जीने की पद्धति बताते हैं। यह बात अलग है कि वह पद्धति अलग-अलग है। फिर हिंदू धर्म कैसे धर्म नहीं हुआ? धर्म ही लोगों को जीवन जीने की पद्धति बताता है, अधर्म नहीं। क्यों संत-महात्मा गीताभवन में लोगों के समक्ष कहते हैं कि ‘धर्म की जय हो-अधर्म का नाश हो’?

भ्रमित हिंदूजन :पिछले 10-15 वर्षों में हिंदुत्व को लेकर व्यावसायिक संतों, ज्योतिषियों और धर्म के तथाकथित संगठनों और राजनीतिज्ञों ने हिंदू धर्म के लोगों को पूरी तरह से गफलत में डालने का जाने-अनजाने भरपूर प्रयास किया जो आज भी जारी है।

भ्रमित समाज लक्ष्यहीन हो जाता है। लक्ष्यहीन समाज में मनमाने तरीके से परम्परा का जन्म और विकास होता है, जो कि होता आया है। मनमाने मंदिर बनते हैं, मनमाने देवता जन्म लेते हैं और पूजे जाते हैं। मनमानी पूजा पद्धति, चालीसाएँ, प्रार्थनाएँ विकसित होती हैं। व्यक्ति पूजा का प्रचलन जोरों से पनपता है। भगवान को छोड़कर संत, कथावाचक या पोंगा पंडितों को पूजा जाता है।

आए दिन धर्म का मजाक उड़ाया जाता है, मसलन कि किसी ने लिख दी लालू चालीसा, किसी ने बना दिया अमिताभ का मंदिर। भगवत गीता को पढ़ने के अपने नियम और समय हैं किंतु अब तो कथावाचक चौराहों पर हर माह भागवत कथा का आयोजन करते हैं। यज्ञ के महत्व को समझे बगैर वेद विरुद्ध यज्ञ किए जाते हैं।

आचार्यों को अधिकार : धर्म पर बोलने का अधिकार सिर्फ उसे है तो आचार्य है। आचार्य वह होता है जो विधिवत रूप से हिंदू साधु सम्प्रदाय में दीक्षा लेकर धर्मग्रंथ अध्ययन और साधना करता है और फिर वह क्रमश: आगे बढ़कर आचार्य कहलाता है। हिंदू धर्म में भी साधुओं को श्रेणीबद्ध किया गया है। परमहंस की पदवी सबसे ऊपर मानी गई है। जो परमहंस होता है उसका वचन ही धर्म होता है। कथावाचकों और आमजन को अधिकार नहीं कि वे धर्म पर टिप्पणी करें।

वेद, उपनिषद और गीता में जो लिखा है आप उसे वैसा का वैसा ही कह सकते हैं लेकिन उस पर व्याख्या या टिप्पणी करने का अधिकार किसे है, इसके लिए भी शास्त्र मार्ग बताते हैं। फिर भी जो मनमानी व्याख्या या टिप्पणी करता है तो उसे रोकने का कोई उपाय नहीं, क्योंकि हिंदू धर्म हिंसक मार्ग नहीं बताता।

जीवन जीने की पद्धति : क्या आप मानते हैं कि ऑर्ट ऑफ लिविंग धर्म का हिस्सा नहीं है, जबकि धर्म ही बताता है जीवन को सही तरीके से जीने की पद्धति। क्या ध्यान और योग धर्म का हिस्सा नहीं है? धर्म और जीवन कैसे एक-दूसरे से अलग हो सकते हैं, जबकि हिंदू धर्म में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष अर्थात संसार और संन्यास का मार्ग विकसित किया गया है। उक्त सिद्धांत के आधार पर ही चार आश्रम विकसित किए गए थे।

भगवान राम की वंश परंपरा

हिंदू धर्म में राम को विष्णु का सातवाँ अवतार माना जाता है। वैवस्वत मनु के दस पुत्र थे- इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध। राम का जन्म इक्ष्वाकु के कुल में हुआ था। जैन धर्म के तीर्थंकर निमि भी इसी कुल के थे।

