Five life lessons my driver taught me
Prakash Iyer

He is MD, Kimberly-Clark Lever and Executive Coach. Iyer’s book ‘The Habit of Winning’ will be released in February 2011

He is 58 years old, bespectacled with distinguished silver grey hair. He’s spent 25 years working for one of India’s most respected corporate houses. I have learnt a lot from him. But it is unlikely you would have ever heard of him. His name is Karunan. And he worked with me as my driver.
Sometimes, the biggest lessons in life come from very unlikely sources. And as Karunan spoke to me one morning about his life and times, I thought young people would benefit from listening to what he has to say. Since Karunan will probably never be invited to deliver a convocation speech or a commencement.

1. Getting a driving license does not make you a driver.
“I was 18 when I got my license. But it was only after several months of driving a car that I actually learnt to drive, and became a real driver.” A license is only a permit — and not a stamp of authority. An MBA does not make you a manager. It is only after you spend several more years learning on the job that you truly qualify to call yourself a manager.
Many young people confuse getting a degree as signifying the end of their learning. Wrong. It’s just the beginning. A degree or a diploma — the licence — simply marks you out as someone qualified to learn from real life experiences. It doesn’t make you an expert.



2. The real world is very different from a classroom

I learnt to drive a car. But my first job required me to drive a little tempo. The steering wheel was different, and so were the gears. I thought I knew how to drive — but I couldn’t even get the tempo started.”

The world outside the classroom is a very different place. That’s as true for engineers and MBAs and accountants as it is for drivers. Get ready to get surprised.



3. Slog. Get your hands dirty

I spent nights working as a cleaner. That’s when I learnt all about the insides of an automobile. Knowing what’s under the bonnet has made me a better driver today.”

The brightest marketing professionals in the country will tell you that they learnt their biggest lessons in the days they spent slogging in small towns selling soaps or colas. There’s no other way. If you want to be successful, work hard, dirty your hands — and go beyond your specific role.

4. Initially, what you learn is more important than what you earn

In my first job, the pay was bad but the boss was good. He gave me opportunities to learn, make mistakes. I banged his tempo quite a bit. While the dents were quickly repaired, the lessons I learnt remain firmly etched in my mind.”

In your first job — don’t worry about pay packet or the size of the organisation. Get a good boss. A good mentor. That’s priceless

5. Don’t worry about which car you drive. Focus on being a good driver.

I always wanted to drive the best cars — but rather than complain about having to drive a tempo or a school van or the city transport bus, I focused on driving well. I told myself that if I do that, the good cars will come. And they did.”

Now that’s a great lesson. It’s not about the company. It’s about you. Do the best with what you have, wherever you are. Karunan spent 15 years struggling in odd jobs before landing a driver’s job in one of India’s largest companies. We could all benefit by staying focused on doing a great job — rather than worrying about the next job, or the next promotion. Do a good job. Success and happiness will follow. Inevitably.

Those then are five fabulous life lessons from an unlikely guru. Follow Karunan’s advice and I guarantee they’ll make a difference to your career. And to your life!

यहूदी धर्म को जानें 

                                                                                                       प्राचीन धर्मों में से एक

आज से करीब 4000 साल पुराना यहूदी धर्म वर्तमान में इजराइल का राजधर्म है। दुनिया के प्राचीन धर्मों में से एक यहूदी धर्म से ही ईसाई और इस्लाम धर्म की उत्पत्ति हुई है। यहूदी एकेश्वरवाद में विश्वास करते हैं। मूर्ति पूजा को इस धर्म में पाप समझा जाता है।
अब्राहम : यहूदी धर्म की शुरुआत पैगंबर अब्राहम (अबराहम या इब्राहिम) से मानी जाती है, जो ईसा से 2000 वर्ष पूर्व हुए थे। पैगंबर अलै. अब्राहम के पहले बेटे का नाम हजरत इसहाक अलै. और दूसरे का नाम हजरत इस्माईल अलै. था। दोनों के पिता एक थे, किंतु माँ अलग-अलग थीं। हजरत इसहाक की माँ का नाम सराह था और हजरत इस्माईल की माँ हाजरा थीं।
पैगंबर अलै. अब्राहम के पोते का नाम हजरत अलै. याकूब था। याकूब का ही दूसरा नाम इजरायल था। याकूब ने ही यहूदियों की 12 जातियों को मिलाकर एक सम्मिलित राष्ट्र इजरायल बनाया था।