मनु के दूसरे पुत्र इक्ष्वाकु से विकुक्षि, निमि और दण्डक पुत्र उत्पन्न हुए। इस तरह से यह वंश परम्परा चलते-चलते हरिश्चन्द्र रोहित, वृष, बाहु और सगर तक पहुँची। इक्ष्वाकु प्राचीन कौशल देश के राजा थे और इनकी राजधानी अयोध्या थी।

रामायण के बालकांड में गुरु वशिष्ठजी द्वारा राम के कुल का वर्णन किया गया है जो इस प्रकार है:- ब्रह्माजी से मरीचि का जन्म हुआ। मरीचि के पुत्र कश्यप हुए। कश्यप के विवस्वान और विवस्वान के वैवस्वतमनु हुए। वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था। वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था। इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुल की स्थापना की।

इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए। कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था। विकुक्षि के पुत्र बाण और बाण के पुत्र अनरण्य हुए। अनरण्य से पृथु और पृथु और पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ। त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए। धुन्धुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था। युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए और मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ। सुसन्धि के दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित। ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुए।

भरत के पुत्र असित हुए और असित के पुत्र सगर हुए। सगर अयोध्या के बहुत प्रतापी राजा थे। सगर के पुत्र का नाम असमंज था। असमंज के पुत्र अंशुमान तथा अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए। दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए। भगीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतार था। भगीरथ के पुत्र ककुत्स्थ और ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए। रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम रघुवंश हो गया। तब राम के कुल को रघुकुल भी कहा जाता है।

रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए। प्रवृद्ध के पुत्र शंखण और शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए। सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था। अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग और शीघ्रग के पुत्र मरु हुए। मरु के पुत्र प्रशुश्रुक और प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए। अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था। नहुष के पुत्र ययाति और ययाति के पुत्र नाभाग हुए। नाभाग के पुत्र का नाम अज था। अज के पुत्र दशरथ हुए और दशरथ के ये चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हैं। वा‍ल्मीकि रामायण- ॥1-59 से 72।।

आज़ाद भारत???

मित्रों मुझे तो अभी शंका ही है कि भारत आज़ाद है
क्यों कि भारत आज़ाद होता तो यहाँ किसी विदेशी के आने पर उससे पासपोर्ट और वीजा माँगा जाना चाहिए, किन्तु १९९७ में ब्रिटेन की महारानी एलिजाबैथ के भारत आने पर पासपोर्ट नहीं लगा था वह बिना पासपोर्ट के भारत आई थी
१९४७ से पहले जब कोई ब्रीटिश अधिकारी या महारानी का भारत आना होता था तब उनसे पासपोर्ट पूछने वाला कोई नहीं था क्यों कि उस समय भारत इंग्लैण्ड का एक उपनिवेश था
किन्तु आज तो हम शायद भारत को आज़ाद कहते हैं न?

मित्रों आपको पता होगा कि आज के समय में जब चुनाव के बाद कोई दूसरी पार्टी सत्ता में आती है तो शपथ ग्रहण समारोह के बाद नया प्रधान मंत्री एक कागज़ पर हस्ताक्षर करता है जिसे सत्ता का हस्तांतरण कहते हैं, और उस पर हस्ताक्षर करने के बाद पुरानी पार्टी को देश निकाला नहीं दिया जाता, उसे भी भारत में सामान अधिकार के साथ जीने का हक़ दिया जाता है क्यों कि उस पार्टी के नेता भी भारत के संविधान में भारत के नागरिक हैं, अत: जो अधिकार एक साधारण भारतीय के हैं वे पुरानी पार्टी के नेता के भी हैं क्यों कि हम आज़ाद हैं
मित्रों १९४७ में भी नेहरु ने उसी कागज़ (सत्ता का हस्तांतरण) पर हस्ताक्षर किया था और हमें यह बताया गया था कि अब हम अंग्रेजों से आज़ाद हो गए हैं तो अब महारानी को यह विशेषाधिकार क्यों दिया गया? मतलब महारानी आज भी भारत की नागरिक है, कौनसे क़ानून के अनुसार? १८९७ के Indian Citizenship Act के अनुसार
यह बात आपको लेख में कहीं समझ आ जाएगी

१९४६ में अंगेजों ने भारत को आज़ाद करने से पहले एक क़ानून बनाया था जिसका नाम है Indian independence Act. मित्रों आप में से कूछ राष्ट्रवादी यह बात जानते होंगे कि भारत और पाकिस्तान का विभाज़न हिन्दू या मुसलामानों की तरफ से नहीं अंग्रेजों की तरफ से हुआ था
अंग्रेजों द्वारा बनाए गए Indian independence Act में दो बातें हैं जो मै आपके सामने रखना चाहता हूँ

1. Two independent dominions India and Pakistan shall be set up in India.

2. Both dominions will be completely self governing in their internal affairs, foreign affairs and national security, but the British monarch will continue to be their head of state represented by the Governor General of India and a new Governor General of Pakistan.

मित्रों सबसे ज्यादा आपतिजनक ये दो बिंदु हैं, जिनमे साफ़ साफ़ लिखा है कि अंग्रेजों के जाने के बाद भारत और पाकिस्तान दो Dominion States होंगे
मित्रों Dominion States का अर्थ कहीं से भी पता कर लो इसका अर्थ होता है एक बड़े राज्य के अधीन छोटे राज्य अर्थात भारत और पाकिस्तान आज भी ब्रिटेन के Dominion States हैं न कि Independent Nations. मित्रों Indian independence Act बाज़ार में शायद दस रुपये का मिलता है आप चाहें तो उसे खरीद कर पढ़ सकते हैं
पूरा क़ानून न भी पढ़ें केवल उसकी प्रस्तावना पढ़ लें आपको पता चल जाएगा कि क्यों ब्रिटेन की महारानी का नाम भारत के राष्ट्रपति से ऊपर लिखा जाता है? और आप में से शायद कुछ यह जानते होंगे कि आज भी Comman Wealth Contries में भारत और पाकिस्तान का नाम as a British Dominion States के रूप में लिखा हुआ है न कि as a Indian and Pakistan Republic, मतलब हम आज भी महारानी के Dominion States हैं
कहीं उसी क़ानून के अनुसार तो महारानी भारत में बिना पासपोर्ट के तो नहीं आई थी?

मित्रों यह एक बहुत ही गंभीर प्रश्न है जिसे आज़ादी से पहले ही नेहरु द्वारा उठाया जाना चाहिए था किन्तु नेहरु ने तो इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिया
क्यों कि नेहरु एक सत्ता का भूखा आदमी था जो बड़ी ही चालाकी से भारत का प्रधान मंत्री बना
उसकी चालाकी के सम्बन्ध में मै आपको कुछ बताना चाहता हूँ
मित्रों आज़ादी से पहले Congress Working Committee की एक बैठक हुई थी जिसमे यह निर्णय लिया गया था कि नेहरु और सरदार पटेल के नाम पर कांग्रेस के सभी प्रदेश अध्यक्षों द्वारा चुनाव होगा और जिसके पक्ष में सबसे अधिक वोट पड़ेंगे वही कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष पद संभालेगा और वही आज़ाद भारत का पहला प्रधान मंत्री होगा
उस समय भारत में कांग्रेस के १५ प्रदेश अध्यक्ष थे जिनमे से १४ ने सरदार पटेल के समर्थन में अपना मत दिया था केवल एक मत नेहरु के पक्ष में था
क्यों कि कांग्रेस में नेहरु को पसंद नहीं किया जाता था, और पसंद इसलिए नहीं किया जाता था क्यों कि नेहरु चरस पीता था, नेहरु सिगरेट पीता था, नेहरु एक ऐयाश व्यक्ति था, नेहरु एक चरित्रहीन व्यक्ति था
माउंट बैटन की पत्नी से उसके सम्बन्ध छिपे नहीं हैं
आप चित्र देख सकते हैं
तो मित्रों Congress Working Committee के निर्णय के आधार पर सरदार पटेल जीत गए और नेहरु हार गया
और इसी निर्णय के आधार पर सरदार पटेल को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना तय हुआ और आज़ाद भारत का पहला प्रधान मंत्री भी सरदार पटेल को बनाना तय हुआ था
उस समय नेहरु की गद्दारी की एक घटना मै आपके सामने रखना चाहता हूँ
जिस व्यक्ति को हम जीवन भर चाचा नेहरु कहते रहे उसकी गद्दारी मुझे भी नहीं पता थी