याकूब के एक बेटे का नाम यहूदा (जूदा) था। यहूदा के नाम पर ही उसके वंशज यहूदी कहलाए और उनका धर्म यहूदी धर्म कहलाया। हजरत अब्राहम को यहूदी, मुसलमान और ईसाई तीनों धर्मों के लोग अपना पितामह मानते हैं। आदम से अब्राहम और अब्राहम से मूसा तक यहूदी, ईसाई और इस्लाम सभी के पैगंबर एक ही है किंतु मूसा के बाद यहूदियों को अपने अगले पैंगबर के आने का अब भी इंतजार है।

यहोवा : यहूदी अपने ईश्वर को यहवेह या यहोवा कहते हैं। यहूदी मानते हैं कि सबसे पहले ये नाम ईश्वर ने हजरत मूसा को सुनाया था। ये शब्द ईसाईयों और यहूदियों के धर्मग्रंथ बाइबिल के पुराने नियम में कई बार आता है।

धर्मग्रंथ : यहूदियों की धर्मभाषा ‘इब्रानी’ (हिब्रू) और यहूदी धर्मग्रंथ का नाम ‘तनख’ है, जो इब्रानी भाषा में लिखा गया है। इसे ‘तालमुद’ या ‘तोरा’ भी कहते हैं। असल में ईसाइयों की बाइबिल में इस धर्मग्रंथ को शामिल करके इसे ‘पुराना अहदनामा’ अर्थात ओल्ड टेस्टामेंट कहते हैं। तनख का रचनाकाल ई.पू. 444 से लेकर ई.पू. 100 के बीच का माना जाता है।

मूसा (मोजेस) : ईसा से लगभग 1,500 वर्ष पूर्व अबराहम के बाद यहूदी इतिहास में सबसे बड़ा नाम ‘पैगंबर मूसा’ का है। मूसा ही यहूदी जाति के प्रमुख व्यवस्थाकार हैं। मूसा को ही पहले से ही चली आ रही एक परम्परा को स्थापित करने के कारण यहूदी धर्म का संस्थापक माना जाता है।

दस आदेश : मूसा मिस्र के फराओ के जमाने में हुए थे। ऐसा माना जाता है कि उनको उनकी माँ ने नील नदी में बहा दिया था। उनको फिर फराओ की पत्नी ने पाला था। बड़े होकर वे मिस्री राजकुमार बने। बाद में मूसा को मालूम हुआ कि वे तो यहूदी हैं और उनका यहूदी राष्ट्र त्याचार सह रहा है और यहाँ यहूदी गुलाम है तो उन्होंने यहूदियों को इकठ्ठाकर उनमें नई जाग्रती लाई।

मूसा को ईश्वर द्वारा दस आदेश मिले थे। मूसा का एक पहाड़ पर परमेश्वर से साक्षात्कार हुआ और परमेश्वर की मदद से उन्होंने फराओ को हराकर यहूदियों को आजाद कराया और मिस्र से पुन: उनकी भूमि इसराइल में यहूदियों को पहुँचाया। इसके बाद मूसा ने इसराइल में इस्राइलियों को ईश्वर द्वारा मिले ‘दस आदेश’ दिए जो आज भी यहूदी धर्म के प्रमुख सैद्धांतिक है।