मित्रों जैसा कि आप ने अभी पढ़ा कि कांग्रेस में नेहरु को कोई पसंद नहीं करता था किन्तु नेहरु को पसंद करने वालों में सबसे ऊपर थे अंग्रेज़ और उन्ही अंग्रेजों का नुमाइंदा माउंट बैटन
माउंट बैटन को भारत भेजने का मुख्य कारण ही यह था कि अंग्रेज़ नेहरु को फाँसना चाहते थे और यह काम किया माउंट बैटन और उसकी पत्नी ने
नेहरु कोई जन नेता नहीं था उसे तो अंग्रेजों ने मीडिया द्वारा प्रचारित किया और उसकी उज्वल छवि बनानी चाहि क्यों कि सभी अंग्रेज़ नेहरु के बारे में कहा करते थे कि यह आदमी शरीर से भारतीय है किन्तु इसकी आत्मा बिल्कुल अंग्रेज़ है, अंग्रेज़ भारत छोड़ भी दें तो नेहरु अंग्रेजों का शासन और उनके क़ानून भारत में चलाता रहेगा और भारत हमेशा के लिये British Domenion State बनकर रहेगा
चुनाव हारने के बाद जब नेहरु को लगा कि अब मेरी दाल नहीं गलने वाली तो वह गांधी जी के पास गया और उन्हें धमकाया कि अगर मै प्रधान मंत्री नहीं बना तो मै कांग्रेस में फूट दाल दूंगा
और उस समय गांधी जी शायद अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल की
क्यों कि गांधी जी को लगा कि अगर कांग्रेस में फूट पड़ी तो अंग्रेजों को भारत ना छोड़ने का एक बहाना मिल जाएगा कि हम किस कांग्रेस के हाथ में सत्ता सौंपें, नेहरु वाली या सरदार पटेल वाली? और इसी कारण गांधी जी ने अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल की और सरदार पटेल को एक पत्र लिखा और उसमे गांधी जी ने पटेल से अपना नाम प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार से वापस लेने की प्रार्थना की
और यह पत्र आप चाहें तो देख सकते हैं
गांधी वांग्मय के सौ अंक हैं जो भारत सरकार ने छापे और इनमे से अंतिम कुछ अंकों के आधार पर गांधी जी के सचीव कहे जाने वाले प्यारे मोहन ने एक किताब लिखी जिसका नाम है पूर्ण आहूति इस किताब में गांधी जी का यह पत्र भी है
पत्र पढने के बाद सरदार पटेल खुद गांधी जी के पास गए और उनसे कहा कि “बापू अगर आपकी अंतरात्मा कहती है तो मै तो आपका सेवक हूँ और यह पद मै नेहरु के लिये छोड़ सकता हूँ
” और सरदार पटेल ने दरियादिली दिखाते हुए आज़ाद भारत का पहला प्रधान मंत्री बनने का सौभाग्य छोड़ दिया और उसे हथिया लिया नेहरु ने
और उसी के बाद भारत पाकिस्तान के विभाज़न की बात सामने आई है, सरदार पटेल यदि प्रधान मंत्री होते तो ऐसा कभी नहीं होने देते क्यों कि भारत की छोटी छोटी रियासतों को एक करने का काम पटेल ने ही किया था और कश्मीर का विलय भी भारत में पटेल ने ही किया किन्तु नेहरु ने वहां भी टांग अडाई और कश्मीर में धारा ३७० लागू नहीं हुई
और उसी के कारण आज आधा कश्मीर पाकिस्तान के कब्ज़े में है, लद्दाख का कुछ भाग और तिब्बत आज चीन के कब्ज़े में है

और मित्रों आपमें से कूछ यह भी जानते होंगे कि कांग्रेस पार्टी एक अंग्रेज़ द्वारा ही बनाई गयी थी

सन १८८५ में मुंबई (उस समय बम्बई) में गोकुल दास तेजपाल भवन में Allan Octavian Hume द्वारा कांग्रेस पार्टी की स्थापना हुई थी
और यह पार्टी एक मनोरंजन क्लब के रूप में स्थापित की गयी थी
अंग्रेज कांग्रेस के बारे में कहा करते थे कि इस क्लब में हम उन भारतीयों को जमा करेंगे जिनके मन में कूछ बलबला है अर्थात देश को आज़ाद करवाने की इच्छा है, ताकि वह बलबला फूट कर कांग्रेस पार्टी में ही बाहर आ जाए, बाहर न जाने पाए
और इसीलिए अंग्रेज़ कांग्रेस को सेफ्टी वॉल्व कहा करते थे
वो तो सौभाग्य था देश का जो गांधी जी दक्षिण अफ्रीका से भारत आये
उनसे पहले तो कोई जानता तक नहीं था कि कांग्रेस जैसी कोई चीज़ भारत में है, गांधी जी ने इसमें प्राण फूंके, गांधी जी ने अन्न्ग्रेजों द्वारा बनाए गए इस क्लब को जन आन्दोलन का रूप दिया और बाद में खुद गांधी जी ने ही इस पार्टी से किनारा कर लिया, उन्होंने आजीवन कांग्रेस पार्टी का त्याग कर दिया
गांधी जी कांग्रेस पार्टी के सदस्य ही नहीं रहे थे
और अंतिम क्षणों में गांधी जी ने यहाँ तक कह डाला था कि इस कांग्रस को खत्म कर दो नहीं तो यह पार्टी देश को ऐसे ही लूटेगी जैसे कि अंग्रेजों ने लूटा है, क्यों कि गांधी जी नेहरु जैसों की नीयत भांप चुके थे
मित्रों गांधी जी की यह भविष्यवाणी भी सत्य सिद्ध हुई, घोटालों के रिकॉर्ड इस पार्टी ने पिछले ६३ वर्षों में कायम किये और ताज़ा तरीन मामला आप राष्ट्र मंडल खेलों का भी ले सकते हैं
नेहरु ने कांग्रेस को अपने बाप की जागीर बना डाला और इसी की संतानों ने देश को
वरना क्या वजह थी कि कांग्रेस पार्टी को प्रधान मंत्री के पद के लिये अपने घर के बाहर उम्मीदवार ही नहीं मिले
और जो मिले उन्हें खुद कांग्रेस ने ही ख़त्म कर डाला
लाल बहादुर शास्त्री का उदाहरण आप देख सकते हैं
क्यों कि इनकी जड़ तो नेहरु ही था

और आप जानते होंगे कि १४ अगस्त १९४७ की रात गांधी जी दिल्ली ही नहीं आये, वे नोआखाली में थे….
कांग्रेस के बड़े बड़े नेता गांधी जी को बुलाने गए किन्तु उन्होंने मन कर दिया और कहा कि मै मानता नहीं कि आज़ादी जैसी कोई चीज़ इस देश में आ रही है
यह केवल सत्ता के हस्तांतरण का सौदा हुआ है
गांधी जी ने नोआखाली से ही एक Press Statement दिया था जो कि पूर्ण आहुति में छपा भी था कि “यह जो कथित आज़ादी आ रही है यह हमारा लक्ष्य नहीं था, यह आज़ादी मै नहीं चाहता था, ये तो सत्ता के लालची लोग ले कर आये हैं
” वरना क्या कारण था कि भारत की आज़ादी की क्रांति का सबसे बड़ा पुरोधा ही आज़ादी के जश्न में शामिल नहीं हुआ? क्यों कि सत्ता के हस्तांतरण पर नेहरु ने हस्ताक्षर किया था और भारत को एक British Domenion State बना डाला था
माउन्ट बैटन ने अपनी सत्ता नेहरु को सौंपी थी और हमें समझाया गया कि स्वराज आ गया है, किन्तु यह स्वराज नहीं था और शायद यही समझाने महारानी का भारत में आगमन बिना पासपोर्ट और वीजा के हुआ कि तुम अभी भी मेरे गुलाम ही हो………

😦