सुलेमान : अब्राहम और मूसा के बाद दाऊद और उसके बेटे सुलेमान को यहूदी धर्म में अधिक आदरणीय माना जाता है। सुलेमान के समय दूसरे देशों के साथ इजरायल के व्यापार में खूब उन्नति हुई। सुलेमान का यदूदि जाति के उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 37 वर्ष के योग्य शासन के बाद सन 937 ई.पू. में सुलेमान की मृत्यु हुई।

यहूदी त्योहार : शुक्कोह, हुनक्का, पूरीम, रौशन-शनाह, पासओवर, योम किपुर।

यरुशलम : येरुशलम इसराइल देश की विवादित राजधानी है। इस पर यहूदी धर्म, ईसाई धर्म और इस्लाम धर्म, तीनों ही दावा करते हैं, क्योंकि यहीं यहूदियों का पवित्र सुलैमानी मन्दिर हुआ करता था, जो अब एक दीवार मात्र है। यही शहर ईसा मसीह की कर्मभूमि रहा है। यहीं से हजरत मुहम्मद स्वर्ग गए थे। इसीलिए यह विवाद का केंद्र है। लेकिन असल में येरुशलम प्राचीन यहूदी राज्य का केंद्र और राजधानी रहा है। यही पर मूसा ने यहूदियों को धर्म की शिक्षा दी थी।

अन्य पैंगबर : आदम, अब्राहम के अलावा मान्यता है कि राजा ‘मनु’ को ही यहूदियों ने ‘नूह’ माना है। नूह ने ईश्वर के आदेश पर जल प्रलय के समय बड़ी-सी किश्ती बनाई थी और उसमें सृष्टि के सभी प्राणियों को रखकर सृष्टि को बचाया था। राजा मनु की कहानी भी ऐसी ही है।.see my blog (JAN,2011)

महान यहूदी : ईसा मसीह के बाद कलाकार एंजेलो, चित्रकार पाब्लो पिकासो, कार्ल मार्क्स और अल्बर्ट आइंसटीन के अलावा ऐसे सैकड़ों प्रसिद्ध यहूदी हुए हैं जिनका विज्ञान और व्यापार में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। यहूदियों द्वारा मानव समाज के विकास में जो योगदान किया गया है उसे भूला नहीं जा सकता।

यहूदी इतिहास : यहूदी धर्म का इतिहास करीब 4000 साल पुराना माना जाता है। कहते हैं कि मिस्र के नील नदी से लेकर इराक के दजला-फरात नदी के बीच आरंभ हुआ यहूदी धर्म का इजराइल सहित अरब के अधिकांश हिस्सों पर राज था। मूसा से लेकर सुलेमान तक प्राचीन समय में ही यहूदियों का ‘भारत’ से गहरा संबंध रहा है इस बात के कई प्रमाण है।

मिस्र पर कुछ समय तक यदुवंशियों का भी राज रहा था। वैसे इसका प्रचीन धर्म इजिप्ट था। ऐसा माना जाता है कि पहले यहूदी मिस्र के बहुदेववादी इजिप्ट धर्म के राजा फराओ के शासन के अधिन रहते थे। बाद में मूसा के नेतृत्व में वे इजरायल आ गए। ईसा के 1100 साल पहले जैकब की 12 संतानों के आधार पर अलग-अलग यहूदी कबीले बने थे, जो दो गुटों में बँट गए। पहला 10 कबीलों का बना था वह इजरायल कहलाया और दूसरा जो बाकी के दो कबीलों से बना था वह जुडाया कहलाया। जुडाया पर बेबीलन का अधिकार हो गया। बाद में ई.पू. सन् 800 के आसपास यह असीरिया के अधीन चला गया। असीरिया प्राचीन मेसोपोटामिया का एक साम्राज्य था, जो यह दजला नदी के उपरी हिस्से में बसा था। 10 कबीलों का क्या हुआ पता नहीं चला।

फारस के हखामनी शासकों ने असीरियाइयों को ई.पू. 530 तक हरा दिया तो यह क्षेत्र फारसी शासन में आ गया। यूनानी विजेता सिकन्दर ने जब दारा तृतीय को ई.पू. 330 में हराया तो यहूदी लोग ग्रीक शासन में आ गए। सिकन्दर की मृत्यु के बाद सेल्यूकस के साम्राज्य और उसके बाद रोमन साम्राज्य के अधीन रहने के बाद ईसाईयत का उदय हुआ। इसके बाद यहूदियों को यातनाएँ दी जान लगी।

7वीं सदी में इस्लाम के आगाज के बाद यहूदियों की मुश्किलें और बड़ गई। तुर्क और मामलुक शासन के समय यहूदियों को इजराइल से पलायन करना पड़ा। अंतत: यहूदियों के हाथ से अपना राष्ट्र जाता रहा। मई 1948 में इजराइल को फिर से यहूदियों का स्वतंत्र राष्ट्र बनाया गया। दुनिया भर में इधर-उधर बिखरे यहूदी आकर इजरायली क्षेत्रों में बसने लगे। वर्तमान में अरबों और फिलिस्तिनियों के साथ कई युद्धों में उलझा हुआ है एकमात्र यहूदी राष्ट्र इजरायल।

भारतीय संस्कृति और हज

* ‘अयोध्या’ का अर्थ होता है वह जगह जहाँ युद्ध, लड़ाई व झगड़ा न हो, शांति हो। यदि देखें तो मक्का स्थित काबा शरीफ का हरम भी अयोध्या ही है। वहाँ लड़ाई-झगड़ा नहीं होता। बाप का हत्यारा भी सामने आ जाए तो वहाँ बदला नहीं ले सकते। झाड़, फूल-पत्ती व काँटे तोड़ना मना है।

शिकार खेलना, शिकार की ओर इशारा करना भी मना है। किसी भी जीव-जंतु को मारना मना है। सर की जूँ भी नहीं मार सकते। एहराम की हालत में ये सारी बातें वर्जित होती हैं। एहराम का कपड़ा, जो एक लुंगी और ऊपर एक कपड़ा लपेटा जाता है, है। इसी तरह भारतीय संस्कृति में भी बिना सिला कपड़ा पहनने की परंपरा है। दोनों में कितनी समानता है।

* पैर के खड़ाऊ में पैर ऊपर से खुला रहता है। वहाँ भी हाजी जो चप्पल पहनते हैं, उसमें भी पैर ऊपर से खुला रहता है।

‘अयोध्या’ का अर्थ होता है वह जगह जहाँ युद्ध, लड़ाई व झगड़ा न हो, शांति हो। यदि देखें तो मक्का स्थित काबा शरीफ का हरम भी अयोध्या ही है। वहाँ लड़ाई-झगड़ा नहीं होता। बाप का हत्यारा भी सामने आ जाए तो वहाँ बदला नहीं ले सकते। झाड़, फूल-पत्ती तोड़ना मना हैं।

* हमारे देश के सारे मंदिरों का प्रवेश द्वार पूर्व की ओर है। पूजा करते समय पुजारी का मुँह पश्चिम की ओर होता है। नमाजी नमाज पढ़ता है तो उसका मुँह भी उसी ओर रहता है। धर्मप्रेमी लोगों के लिए ये विचारणीय मुद्दे हैं। भारत और अरब के लोगों के संबंध बहुत पुराने हैं।

* हज के लिए सारे इंसानों को कोई बाधा और रोक-टोक नहीं। वहाँ का वीजा केवल यह है कि इंसान अपने प्रभु को एक मान ले। उसके अंतिम पैगम्बर हजरत मोहम्मद सल्ल. (उन पर ईश्वर की कृपा की वर्षा हो) पर विश्वास कर ले। ये शर्तें इतनी सहज और सरल हैं कि तनिक निष्पक्ष विचार से समझी जा सकती हैं।

* मुसलमान जब पवित्र काबा की परिक्रमा करते हैं तो जिस कोने से यह तवाफ (परिक्रमा) शुरू करते हैं, वहाँ कोने पर एक काला पत्थर लगा है। यह मान्यता है कि यह पत्थर जन्नत से लाकर यहाँ लगाया गया था। यह केवल एक पत्थर है।
इस्लाम के दूसरे खलीफा हजरत उमर (रजि.) ने एक बार इस पत्थर की ओर इशारा करके कहा था- ‘मैं खूब जानता हूँ कि तू सिर्फ एक पत्थर है। तेरे बस में न किसी का नुकसान है और न नफा। अगर मैं रसूल अल्लाह सल्ल. को तुझे बोसा (चुंबन) देते न देखता तो मैं तुझे कभी बोसा न देता।’

राजा मनु और  नूह…

हमने पढ़ा है कि राजा मनु को ही हजरत नूह माना जाता हैं। नूह ही यहूदी, ईसाई और इस्लाम के पैगंबर हैं। इस पर शोध भी हुए हैं। जल प्रलय की ऐतिहासिक घटना संसार की सभी सभ्‍यताओं में पाई जाती है। बदलती भाषा और लम्बे कालखंड के चलते इस घटना में कोई खास रद्दोबदल नहीं हुआ है। मनु की यह कहानी यहूदी, ईसाई और इस्लाम में ‘हजरत नूह की नौका’ नाम से वर्णित की जाती है।

इंडोनेशिया, जावा, मलेशिया, श्रीलंका आदि द्वीपों के लोगों ने अपनी लोक परम्पराओं में गीतों के माध्यम से इस घटना को आज भी जीवंत बनाए रखा है। इसी तरह धर्मग्रंथों से अलग भी इस घटना को हमें सभी देशों की लोक परम्पराओं के माध्यम से जानने को मिलता है।

नूह की कहानी : उस वक्त नूह की उम्र छह सौ वर्ष थी जब यहोवा (ईश्वर) ने उनसे कहा कि तू एक-जोड़ी सभी तरह के प्राणी समेत अपने सारे घराने को लेकर कश्ती पर सवार हो जा, क्योंकि मैं पृथ्वी पर जल प्रलय लाने वाला हूँ।

सात दिन के उपरान्त प्रलय का जल पृथ्वी पर आने लगा। धीरे-धीरे जल पृथ्वी पर अत्यन्त बढ़ गया। यहाँ तक कि सारी धरती पर जितने बड़े-बड़े पहाड़ थे, सब डूब गए। डूब गए वे सभी जो कश्ती से बाहर रह गए थे, इसलिए वे सब पृथ्वी पर से मिट गए। केवल हजरत नूह और जितने उनके साथ जहाज में थे, वे ही बच गए। जल ने पृथ्वी पर एक सौ पचास दिन तक पहाड़ को डुबोए रखा। फिर धीरे-धीरे जल उतरा तब पुन: धरती प्रकट हुई और कश्ती में जो बच गए थे उन्ही से दुनिया पुन: आबाद हो गई।
मनु की कहानी : द्रविड़ देश के राजर्षि सत्यव्रत (वैवस्वत मनु) के समक्ष भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप में प्रकट होकर कहा कि आज से सातवें दिन भूमि जल प्रलय के समुद्र में डूब जाएगी। तब तक एक नौका बनवा लो। समस्‍त प्राणियों के सूक्ष्‍म शरीर तथा सब प्रकार के बीज लेकर सप्‍तर्षियों के साथ उस नौका पर चढ़ जाना। प्रचंड आँधी के कारण जब नाव डगमगाने लगेगी तब मैं मत्स्य रूप में बचाऊँगा।

तुम लोग नाव को मेरे सींग से बाँध देना। तब प्रलय के अंत तक मैं तुम्‍हारी नाव खींचता रहूँगा। उस समय भगवान मत्स्य ने नौका को हिमालय की चोटी ‘नौकाबंध’ से बाँध दिया। भगवान ने प्रलय समाप्‍त होने पर वेद का ज्ञान वापस दिया। राजा सत्‍यव्रत ज्ञान-विज्ञान से युक्‍त हो वैवस्‍वत मनु कहलाए। उक्त नौका में जो बच गए थे उन्हीं से संसार में जीवन चला।

विचारणीय है कि कितने लोग होंगे जो मनु और नूह को एक ही शख्स मानते होंगे या धार्मिक कट्टरता के चलते नहीं भी मानते होंगे। फिर भी यहाँ इतना तो कह ही सकते हैं कि तौरात, इंजिल, बाइबिल और कुरआन से पूर्व ही मत्स्य पुराण लिखा गया था, जिसमें उक्त कथा का उल्लेख मिलता है। यहाँ यह सिद्ध करने का प्रयास नहीं है कि अन्य धर्म ग्रंथों में पुराण से ही ली गई कथा है, जिसे अपने तरीके से गढ़ा। तथ्‍य यह है कि उक्त घटना का स्थान, समय और परम्परा के मान से अलग-अलग प्रभाव पड़ा और लोगों ने इसे दर्ज किया। यह मानव जाति का इतिहास है न कि किसी धर्म विशेष का।

Management Decision- If management has decided to screw you…There is no ESCAPE

Once SONIA GANDHI, L.K. Advani and Laloo Prasad Yadav were
travelling in an autorickshaw. They met with an accident and all three of
them died.
Yama Raja was waiting for this moment at the doorstep of death.

He asks Mrs GANDHI and Advani to go to HEAVEN.
But, for Laloo, Yama had already decided that he should be sent to HELL.
Laloo is not at all happy with this decision.
He asks Yama as to why this discrimination is being made. All the three of
them had served the public. Similarly, all took bribes, all misused public
positions, etc.
Then why the differential treatment?
He felt that there should be a formal test or an objective evaluation before
a decision is made; and should not be just based on opinion or pre-conceived
notions.
Yama agrees to this and asks all the three of them to appear for an English
test.
Mrs GANDHI is asked to spell ” INDIA ” and she does it correctly.
Advani is asked to spell ” ENGLAND ” and he too passes.
It is Laloo’s turn and he is asked to spell ” CZECHOSLOVAKIA “.
Laloo protests that he doesn’t know English.
He says this is not fair and that he was given a tough question and thus
forced to fail with false intent.
Yama then agrees to conduct a written test in Hindi (to give another chance
assuming that Laloo should at least feel that Hindi would provide an equal
platform for all three).

Mrs GANDHI is asked to write “KUTTA BOLA BHOW BHOW”. She writes it easily and
passes.
Advani is asked to write “BILLY BOLI MYAUN MYAUN”. He too passes..
Laloo is asked to write “BANDAR BOLA GURRRRRR…..”
Tough one. He fails again.
Laloo is extremely unhappy.
Having been a student of history (which the other two weren’t),he now
requested for all the 3 to be subjected to a test in history
Yama says OK but this would be the last chance and that he would not take
any more tests.

Mrs GANDHI is asked: “When did India get Independence ?”. She replied “1947” and
passed.
Advani is asked “How many people died during the independence struggle?”.
He gets nervous. Yama asked him to choose from 3 options: 100,000 or 200,000
or 300,000.

Advani catches it and says 200,000 and passes.

It’s Laloo’s turn now.

Yama asks him to give the Name and Address of each of the 200,000 who died
in the struggle.

Laloo accepts defeat and agrees to go to HELL.

Moral of the story: IF YOUR MANAGEMENT HAS DECIDED TO SCREW YOU, THERE IS NO ESCAPE….. :-

धर्मों में ॐ उच्चारण का महत्व

हिंदू या सनातन धर्म की धार्मिक विधियों के प्रारंभ में ‘ॐ’ शब्द का उच्चारण होता है, जिसकी ध्वनि गहन होती है। इसे प्रणव मंत्र भी कहते हैं। प्राचीन भारतीय धर्म विश्वास के अनुसार ब्रह्मांड के सृजन के पहले प्रणव मंत्र का उच्चारण हुआ था। ॐ का हिंदू धर्म के अलावा अन्य धर्मों में भी महत्व है।

योगियों में यह विश्वास है कि इसके अंदर मनुष्य की सामान्य चेतना को परिवर्तित करने की शक्ति है। यह मंत्र मनुष्य की बुद्धि व देह में परिवर्तन लाता है। ॐ से शरीर, मन, मस्तिष्क में परिवर्तन होता है और वह स्वस्थ हो जाता है। ॐ के उच्चारण से फेफड़ों में, हृदय में स्वस्थता आती है। शरीर, मन और मस्तिष्क स्वस्थ और तनावरहित हो जाता है। ॐ के उच्चारण से वातावरण शुद्ध हो जाता है।

ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है। जिनका उच्चारण एक के बाद एक होता है। ओ, उ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है, जिसके अनुसार साधक या योगी इसका उच्चारण ध्यान करने के पहले व बाद में करता है।

ॐ ‘ओ’ से प्रारंभ होता है जो चेतना के पहलेस्तर को दिखाता है। चेतना के इस स्तर में इंद्रियाँ बहिर्मुख होती हैं। इससे ध्यान बाहरी विश्व की ओर जाता है। चेतना के इस अभ्यास व सही उच्चारण से मनुष्य को शारीरिक व मानसिक लाभ मिलता है।

आगे ‘उ’ की ध्वनि आती है, जहाँ पर साधक चेतना के दूसरे स्तर में जाता है। इसे तेजस भी कहते हैं। इस स्तर में साधक अंतर्मुखी हो जाता है और वह पूर्व कर्मों व वर्तमान आशा के बारे में सोचता है। इस स्तर पर अभ्यास करने पर जीवन की गुत्थियाँ सुलझती हैं व उसे आत्मज्ञान होने लगता है। वह जीवन को माया से अलग समझने लगता है। हृदय, मन, मस्तिष्क शांत हो जाता है।

‘म’ ध्वनि के उच्चार से चेतना के तृतीय स्तर का ज्ञान होता है, जिसे ‘प्रज्ञा’ भी कहते हैं। इस स्तर में साधक सपनों से आगे निकल जाता है व चेतना शक्ति को देखता है। साधक स्वयं को संसार का एक भाग समझता है और इस अनंत शक्ति स्रोत से शक्ति लेता है। इसके द्वारा साक्षात्कार के मार्ग में भी जा सकते हैं। इससे साधक के शरीर, मन, मस्तिष्क के अंदर आश्चर्यजनक परिवर्तन आता है। शरीर, मन, मस्तिष्क, शांत होकर तनावरहित हो जाता है।

हिंदू या सनातन धर्म की धार्मिक विधियों के प्रारंभ में ‘ॐ’ शब्द का उच्चारण होता है, जिसकी ध्वनि गहन होती है। इसे प्रणव मंत्र भी कहते हैं। प्राचीन भारतीय धर्म विश्वास के अनुसार ब्रह्मांड के सृजन के पहले प्रणव मंत्र का उच्चारण हुआ था।

ॐ का उच्चारण पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन, वज्रासन में बैठकर कर सकते हैं। साधक बैठने में असमर्थ हो तो लेटकर भी इसका उच्चारण कर सकता है। इससे मानसिक बीमारियाँ दूर होती हैं। काम करने की शक्ति बढ़ जाती है। इसका उच्चारण 5, 7, 10, 21 बार अपने समयानुसार कर सकते हैं। ॐ जोर से बोल सकते हैं, धीरे-धीरे बोल सकते हैं। ॐ जप माला से भी कर सकते हैं।